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________________ द्वात्रिंशत्तम पर्व तातेन भरतः स्वामी सर्वेषां वो निवेदितः । विसाध्वसास्तमावृत्य तिष्ठत क्षितिपालिनः ॥४॥ नतस्ते पुनरित्यूचुर्नाथास्माकं भवान् गतिः । प्रसादं कुरु मा त्याक्षीरस्मान् कारुण्यकोविद ॥४२॥ निराश्रयाकुलीभूता स्वयेयं रहिता प्रजा । वद कं शरणं यातु सदशः कस्तवापरः ॥३३॥ व्याघ्रसिंहगजेन्द्रादिव्याल जालसमाकुले । वसामो भवता सार्धमरण्ये न विना दिवि ॥४४॥ न नो निवर्तते चित्तं प्रतियामः कथं वयम् । महत्तरत्वमेतेन हृषीकेष्वर्जितं ननु ॥४५॥ किलो गृहेण किं मोगैः किं दारैः किं नु बन्धुभिः। भवता नररत्नेन मुक्तानां पापकर्मणाम् ॥४६॥ क्रीडास्वपि त्वया देव वञ्चिता स्मो न जातुचित् । संमानेनाधुना कस्माजातोऽस्यत्यन्तलिष्ठरः ॥४॥ कोऽपराधो वदास्माकं भवच्चरणरेणुना । परमां वृद्धि मेताना मकानां भृत्यवत्सल ॥१८॥ अहो जानकि लक्ष्मीश रचितोऽयं शिरोञ्जलिः । प्रसादयतमीशं नः प्रसादी भवतोरयम् ॥४९॥ सीता लक्ष्मीधरश्चवमुच्यमानी सुदक्षिणी । तस्थतुः पद्मपादानन्यस्तनेत्री निरुत्तरी ॥१०॥ ततः पद्मो जगादेदं भवतामुत्तरं स्फुटम् । निवर्तध्वमयं भद्रा यातोऽस्मि सुखमास्यताम् ॥५॥ इत्युवरथा निरपेक्षौ तौ परमोत्साहसङ्गतौ । अवतरतुरत्यन्तगम्भीरां तां महापगाम् ।।१२।। उत्तीर्णः सरितं पद्मो जानकी विकचेक्षणाम् । करेण सुखमादाय पद्मिनीमिव दिग्गजः ।।५।। अम्भोविहारविज्ञानबुधयोः सा तयोर्धनी । नामिदनी' बभूवोद्धा क्रीडामाचरतोश्विरम् ॥५४॥ इतना ही समागम था। अब हमारे और तुम्हारे बीचमें यह नदी सीमा बन गयो है इसलिए उत्सुकतासे रहित होओ ॥४०॥ पिताने तुम सबके लिए भरतको राजा बनाया है सो तुम सब निर्भय होकर उसीकी शरण में रहो।।४१॥ ___ तदनन्तर उन्होंने फिर कहा कि हे नाथ! हमारी गति तो आप ही हैं इसलिए हे दयानिपुण ! प्रसाद करो और हम लोगोंको नहीं छोड़ो ॥४२॥ तुम्हारे बिना यह प्रजा निराधार होकर व्याकुल हो रही है । आप ही कहो किसकी शरण में जावे ? आपके समान दूसरा है ही कौन?||४३।। हम आपके साथ व्याघ्र, सिंह, गजेन्द्र आदि दुष्ट जीवोंके समूहसे भरे हुए वनमें रह सकते हैं पर आपके बिना स्वर्गमें भी नहीं रहना चाहते ॥४४॥ हमारा चित्त ही नहीं लौटता है फिर हम कैसे लौटें? यह चित्त ही तो इन्द्रियोंमें प्रधान है ।।४५।। जब आप-जैसे नर-रत्न हमें छोड़ रहे हैं तब हम पापो जीवोंको घरसे क्या प्रयोजन है ? भोगोंसे क्या मतलब है ? स्त्रियोंसे क्या अर्थ है ? और बन्धुओंकी क्या आवश्यकता है ? ॥४६॥ हे देव ! क्रीड़ाओंमें भी कभी आपने हम लोगोंको सम्मानसे वंचित नहीं किया फिर इस समय अत्यन्त निष्ठर क्यों हो रहे हो? ||४७॥ हे भत्यवत्सल ! हम लोग आपके चरणोंकी धूलिसे ही परम वृद्धिको प्राप्त हुए हैं। बताइए, हमारा क्या अपराध है ? ॥४८॥ रामसे इतना कहकर उन्होंने सीता और लक्ष्मणको भी सम्बोधित करते हुए कहा कि हे जानकि ! हे लक्ष्मण ! मैं आप दोनोंके लिए हाथ जोड़कर मस्तकपर लगाता हूँ, आप हमारे विषय में स्वामीको प्रसन्न कीजिए क्योंकि ये आप दोनोंपर प्रसन्न हैं-आपकी बात मानते हैं ।।४९।। लोग सीता तथा लक्ष्मणसे इस प्रकार कह रहे थे और अत्यन्त सरल प्रकृतिके धारक वे दोनों रामके चरणकमलोंके आगे दृष्टि लगाये चुपचाप खड़े थे-'क्या उत्तर दिया जाये' यह उन्हें सूझ नहीं पड़ता था ।।२०।। तदनन्तर रामने कहा कि हे भद्रपुरुषो! आप लोगों के लिए यही एक स्पष्ट उत्तर है कि अब आप यहाँसे लोट जाइए, मैं जाता हूँ, आप लोग अपने घर सुखसे रहें ।।५१।। इतना कहकर किसीकी अपेक्षा नहीं करनेवाले दोनों भाई बड़े भारी उत्साहसे उस अतिशय गहरी महानदीमें उतर पड़े ।।५२।। जिस प्रकार दिग्गज अपने कर (सूड ) में कमलिनीको लेकर तैरता है उसी प्रकार राम विकसित नेत्रोंवाली सीताको हाथमें लेकर नदीको पार कर रहे थे ।।५३।। दोनों ही १. तनोति वर्तते म.। २. लक्ष्मण । ३. नाभिप्रमाणजला । २-१२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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