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________________ तृतीयं पर्व महीमिव तं नाथं कुम्भैर्जलधरैरिव । अभिषिच्य समारब्धाः कर्तुं मस्य विभूषणम् ॥ १८७॥ चन्द्रादित्यसमे तस्य कर्णयोः कुण्डले कृते । तत्क्षणं सुरनाथेन वज्रसूचीविभिन्नयोः ॥ १८८ ॥ पद्मरागमणिः शुद्धश्चूडायां विनिवेशितः । जटालमिव संपन्नं शिरो यस्य मरीचिभिः ॥ १८९ ॥ अर्द्धचन्द्राकृतिर्न्यस्ता चन्दनेन ललाटिका । बाहुमूले कृते जात्य हेम केयूरमण्डिते ॥ १९०॥ नक्षत्रस्थूलमुक्ताभिः कल्पितेन मयूखिना । हारेण भूषितं वक्षः श्रीवत्सकृतभूषणम् ।।१९१।। हरिन्मणिसरोज श्री रत्नस्थूलमरीचिभिः । संजातपल्लवेनेव प्रालम्बेन विराजितः ।।१९२।। लक्षणा मरणश्रेष्ठौ प्रकोष्ठौ दधतुः श्रियम् । मणिबन्धनचारुभ्यां कटकाभ्यां सुसंहती ।।१९३।। पट्टांशुको परिन्यस्तकटिसूत्रेण राजितम् । नितम्बफलकं संध्यादाम्नेवावनिभृत्तटम् ॥ १९४ ॥ सर्वाङ्गुलीषु विन्यस्तं मुद्रिकाभूषणं वरम् । नानारत्नपरिष्वक्तचामीकरविनिर्मितम् ॥। १९५|| भक्त्या कृतमिदं देवैः सर्वमण्डनयोजनम् । त्रैलोक्यमण्डनस्यास्य कुतोऽन्यन्मण्डनं परम् ॥ १९६ ॥ चन्दनेन समालभ्य रोचनाः स्थासकाः कृताः । रेजुस्ते स्फटिकक्षोण्यां कनकाम्बूद्गमा इव ॥१९७॥ उत्तरीयं च विन्यस्तमंशुकं कृतपुष्पकम् । अत्यन्तनिर्मलं रेजे सतारमिव तन्नभः || १९८ || पारिजातक संतान कुसुमैः परिकल्पितम् । षट्पदालीपरिष्वक्तं पिनद्धं स्थूलशेखरम् ।।१९९ || तिलकेन भ्रुवोर्मध्यं सगन्धेन विभूषितम् । तिलकत्वं त्रिलोकस्य बिभ्रतश्चारुचेष्टिनैः ॥ २००॥ २ उद्वर्तन किया || १८६ ॥ जिस प्रकार मेघोंके द्वारा किसी पर्वतका अभिषेक होता है उसी प्रकार विशाल कलशोंके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक कर देव उन्हें आभूषण पहनानेके लिए तत्पर हुए ॥ १८७॥ इन्द्रने तत्काल ही वज्रकी सूचीसे विभिन्न किये हुए उनके कानोंमें चन्द्रमा और सूर्यके समान कुण्डल पहनाये ॥१८८ ।। चोटीके. स्थानपर ऐसा निर्मल पद्मरागमणि पहनाया कि जिसकी किरणोंसे भगवान्‌का सिर जटाओंसे युक्त के समान जान पड़ने लगा ॥ १८९॥ भालपर चन्दनके द्वारा अर्धचन्द्राकार ललाटिका बनायी । भुजाओंके मूलभाग उत्तम सुवर्णनिर्मित केयूरोंसे अलंकृत किये ॥ १९०॥ श्रीवत्स चिह्नसे सुशोभित वक्षःस्थलको नक्षत्रोंके समान स्थूल मुक्ताफलोंसे निर्मित एवं किरणोंसे प्रकाशमान हारसे अलंकृत किया || १९१ ॥ हरितमणि और पद्मराग मणियोंकी बड़ी मोटी किरणोंसे जिसमें मानो पल्लव ही निकल रहे थे ऐसी बड़ी मालासे उन्हें अलंकृत किया था ॥१९२॥ लक्षणरूपी आभरणोंसे श्रेष्ठ उनकी दोनों भरी कलाइयाँ रत्नखचित सुन्दर कड़ों से बहुत भारी शोभाको धारण कर रही थीं ॥ १९३॥ रेशमी वस्त्रके ऊपर पहनायी हुई करधनी से सुशोभित उनका नितम्बस्थल ऐसा जान पड़ता था मानो सन्ध्याकी लाल-लाल रेखासे सुशोभित किसी पर्वतका तट ही हो ॥१९४॥ उनकी समस्त अंगुलियों में नाना रत्नोंसे खचित सुवर्णमय अंगूठियाँ पहनायी गयी थीं ॥ १९५ ॥ देवोंने भगवान्‌ के लिए जो सब प्रकारके आभूषण पहनाये थे वे भक्तिवश ही पहनाये थे वैसे भगवान् स्वयं तीन लोकके आभरण थे अन्य पदार्थ उनकी क्या शोभा बढ़ाते ? ॥१९६॥ उनके शरीरपर चन्दनका लेप लगाकर जो रोचनके पीले-पीले बिन्दु रखे गये थे, वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो स्फटिककी भूमिपर सुवर्ण कमल ही रखे गये हों ॥ १९७॥ जिसपर कसीदासे अनेक फूल बनाये गये थे ऐसा उत्तरीय वस्त्र उनके शरीरपर पहनाया गया था और वह ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंसे सुशोभित निर्मल आकाश ही हो ॥ १९८ ॥ पारिजात और सन्तानक नामक कल्पवृक्षोंके फूलोंसे जिसकी रचना हुई थी, तथा जिसपर भ्रमरोंके समूह लग रहे थे ऐसा बड़ा सेहरा उनके सिरपर बाँधा गया था ॥ १९९ ॥ चूँकि सुन्दर चेष्टाओंको धारण करनेवाले भगवान् तीन लोकके तिलक थे इसलिए उनकी दोनों भौंहोंका मध्यभाग सुगन्धित तिलक से १. भूषकम् म. । २. भुवोमंध्यं म. । ३. चेष्टितम् ख. । Jain Education International ૪૧ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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