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________________ ४४ पद्मपुराणे जिनमातुस्ततः कृत्वा मायाबालं प्रणामिनी । बालमानीय शक्रस्य शची चक्रे करद्वये ॥१७३।। रूपं पश्यन् जिनस्यासौ सहस्रनयनोऽपि सन् । तृप्तिमिन्द्रो न संप्राप त्रैलोक्यातिशयस्थितम् ॥१७॥ ततस्तमङ्कमारोप्य समारुह्य गजाधिपम् । गृहीतचामरच्छत्रो भक्त्या परमया स्वयम् ।।१७५॥ अवाप मेरुशिखरं सर्वदेवैः समन्वितः । बैडर्यादिमहारत्नमरीचिनिचयोज्ज्वलम् ।। १७६॥ पाण्डुकम्बलसंज्ञायां शिलायां सिंहविष्ठरे । ततो जिनः सुरेशेन स्थापितः पृष्ठवर्तिना ॥१७७॥ ततः समाहता' भेयः क्षुब्धसागरनिःस्वना । मृदङ्गशङ्खशब्दाश्च सादृहासाः कृताः सुरैः ॥१७॥ यक्षकिन्नरगन्धर्वाः सह तुम्बुरुनारदाः । विश्वावसुसमायुक्ताः कुर्वाणा मूर्छना वेराः ॥१७९।। गायन्ति सह पत्नीभिर्मनःश्रोत्रहरं तदा । वीणावादनमारब्धा कतु लक्ष्मीश्च सादरा ॥१०॥ हावभावसमेताश्च नृत्यन्स्यप्सरसो वरम् । अङ्गहारं यथावस्तु कुर्वाणाः कृतभूषणाः ॥१८१॥ एवं तत्र महातोये जनितेऽमरसत्तमैः । अभिषेकाय देवेन्द्रो जग्राह कलशं शुभम् ॥१८॥ ततः क्षीरार्णवाम्भोभिः पूर्णः कुम्भमहोदरैः । चामीकरमयैः पद्मच्छ नवक्त्रैः सपल्लवैः ॥१८३॥ अभिषेकं जिनेन्द्रस्य चकार त्रिदशाधिपः । कृत्वा चैक्रियसामर्थ्यादात्मानं बहुविग्रहम् ॥१८४॥ यमो वैश्रवणः सोमो वरुणोऽन्ये च नाकिनः । शेषशक्रादयः सर्वे चक्रुर्भक्त्याभिषेचनम् ॥१८५॥ इन्द्राणीप्रमुखा देव्यः सद्गन्धैरनुलेपनैः । चक्रुरुद्वर्तनं मक्त्या करैः पल्लवकोमलः ॥१८६॥ प्रदक्षिणाएँ दी। फिर नाभिराजके घर में प्रवेश किया और तदनन्तर इन्द्राणीके द्वारा प्रसूतिका-गृहसे जिन-बालकको बुलवाया ॥१७२॥ इन्द्राणीने प्रसूतिका-गृहमें जाकर पहले जिन-माताको नमस्कार किया । फिर माताके पास मायामयी बालक रखकर जिन-बालकको उठा लिया और बाहर लाकर इन्द्रके हाथों में सौंप दिया ।।१७३।। यद्यपि इन्द्र हजार नेत्रोंका धारक था तथापि तीनों लोकोंमें अतिशय पूर्ण भगवान्का रूप देखकर वह तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ था॥१७४।। तदनन्तर-सौधर्मेन्द्र भगवान्को गोदमें बैठाकर ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुआ और श्रेष्ठ भक्तिसे सहित अन्य देवोंने चमर तथा छत्र आदि स्वयं ही ग्रहण किये ॥१७५॥ इस प्रकार इन्द्र समस्त देवोंके साथ चलकर वैडूर्य आदि महारत्नोंकी कान्तिके समूहसे उज्ज्वल सुमेरु पर्वतके शिखरपर पहुँचा ।।१७६॥ वहाँ पाण्डुकम्बल नामकी शिलापर जो अकृत्रिम सिंहासन स्थित है उसपर इन्द्रने जिन-बालकको विराजमान कर दिया और स्वयं उनके पीछे खड़ा हो गया ॥१७७।। उसी समय देवोंने क्षभित समद्रके समान शब्द करनेवाली भेरियां बजायीं, मृदंग और शंखके जोरदार शब्द किये ॥१७८॥ यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद और विश्वावसु उत्कृष्ट मूर्च्छनाएँ करते हुए अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ मन और कानोंको हरण करनेवाले सुन्दर गीत गाने लगे। लक्ष्मी भी बड़े आदरके साथ वीणा बजाने लगी ।।१७९-१८०॥ हाव-भावोंसे भरी एवं आभूषणोंसे सुशोभित अप्सराएँ यथायोग्य अंगहार करती हुई उत्कृष्ट नृत्य करने लगीं ॥१८१।। इस प्रकार जब वहां उत्तमोत्तम देवोंके द्वारा गायनवादन और नृत्य हो रहा था तब सौधर्मेन्द्रने अभिषेक करने के लिए शुभ कलश हाथमें लिया॥१८२।। तदनन्तर जो क्षीरसागरके जलसे भरे थे, जिनकी अवगाहना बहुत भारी थी, जो सुवर्ण निर्मित थे, जिनके मुख कमलोंसे आच्छादित थे तथा लाल-लाल पल्लव जिनकी शोभा बढ़ा रहे थे, ऐसे एक हजार आठ कलशोंके द्वारा इन्द्रने विक्रियाके प्रभावसे अपने अनेक रूप बनाकर जिन लकका अभिषेक किया॥१८३-१८४॥ यम. वैश्रवण, सोम. वरुण आदि अन्य देवोंने और साथ ही शेष बचे समस्त इन्द्रोंने भक्तिपूर्वक जिन-बालकका अभिषेक किया ।।१८५।। इन्द्राणी आदि देवियोंने पल्लवोंके समान कोमल हाथोंके द्वारा समीचीन गन्धसे युक्त अनुलेपनसे भगवान्को १. समाहिता म.। २. रवाः ख.। -३. मारब्धीकर्तुं ख. । ४. मेषवक्त्रादयः ख., म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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