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________________ ४७५ त्रयोविंशतितमं पर्व गते राजन्यमात्येन 'लेप्यं दाशरथं वपुः । कारितं मुख्यवपुषो मिन्नं चेतनयैकया ॥४१॥ लाक्षादिरसयोगेन रुधिरं तत्र निर्मितम् । मार्दवं च कृतं तादृग्यादृक्सत्यासुधारिणः ॥४२॥ वरासननिविष्टं तं वेश्मनः सप्तमे तले । युक्तं पुरैव सर्वेण परिवर्गेण बिम्बकम् ॥४३॥ स मन्त्री लेप्यकारश्च कृत्रिमं जैज्ञतु पम् । भ्रान्तिर्हि जायते तत्र पश्यतोरुभयोरपि ॥४४॥ अयमेव च वृत्तान्तो जनकस्यापि कल्पितः । उपर्युपरि हि प्रायश्चलन्ति विदुषां धियः ।।४५॥ मद्यां तौ क्षितिपो नष्टौ भुवनस्थितिकोविदौ । आपकाले यथेन्द्वौं समये जलदायिनाम् ॥१६॥ यौ पुरा वरनारीमिर्महाप्रासादवर्तिनौ । उदारभोगसंपन्नौ सेवितो मगधाधिप ॥४७॥ इतराविव तौ कौचिदसहायौ नरोत्तमौ । चरणाभ्यां महीं कष्टं भ्रमन्तौ 'धिग्भवस्थितिम् ॥४८॥ इति निश्चित्य जन्तुभ्यो यो ददात्यभयं नरः । किं न तेन भवेद्दत्तं साधूनां धुरि तिष्ठता ॥४९॥ इष्टौ तौ तत्र तत्रेति चरवर्गेण वेदितौ । अनुजेन दशास्यस्य प्रेषिता वधका भृशम् ॥५०॥ ते शस्त्रपाणयः क्रूरा दृष्ट्यगोचरविग्रहाः । दिवा नक्तं च नगरी भ्रमन्ति चलचक्षुषः ॥५१॥ प्रासादं हीनसत्त्वास्ते प्रवेष्टं न सहा यदा । चिरायन्ते तदायासीत् स्वयमेव विभीषणः ॥५२॥ अन्विष्य गीतशब्देन प्रविश्य गतविभ्रमः । ददर्शान्तःपुरान्तस्थं व्यक्तं दशरथं विभीः ॥५३॥ सो ठीक ही है क्योंकि वह मन्त्री राजाका अच्छी तरह परीक्षा किया हुआ था ॥४०॥ राजाके चले जानेपर मन्त्रीने राजा दशरथके शरीरका एक पुतला बनवाया। वह पुतला मूल शरीरसे इतना मिलता-जुलता था कि केवल एक चेतनाको अपेक्षा हो भिन्न जान पड़ता था ॥४१।। उसके भीतर लाख आदिका रस भराकर रुधिरकी रचना की गयी थी तथा सचमुचके प्राणीके शरीरमें जैसी कोमलता होती है वैसी ही कोमलता उस पुतले में रची गयी थी ॥४२॥ राजाका वह पुतला पहलेके समान ही समस्त परिकरके साथ महलके सातवें खण्डमें उत्तम आसनपर विराजमान किया गया था ॥४३।। वह मन्त्री तथा पुतलाको बनानेवाला चित्रकार ये दोनों ही राजाको कृत्रिम राजा समझते थे और बाकी सब लोग उसे सचमुचका हो राजा समझते थे। यही नहीं उन दोनोंको भी देखते हुए जब कभी भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती थी ॥४४॥ उधर यही हाल राजा जनकका भी किया गया सो ठीक ही है क्योंकि विद्वानोंकी बुद्धियां प्रायः ऊपर-ऊपर ही चलती हैं अर्थात् एक-से-एक बढ़कर होती हैं ॥४५॥ जिस प्रकार वर्षाऋतुके समय चन्द्रमा और सूर्य छिपे-छिपे रहते हैं उसी प्रकार संसारकी स्थितिके जानकार दोनों राजा भी आपत्तिके समय पृथिवीपर छिपे-छिपे रहने लगे ॥४६॥ गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगधाधिपते ! जो राजा पहले बडे-बडे महलोंमें रहते थे, उदार भोगसे सम्पन्न थे। उत्तमोत्तम स्त्रियां जिनकी सेवा करती थीं वे ही राजा अन्य मनुष्योंके समान असहाय हो पृथिवीपर पैरोंसे पैदल भटकते फिरते थे, सो इस संसारकी दशाको धिक्कार हो ॥४७-४८॥ ऐसा निश्चय कर जो प्राणियोंके लिए अभयदान देता है, सत्पुरुषोंके अग्रभागमें स्थित रहनेवाले उस पुरुषने क्या नहीं दिया ? अर्थात् सब कुछ दिया ।।४९।। गुप्तचरोंके समूहने जहां-जहाँ उनका सद्भाव जाना वहाँ-वहाँ विभीषणने उन्हें स्वयं देखा तथा बहुत-से वधक भेजे ॥५०॥ जिनके हाथोंमें शस्त्र विद्यमान थे, जो स्वभावसे क्रूर थे, जिनके शरीर नेत्रोंसे दिखाई नहीं देते थे तथा जिनके नेत्र अत्यन्त चंचल थे, ऐसे वधक रात-दिन नगरीमें घूमने लगे ॥५१॥ हीन शक्तिके धारक वे वधक राजमहलमें प्रवेश करनेके लिए समर्थ नहीं हो सके इसलिए जब उन्हें अपने कार्यमें विलम्ब हुआ तब विभीषण स्वयं ही आया ॥५२॥ संगीतके शब्दसे उसने दशरथका पता लगा लिया, जिससे १. लेख्यं म.। २. तावद्यावत्पत्यासुधारिणः म.। ३. स्रजतु म.। ४. धिक्तवस्थितिम् म.। ५. दृष्ट्वा गोचनविग्रहा म.। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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