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________________ ४७४ पद्मपुराणे जायते यावदेवास्य प्रजा दशरथस्य न । जनकस्य च तावत्तौ मारयामीति सादरः ॥२७॥ पर्यटच्च चिरं क्षोणीं तच्चरेण निवेदितौ । भवन्तौ कामरूपेण स्थानरूपादिलक्षणैः ॥२८॥ मुनिविनम्मतस्तेन पृष्टोऽहमपि मो यते । क्वचिद्दशरथं वेसि जनकं च क्षिताविति ॥२९॥ अन्विष्य कथयामीति मया चोपात्तमुत्तरम् । आकृतं दारुणं तस्य पश्यामि नरपुङ्गव ॥३०॥ तत्ते यावदयं किंचिन्न करोति विमीषणः । निगृह्य तावदात्मानं क्वचित्तिष्ठ महीपते ॥३१॥ सम्यग्दर्शनयुक्तेषु गुरुपूजनकारिषु । सामान्येनैव मे प्रीतिस्त्वद्विधेषु विशेषतः ॥३२॥ स त्वं युक्तं कुरु स्वस्ति भूयात्तेऽहं गतोऽधुना । इमां वेदयितुं वातां क्षिप्रं जनकभूभृतः ॥३३॥ कृतानतिन् पेणैवमुक्त्वोत्पत्य नभस्तलम् । अबद्धारयतिवेगान्मिथिलामिमुखं ययौ ॥३४॥ जनकायापि तेनेदमशेषं विनिवेदितम् । भव्यजीवा हि तस्यासन् प्राणेभ्योऽप्यतिवल्लभाः ॥३५॥ अबद्वारयतौ याते मरणाशङ्किमानसः । समुद्रहृदयामात्यमाकारयदिलापतिः ॥३६॥ श्रुत्वा राजमखान्मन्त्री समभ्यण महाभयम् । जगाद गदतां श्रेष्ठः स्वामिभक्तिपरायणः ॥३७॥ जीवितायाखिलं कृत्यं क्रियते नाथ जन्तुभिः । त्रैलोक्येशत्वलामोऽपि वद तेनोज्झितस्य कः ॥३८॥ तस्माद्यावदरातीनां व्यसनं रचयाम्यहम् । तावदज्ञातरूपस्त्वं विकृतो विहरावनिम् ॥३९।। इत्युक्ते तत्र निक्षिप्य कोशं देशं पुरं जनम् । निरक्रामत् पुराद् राजा सह्यस्य सुपरीक्षितः ॥४०॥ प्राप्त होगी। यह सुनकर जिसकी आत्मा विषादसे भर रही थी ऐसे विभीषणने निश्चय किया कि जबतक राजा दशरथ और जनकके सन्तान होती है उसके पहले ही मैं इन्हें मारे डालता हूँ ॥२६-२७|| यह निश्चय कर वह तुम लोगोंकी खोजके लिए चिरकाल तक पृथ्वीमें घूमता रहा पर पता नहीं चला सका। तदनन्तर इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाले उसके गुप्तचरने स्थान, रूप आदि लक्षणोंसे तुम दोनोंका उसे परिचय कराया है ॥२८॥ मुनि होनेके कारण मेरा विश्वास कर उसने मुझसे पूछा कि हे मुने ! पृथ्वीपर कोई दशरथ तथा जनक नामके राजा हैं सो उन्हें तुम जानते हो ॥२९|| इस प्रश्नके बदले मैंने उत्तर दिया कि खोजकर बतलाता हूँ। हे नरपुंगव ! मैं उसके अभिप्रायको अत्यन्त कठोर देखता हूँ ॥३०॥ इसलिए हे राजन् ! यह विभीषण जबतक तुम्हारे विषयमें कुछ नहीं कर लेता है तबतक तुम अपने आपको छिपाकर कहीं गुप्तरूपसे रहने लगो ॥३१॥ सम्यग्दर्शनसे युक्त तथा गुरुओंकी पूजा करनेवाले पुरुषोंपर मेरी समान प्रीति रहती है और तुम्हारे जैसे पुरुषोंपर विशेषरूपसे विद्यमान है ॥३२॥ तुम जैसा उचित समझो सो करो। तुम्हारा भला हो । अब मैं यह वार्ता कहने के लिए शीघ्र ही राजा जनकके पास जाता हूँ ॥३३॥ तदनन्तर जिसे राजा दशरथने नमस्कार किया था ऐसे नारद मुनि इस प्रकार कहकर तथा आकाशमें उड़कर बड़े वेगसे मिथिलाकी ओर चले गये ॥३४॥ वहाँ जाकर राजा जनकके लिए भी उन्होंने यह सब समाचार बतलाया सो ठीक ही है क्योंकि भव्य जीव उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारे थे ॥३५।। नारद मुनिके चले जानेपर जिसके मनमें मरणको आशंका उत्पन्न हो गयी थी ऐसे राजा दशरथने समुद्रहृदय नामक मन्त्रीको बुलवाया ॥३६॥ वक्ताओंमें श्रेष्ठ तथा स्वामिभक्तिमें तत्पर मन्त्रीने राजाके मुखसे महाभयको निकटस्थल सुन कहा ॥३७॥ कि हे नाथ! प्राणी जितना कुछ कार्य करते हैं वह जीवनके लिए ही करते हैं। आप ही कहिए, जीवनसे रहित प्राणीके लिए यदि तीन लोकका राज्य भी मिल जाये तो किस कामका है ।।३८।। इसलिए जबतक मैं शत्रुओंके नाशका प्रयत्न करता हूँ तबतक तुम किसीकी पहचानमें रूप न आ सके इस प्रकार वेष बदलकर पृथ्वीमें विहार करो ॥३९॥ मन्त्रीके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ उसी समुद्रहृदय मन्त्रीके लिए खजाना, देश, नगर तथा प्रजाको सौंपकर नगरसे बाहर निकल गया १. सन्ततिः । २. कंचिद्दश -म.। ३. मुक्त्वात्यन्त- म. । ४. नारदर्षिः । ५. जगदे म. । ६. विकृती म.। ७. निष्क्रामद् म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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