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________________ ४७० पद्मपुराणे पृथिवीमत्यमिख्यास्य महादेवी महागुणा । कान्तिमण्डलमध्यस्था सर्वेन्द्रियसुखावहा ॥१६१॥ द्वौ सुतावुदपत्स्यातां तस्यामुत्तमलक्षणो । ज्येष्ठोऽनन्तरथो ज्ञेयः ख्यातो दशरथोऽनुजः ॥१६२॥ सहस्ररश्मिसंज्ञस्य राज्ञो माहिष्मतीपतेः । अजयमनरण्येन साकमासीदनुत्तमम् ॥१६३॥ अन्योऽन्यगतिसंवद्धप्रेमाणौ तौ नरोत्तमौ । सौधर्मशानदेवेन्द्राविवास्थातो स्वधामनि ॥१६॥ रावणेन जितो युद्धे सहस्रांशुर्विबुद्धवान् । दीक्षां जैनेश्वरीमाप बिभ्रत्संवेगमुम्नतम् ॥१६५॥ दूतात्तत्प्रेषिताज् ज्ञात्वा तद्वृत्तान्तमशेषतः । मासजाते श्रियं न्यस्य नापी दशरथे भृशम् ॥१६६॥ सकाशेऽभयसेनस्य निग्रन्थस्य महात्मनः । राजानन्तरथेनामा प्रववाजातिनिःस्पृहः ॥१६७॥ अनरण्योगमन्मोक्षमनन्तस्यन्दनो महीम् । सर्वसङ्गविनिर्मुक्तो विजहार यथोचितम् ॥१६८॥ अत्यन्तदुस्सहयोगी द्वाविंशतिपरीषहै । न क्षोमितस्ततोऽनन्तवीर्याख्या स क्षितौ गतः ॥१६९॥ वपुर्दशरथो लेभे नवयौवनभूषितम् । शैलकूटमिवोत्तुङ्गं नानाकुमुमभूषितम् ॥१७॥ अथामृतप्रभावायामुत्पन्नां वरयोषिति । दर्मस्थलपुरेशस्य चारुविभ्रमधारिणः ॥१७१॥ राज्ञः सुकोशलाख्यस्य तनयामपराजिताम् । उपयेमे स रस्यापि स्त्रीगुणैरपराजिताम् ॥ १७२॥ पुरमस्ति महारम्यं नाम्ना कमलसंकुलम् । सुबन्धुतिलकस्तस्य राजा मित्रास्य भामिनी ॥१७३॥ दुहिता कैकयी नाम तयोः कन्या गुणान्विता । मुण्डमाला कृता यस्या नेत्रेन्दीवरमालया ॥१७४॥ दिया ॥१६०॥ राजा अनरण्यकी पृथिवीमती नामकी महादेवी थी जो महागुणोंसे युक्त थी, कान्तिके समूहके मध्यमें स्थित थी और समस्त इन्द्रियोंके सुख धारण करनेवाली थी ॥१६१।। उसके उत्तम लक्षणोंके धारक दो पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्रका नाम अनन्तरथ और छोटे पुत्रका नाम दशरथ था ॥१६२।। माहिष्मतीके राजा सहस्ररश्मिकी अनरण्यके साथ उत्तम मित्रता थी॥१६३।। परस्परके आने-जानेसे जिनका प्रेम वृद्धिको प्राप्त हुआ था ऐसे दोनों राजा अपने-अपने घर सौधर्म और ऐशानेन्द्रके समान रहते थे ॥१६४।। अथानन्तर रावणसे पराजित होकर राजा सहस्ररश्मि प्रतिबोधको प्राप्त हो गया जिससे उत्तम संवेगको धारण करते हुए उसने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली ।।१६५।। दीक्षा धारण करनेके पहले उसने राजा अनरण्यके पास दूत भेजा था सो उससे सब समाचार जानकर राजा अनरण्य, जिसे उत्पन्न हुए एक माह ही हुआ था ऐसे दशरथके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर अभयसेन नामक निर्ग्रन्थ महात्माके समीप ज्येष्ठ पुत्र अनन्तरथके साथ अत्यन्त निःस्पृह हो दीक्षित हो गया ।।१६६-१६७|| अनरण्य मुनि तो मोक्ष चले गये और अनन्तरथ मुनि सर्व प्रकारके परिग्रहसे रहित हो यथायोग्य पृथिवीपर विहार करने लगे ॥१६८॥ अनन्तरथ मुनि अत्यन्त दुःसह बाईस परीषहोंसे क्षोभको प्राप्त नहीं हुए थे इसलिए पृथिवीपर 'अनन्तवीर्य' इस नामको प्राप्त हुए ॥१६९।। अथानन्तर राजा दशरथने नवयौवनसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके फूलोंसे सुभूषित पहाड़के शिखरके समान ऊँचा शरीर प्राप्त किया ॥१७०॥ तदनन्तर उसने दर्भस्थल नगरके स्वामी तथा सुन्दर विभ्रमोंको धारण करनेवाले राजा सुकोशलकी अमृतप्रभावा नामकी उत्तम स्त्रीसे उत्पन्न अपराजिता नामकी पुत्रीके साथ विवाह किया। अपराजिता इतनी उत्तम स्त्री थी कि स्त्रियोंके योग्य गुणोंके द्वारा रति भी उसे पराजित नहीं कर सकी थी ॥१७१-१७२।। तदनन्तर कमलसंकूल नामका एक महासुन्दर नगर था। उसमें सुबन्धतिलक नामका राजा राज्य था। उसकी मित्रा नामकी स्त्री थी। उन दोनोंके कैकयी नामकी गुणवती पुत्री थी। वह इतनी सुन्दरी थी कि उसके नेत्ररूपी नील कमलोंकी मालासे मस्तक मालारूप हो गया १. संगतं, मैत्रीत्यर्थः । २. मासो जातस्य यस्य स तस्मिन् । ३. नृपसम्बन्धिनाम् । ४. -मुत्पन्ना म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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