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________________ ४५४ पद्मपुराणे प्रभासमुज्ज्यलः कायो योऽयमासीन्महाबलः । जातः संप्रत्यसौ वर्षाहतचित्रसमच्छविः ॥१३५॥ अर्थो धर्मश्च कामश्च त्रयस्ते तरुणोचिताः । जरापरीतकायस्य दुष्कराः प्राणधारिणः ॥१३६॥ धिङमामचेतनं पापं दुराचारं प्रमादिनम् । अलीकबान्धवस्नेहसागरावर्तवर्तिनम् ॥१३७॥ इत्युक्त्वा बान्धवान् सर्वानापृच्छय विगतस्पृहः । दत्वा पुरंदरे राज्यं राजा जर्जरविग्रहः ॥१३८॥ पार्वे निर्वाणघोषस्य निर्ग्रन्थस्य महात्मनः । सुरेन्द्रमन्युना साधं प्रववाज महामनाः ॥१३९॥ पुरंदरस्य तनयमसूत पृथिवीमती। भार्या कीर्तिधराभिख्यं विख्यातगुणसागरम् ।।१४०॥ क्रमेण स परिप्राप्तो यौवनं विनयाधिकः । एधयन् सर्वबन्धूनां प्रसादं चारुचेष्टया ॥१४॥ कौसलस्थनरेन्द्रस्य वृता तस्मै शरीरजा । सुतमुद्वाह्य तां गेहान्निश्चक्राम पुरंदरः ॥१४२॥ क्षेमंकरमुनेः पावें प्रव्रज्य गुणभूषणः । तपः कतु समारेभे कर्मनिजरकारणम् ॥१४३।। कुलक्रमागतं राज्यं पालयन् जितशात्रवः । रेमे देवोत्तमैर्भोगैः सुखं कीर्तिधरो नृपः ।।१४४॥ वंशस्थवृत्तम् अथान्यदा कीर्तिधरः क्षितीश्वरः प्रजासुबन्धुः कृतमीररातिषु । सुखासनस्थो भवने मनोरमे विराजमानो नलकूबरो यथा ॥१४५॥ निरीक्ष्य राक्षयनीलतेजसा तिरोहितं भास्करभासमण्डलम् । अचिन्तयत् कष्टमहो न शक्यते विधिविनेतं प्रकटीकृतोदयः ।।१४६॥ करनेवाले थे, अब उनका मार्ग भृकुटी रूपी लताओंसे आच्छादित हो गया है अर्थात् अब वे लताओसे आच्छादित गर्तके समान जान पड़ते हैं ॥१३४॥ मेरा जो यह शरीर कान्तिसे उज्ज्वल तथा महाबलसे युक्त था वह अब वर्षासे ताड़ित चित्रके समान निष्प्रभ हो गया ॥१३५।। अर्थ, धर्म और काम ये तीन पुरुषार्थ तरुण मनुष्यके योग्य हैं। वृद्ध मनुष्यके लिए इनका करना कठिन है ।।१३६|| चेतनाशून्य, दुराचारी, प्रमादी तथा भाई-बन्धुओंके मिथ्या स्नेहरूपी सागरको भंवरमें पड़े हुए मुझ पापीको धिक्कार हो ॥१३७।। इस प्रकार कहकर तथा समस्त बन्धुजनोंसे पूछकर उदारहृदय वृद्ध राजा विजयस्यन्दनने निःस्पृह हो छोटे पोते पुरन्दरके लिए राज्य सौंप दिया और स्वयं निर्वाणघोष नामक निर्ग्रन्थ महात्माके समीप अपने पुत्र सुरेन्द्रमन्युके साथ दीक्षा ले ली ॥१३८-१३९|| तदनन्तर पुरन्दरको भार्या पृथिवीमतीने कीर्तिधर नामक पुत्रको उत्पन्न किया। वह पुत्र समस्त प्रसिद्ध गुणोंका मानो सागर ही था ।।१४०॥ अपनी सुन्दर चेष्टासे समस्त बन्धुओंकी प्रसन्नताको बढ़ाता हुआ विनयी कीर्तिधर क्रम-क्रमसे यौवनको प्राप्त हुआ ॥१४१॥ तब राजा परन्दरने उसके लिए कौशल देशके राजाकी पुत्री स्वीकृत की। इस तरह पत्रका विवाहकर राजा पुरन्दर विरक्त हो घरसे निकल पड़ा ॥१४२।। गुणरूपी आभूषणोंको धारण करनेवाले राजा पुरन्दरने क्षेमंकर मुनिराजके समीप दीक्षा लेकर कर्मोकी निर्जराका कारण कठिन तप करना प्रारम्भ किया ॥१४३।। इधर शत्रुओंको जीतनेवाला राजा कीर्तिधर कुल-क्रमागत राज्यका पालन करता हुआ देवोंके समान उत्तम भोगोंके साथ सुखपूर्वक क्रीड़ा करने लगा ॥१४४॥ अथानन्तर किसी दिन शत्रुओंको भयभीत करनेवाला प्रजा-वत्सल राजा कीर्तिधर, अपने सुन्दर भवनके ऊपर नलकूबर विद्याधरके समान सुखसे बैठा हुआ सुशोभित हो रहा था कि उसकी दृष्टि राह विमानको नील कान्तिसे आच्छादित सूर्यमण्डल (सूर्यग्रहण ) पर पड़ी। उसे देखकर वह विचार करने लगा कि अहो ! उदयमें आया कम दूर नहीं किया जा सकता ।।१४५-१४६।। सूर्य १. पावनिर्वाण म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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