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________________ विशतितमं पर्व आत्मनिन्दापरो धीरः स्वदेहेऽत्यन्तनिःस्पृहः । यादमपरो धीमान शीलवैवधिकः परः ॥१५०॥ शङ्कादिष्टिदोषाणामतिदूरव्यवस्थितः। साधूनां सततं सक्तो वैयावृत्त्ये यथोचिते ॥१५॥ संयुक्तः कालधर्मेण माहेन्द्रं कल्पमाश्रितः । अवाप परमान् भोगान् देवीनिवहमध्यगः ॥१५२॥ च्युतो नागपुरे जातः सोहदेवः स वैजेयिः । सनत्कुमारशब्देन ख्यातश्चक्राङ्कशासनः ॥१५३॥ संकथानुक्रमाद् यस्य सौधर्मेण कीर्तितम् । रूपं द्रष्टुं समाजग्मुः सुरा विस्मयकारणम् ॥१५४॥ कृतश्रमः स तैर्दृष्टो भूरजोधू सरद्युतिः । गन्धामलकपड्केन दिग्धमौलिमहातनुः ॥१५५॥ स्नानैकशाटकः श्रीमान् स्थितः स्नानोचितासने । नानावर्णपयःपूर्णकुम्भमण्डलमध्यगः ॥१५६॥ उक्तः स तैरहो रूपं साधु शुक्रेण वर्तितम् । मानुषस्य सतो देवचित्ताकर्षणकारणम् ॥१५७॥ तेनोक्तास्ते कृतस्नानं भुक्तवन्तं सभूषणम् । सुरा द्रक्ष्यथ मां स्तोकां वेलामत्रैव तिष्टत ॥१५८॥ एवमित्युदिते कृत्वा यः समस्तं यथोचितम् । स्थितः सिंहासने रलशेलकूटसमद्युतिः ॥१५॥ दृष्ट्वा तस्य पुनारूपं निनिन्दु कवासिनः । असारां धिगिमा शोमां मानां क्षणिकामिति ॥१६॥ प्रथमे दर्शने याऽस्य यौवनेन समन्विता । सेयं क्षणात् कथं हासं प्राप्ता सौदामिनीत्वरी ॥१६॥ विज्ञाय क्षणिकां लक्ष्मी सुरेभ्यो रागवर्जितः । श्रमणत्वं परिप्राप्य महाघोरतपोऽन्वितः ॥१६॥ वह सदा आत्मनिन्दामें तत्पर रहता था, आगत उपसर्गादिके सहने में धीर था, अपने शरीरसे अत्यन्त निःस्पृह रहता था, दया और दमको धारण करनेवाला था, बुद्धिमान् था, शीलरूपी काँवरका धारक था, शंका आदि सम्यग्दर्शनके आठ दोषोंसे बहुत दूर रहता था, और साधुओंकी यथायोग्य वैयावृत्त्यमें सदा लगा रहता था ॥१५०-१५१।। अन्तमें आयु समाप्त कर वह माहेन्द्र स्वर्गमें उत्पन्न हुआ और वहाँ देवियोंके समूहके मध्यमें स्थित हो परम भोगोंको प्राप्त हुआ।॥१५२।। तदनन्तर वहाँते च्युत होकर हस्तिनापुरमें राजा विजय और रानी सहदेवीके सनत्कुमार नामका चतुर्थ चक्रवती हुआ ।।१५३।।। एक बार सौधर्मेन्द्रने अपनी सभामें कथाके अनुक्रमसे सनत्कुमार चक्रवर्तीके रूपकी प्रशंसा की। सो आश्चयं उत्पन्न करनेवाले उसके रूपको देखनेके लिए कुछ देव आये ॥१५४॥ जिस समय उन देवोंने छिपकर उसे देखा उस समय वह व्यायाम कर निवृत्त हुआ था, उसके शरीरकी कान्ति अखाड़ेकी धूलिसे धूसरित हो रही थी, शिरमें सुगन्धित आँवलेका पंक लगा हुआ था, शरीर अत्यन्त ऊंचा था, स्नानके समय धारण करने योग्य एक वस्त्र पहने था, स्नानके योग्य आसनपर बैठा था, और नाना वर्णके सुगन्धित जलसे भरे हुए कलशोंके बीच में स्थित था ।।१५५१५६।। उसे देखकर देवोंने कहा कि अहो ! इन्द्रने जो इसके रूपकी प्रशंसा की है सो ठीक ही की है । मनुष्य होनेपर भी इसका रूप देवोंके चित्तको आकर्षित करनेका कारण बना हुआ है ॥१५७।। जब सनत्कुमारको पता चला कि देव लोग हमारा रूप देखना चाहते हैं तब उसने उनसे कहा कि आप लोग थोडी देर यहीं ठहरिए। मझे स्नान और भोजन करनेके बाद आभषण धारण कर लेने दीजिए फिर आप लोग मुझे देखें ॥१५८॥ ‘ऐसा ही हो' इस प्रकार कहनेपर चक्रवर्ती सनत्कुमार सब कार्य यथायोग्य कर सिंहासन पर आ बैठा । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो रत्नमय पर्वतका शिखर ही हो ॥१५९।। तदनन्तर पुनः उसका रूप देखकर देव लोग आपसमें निन्दा करने लगे कि मनुष्योंकी शोभा असार तथा क्षणिक है, अतः इसे धिक्कार है ॥१६०॥ प्रथम दर्शनके समय जो इसकी शोभा यौवनसे सम्पन्न देखी थी वह बिजलीके समान नश्वर होकर क्षण-भरमें ही ह्रासको कैसे प्राप्त हो गयी? ॥१६१|| लक्ष्मी क्षणिक है ऐसा देवोंसे जानकर चक्रवर्ती सनत्कुमारका राग छूट १. सहदेवीपुत्रः । २. विजयस्यापत्यं पुमान् वैजयिः । ३. भूसर म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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