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________________ ४२२ पद्मपुराणे श्रीशैलतुल्यैरथ खेचरेशैः सम्मान्यमानो बहुमानधारी । अभूशास्य क्षतसर्वशत्रुः त्रिखण्डनाथो हरिकण्ठतुल्यः ॥१२८॥ लङ्कानगों स विशालकान्तिः सुखेन रेमे पृथुभोगजेन । समस्तलोकस्य पूर्ति प्रयच्छन् यथा सुरेन्द्र सुरलोकपुर्याम् ॥१२९।। महानुभावः प्रमदाजनस्य स्तनेष्वसौ लालितरक्तपाणिः । विवेद नो दीर्घमपि व्यतीतं कालं प्रियावक्त्रतिगिञ्छभृङ्गः ॥१३०॥ एकापि यस्येह भवेद्विरूपा नरस्य जाया प्रतिकूलचेष्टा । रतेः पतित्वं स नरः करोति स्थितः सुखे संसृतिधर्मजाते ।।१३१॥ युक्तः प्रियाणां दशमिः सहस्रेस्तथाष्टभिः श्रीजनितोपमानाम् । महाप्रभावः किमुतैष राजा खण्डत्रयस्यानुपमानकान्तिः ।।१३२॥ वसन्ततिलकावृत्तम् एवं समस्तखगपैरमिनूयमानः संभ्रान्तसंनतपराङ्गतानुशिष्टिः । खण्डत्याधिपतिता विहिताभिषेकः साम्राज्यमाप जनतामिनुतं दशास्यः ॥१३३।। विद्याधराधिपतिपूजितपादपद्मः श्रीकीर्तिकान्तिपरिवारमनोज्ञदेहः । सर्वग्रहः परिवृतो दशवक्त्रराजो जातः शशाङ्क इव कस्य न चित्तहारी ॥१३४|| चक्रं सुदर्शनममोघममुष्य दिव्यं मध्याह्नभास्करकरोपममध्यजालम् । उद्वृत्तशत्रुनृपवर्गविनाशदक्षं रेजेऽरदृष्टमतिमासुररत्नचित्रम् ॥१३५।। दण्डश्च मृत्युरिव जातशरीरबन्धो दुष्टात्मनां भयकरः स्फुरितोग्रतेजाः। उल्कासमूह इव संगतवान् प्रचण्डो जज्वाल शस्त्रभवने प्रतिपन्नपूजः ॥१३६॥ अथानन्तर हनूमान् जैसे उत्तमोत्तम विद्याधर राजा जिसका सम्मान करते थे, जो अत्यधिक मानको धारण करनेवाला था. तीन खण्डका स्वामी था और हरिकण्ठके समान थ रावण समस्त शत्रओंसे रहित हो गया ॥१२८। जिस प्रकार इन्द्र स्वर्गलोकमें क्रीडा करता है उसी प्रकार समस्त लोकोंको आनन्द प्रदान करता हुआ विशाल कान्तिका धारक रावण विशाल भोगोंसे समुत्पन्न सुखसे लंका नगरीमें क्रीड़ा करने लगा ॥१२२॥ स्त्रियोंके मुखरूपी कमलका भ्रमर रावण स्त्रीजनोंके स्तनोंपर हाथ चलाता हुआ बोते हुए बहुत भारी कालको भी नहीं जान पाया अर्थात् कितना अधिक काल बीत गया इसका उसे पता ही नहीं चला ॥१३०॥ जिस मनुष्यके पास एक ही विरूप तथा निरन्तर झगड़नेवाली स्त्री होती है वह भी सांसारिक सुखमें निमग्न हो अपने आपको रतिपति अर्थात् कामदेव समझता है ॥१३१।। फिर रावण तो लक्ष्मीकी उपमा धारण करनेवाली अठारह हजार स्त्रियोंसे युक्त था, महाप्रभावशाली था, तीन खण्डका स्वामी था, अनुपम कान्तिका धारी था अतः उसके विषयमें क्या कहना है ? ॥१३२॥ इस प्रकार समस्त विद्याधर जिसकी स्तुति करते थे, सब लोग घबड़ाकर नम्राभूत मस्तकपर जिसकी आज्ञा धारण करते थे और तीन खण्डके राज्यपर जिसका अभिषेक किया गया था ऐसा रावण जनसमूहके द्वारा स्तुत साम्राज्यको प्राप्त हुआ ॥१३३।। समस्त विद्याधर राजा जिसके चरणकमलोंकी पूजा करते थे और जिसका शरीर श्री, कीर्ति और कान्तिसे मनोज्ञ था ऐसा रावण सर्वग्रहोंसे परिवृत चन्द्रमाके समान किसका मन हरण नहीं करता था ॥१३४|| जिसकी मध्यजाली मध्याह्नके सूर्यको किरणोंके समान थी, जो उद्दण्ड शत्रु राजाओंके नष्ट करनेमें समर्थ था, जिसके अर स्पष्ट दिखाई देते थे, तथा जो अत्यन्त देदीप्यमान रत्नोंसे चित्र-विचित्र जान पड़ता था ऐसा इसका सुदर्शन नामका अमोघ देवोपनीत चक्र अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ।।१३५॥ जिसका उग्रतेज सब ओर फैल रहा था १. प्रियामुखकमलमकरन्दभ्रमरः । २. राजा क.,ख., म., ब.ज. । 'राजाहःसप्तिभ्यष्टच्' इति टच् समासान्तः । न था ऐसा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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