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________________ ४२० पद्मपुराणे ततः पटेष्विन्द्रजितप्रधाना विद्याधराः सूचितशीलवंशाः । चित्रीकृताश्चित्रगुणा दुहित्रे प्रदर्शिताश्चारुरुचः पितृभ्याम् ॥१११॥ अनुक्रमात्साथ निरीक्षमाणा मुहुर्मुहुः संहृतनेत्रकान्तिः । सद्यः समाकृष्टविचेष्टदृष्टिर्बाला हनूमत्प्रतिमां ददर्श ॥११२॥ दृष्ट्वा च तं वायुसुतं पटस्थं सादृश्यनिर्मुक्तसमस्तदेहम् । अताडयतासौ मदनस्य बाणैः सुदुस्सहैः पञ्चभिरेककालम् ॥११३॥ तत्रानुरक्तामधिगम्य वाढमेतामुवाचेति सखी गुणज्ञा । अयं स बाले पवनंजयस्य श्रीशैलनामा तनयः प्रतीतः ॥११॥ गुणास्तवास्य प्रथिता पुरैव शोमा तु दुग्गोचरतां प्रयाता । एतेन साधं भज कामभोगान् पित्रोः प्रयच्छातिचिरेण निद्राम् ॥११५॥ वंशस्थवृत्तम् अहो पुनश्चित्रगतेन ते सता मनोविकारो जनितो हनूमता। सखीं वदन्तीमिति लज्जया नता जघान लीलाकमलेन कन्यका ॥१६॥ उपजातिवृत्तम् ततो विदित्वा जनकेन तस्या हृतं मनो मारुतनन्दनेन । *पटः समारूढसुताशरीरः संप्रेषितो वायुसुताय शीघ्रम् ॥११७॥ दूतो युवा श्रीनगरं समेत्य ज्ञातः प्रविष्टो विहितप्रणामः । हनमते दर्शयति स्म बिम्बं तारात्मजायाः पटमध्ययातम् ॥११८॥ कन्याके योग्य वरकी खोज करते हुए माता-पिता न रातमें सुखसे नींद लेते थे और न दिनमें चैन । उनका चित्त सदा इसी उलझनमें उलझा रहता था ॥११०।।। तदनन्तर जो नाना गुणोंके धारक थे, जिनकी कान्ति अत्यन्त मनोहर थी, और साथ ही जिनके शील तथा वंशका परिचय दिया गया था ऐसे इन्द्रजित् आदि प्रधान विद्याधरोंके चित्रपट लिखाकर माता-पिताने पुत्रीको दिखलाये ॥१११॥ अनुक्रमसे उन चित्रपटोंको देखकर कन्याने बार-बार अपनी दृष्टि संकुचित कर लो। अन्तमें हनूमान्का चित्रपट उसे दिखाया गया तो उस ओर उसकी दृष्टि शीघ्र ही आकर्षित होकर निश्चल हो गयी। उसे वह अनुरागसे देखती रही ॥११२।। तदनन्तर जिसका समस्त शरीर सदृशतासे रहित था ऐसे चित्रपटमें स्थित हनूमान्को देखकर वह कन्या एक ही साथ कामदेवके पाँचों दुःसह बाणोंसे ताड़ित हो गयी ॥११३॥ उसे हनूमान्में अनुरक्त देख गुणोंको जाननेवाली सखीने कहा कि हे बाले! यह पवनंजयका श्रीशैल नामसे प्रसिद्ध पुत्र है ।।११४।। इसके गुण तो तुम्हें पहलेसे ही विदित थे और सुन्दरता तुम्हारे नेत्रोंके सामने है इसलिए इसके साथ कामभोगको प्राप्त करो तथा माता-पिताको चिरकाल बाद निद्रा प्रदान करो अर्थात् निश्चिन्त होकर सोने दो ॥११५।। आश्चर्यकी बात है कि हनूमान्ने चित्रगत होकर भी तेरे मनमें विकार उत्पन्न कर दिया ऐसा कहती हुई सखीको कन्याने लज्जावनत हो लीलाकमलसे ताड़ित किया ।।११६।। तदनन्तर जब पिताको पता चला कि कन्याका मन पवनपुत्र हनूमानके द्वारा हरा गया है तब उसने शीघ्र ही हनूमान्के पास कन्याका चित्रपट भेजा ।।११७।। सो सुग्रीवका भेजा हुआ दूत श्रीनगर पहुंचा। वहां जाकर उसने अपना परिचय दिया, प्रणाम किया और उसके बाद हनूमान्के लिए ताराकी पुत्री पद्मरागाका चित्रपट दिखलाया ॥११८॥ १. निरीक्ष्यमाणा म.. ख..ज., ब.। २. तेन म. । ३. परः म.। ४ जातः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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