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________________ ४०४ पद्मपुराणे किं वा दुष्टेन केनापि नीता स्यात् खविचारिणा । कष्टं वार्तापि नो तस्याः केनचिन्मे निवेद्यते ॥४२॥ किं वा दुःखाच्युते गर्भ निर्वेदं परमागता । आर्यिकाणां पदं प्राप्ता भवेद्धर्मानुसेविनी ॥४३॥ चिन्तयन्निति पर्यट्य धरणी मतिविह्वलः । ददर्श न यदा कान्तां सर्वेन्द्रियमनोहराम् ॥४४॥ तदापश्यजगत्कृत्स्नं शून्यं विरहदीपितः । विनिश्चितमसौ चेतश्चकार मरणं प्रति ॥४५॥ न शैलेषु न वृक्षेषु न रम्यासु नदीष्वभूत् । तिरस्य विर्युक्तस्य तया सर्वस्वभूतया ॥४६॥ तस्या वार्तासु मुग्धेन तेन पृष्टा नगा अपि । विवेकेन हि निर्युक्ता जायन्ते दुःखिनो जनाः ॥४७॥ अथ भूतरवामिख्यं वनं प्राप्य गजादसौ। अवतीर्य क्षणं स्थित्वा ध्यायन्मुनिरिव प्रियाम् ॥४८॥ अनादरेण निक्षिप्य धरण्यामस्त्रकङ्कटम् । धनपादपशाखाग्रतिरोहितमहातपः ॥४९॥ जगाद गजनाथं तं विनयेन पुरःस्थितम् । गिरा मधुरयात्यर्थ श्रमेण गुरुणान्वितः ॥५०॥ ब्रजेदानी गजेन्द्र त्वं भव स्वच्छन्दविभ्रमः । तस्या वार्तासु मुग्धेन क्षमस्व च पराभवम् ॥५१॥ तीरेऽस्याः सरितः शष्पं शल्लकीनां च पल्लवान् । चरन् विहर यूथेनं करिणीनां समन्वितः ॥५२॥ इत्युक्तः सुकृतज्ञोऽली स्वामिवात्सल्यदक्षिणः । न मुमोचान्तिकं तस्य शोकार्तस्य सुबन्धुवत् ॥५३॥ लप्स्ये चदि न तां रामामभिराममहं ततः । यास्याम्यत्र वने मृत्युमिति वायुर्विनिश्चितः ॥५४॥ प्रियागतमनस्कस्य तस्य रात्रिरभूद्वने । शरञ्चतुष्टयोदारा नानासंकल्पसंकुला ॥५५॥ अथवा कोई आकाशगामी दुष्ट विद्याधर हर ले गया हो। बड़े खेदकी बात है कि कोई मेरे लिए उसका समाचार भी नहीं बतलाता ||४२।। अथवा दुःखके कारण गर्भ-भ्रष्ट हो आर्यिकाओंके स्थानमें चली गयी हो ? धर्मानुगामिनी तो वह थी ही ॥४३॥ इस प्रकार विचार करते हुए बुद्धि-विह्वल पवनंजयने पृथिवीमें विहारकर जब समस्त इन्द्रियों और मनको हरनेवाली प्रियाको नहीं देखा ॥४४॥ तब विरहसे जलते हुए उसने समस्त संसारको सूना देख चित्तमें मरनेका दृढ़ निश्चय किया ॥४५।। अंजना ही पवनंजयकी सर्वस्वभूत थी अतः उसके बिना उसे न पर्वतोंमें आनन्द आता था, न वृक्षोंमें और न मनोहर नदियोंमें ही ॥४६।। योंही पवनंजयने उसका समाचार जाननेके लिए वृक्षोंसे भी पूछा सो ठीक ही है क्योंकि दुःखीजन विवेकसे रहित हो ही जाते हैं ॥४७॥ अथानन्तर भूतरव नामक वनमें जाकर वह हाथीसे उतरा और प्रियाका ध्यान करता हुआ क्षण-भरके लिए मुनिके समान स्थिर बैठ गया ।।४८॥ सघन वृक्षोंकी शाखाओंके अग्रभाग उसपर पड़ते हुए घामको रोके हुए थे। वहाँ उसने शस्त्र तथा कवच उतारकर अनादरसे पृथिवीपर फेंक दिये ॥४९॥ अम्बरगोचर नामका हाथी बड़ी विनयसे उसके सामने बैठा था और पवनंजय अत्यधिक थकावटसे युक्त थे। उन्होंने अत्यन्त मधुर वाणीमें हाथीसे कहा कि ॥५०॥ हे गजराज ! अब तुम जाओ, जहाँ तुम्हारी इच्छा चाहे भ्रमण करो, अंजनाका समाचार जाननेके लिए मोहसे युक्त होकर मैंने तुम्हारा जो पराभव किया है उसे क्षमा करो ॥५१॥ इस नदीके किनारे हरी-हरी घास और शल्लके वृक्षके पल्लवोंको खाते हुए तुम हस्तिनियोंके झुण्डके साथ यथेच्छ भ्रमण करो ॥५२।। पवनंजयने हाथीसे यह सब कहा अवश्य पर वह किये हुए उपकारको जाननेवाला था और स्वामीके साथ स्नेह करनेमें उदार था इसलिए उसने उत्तम बन्धुकी तरह शोकपीड़ित स्वामीका समीप्य नहीं छोड़ा ।।५३।। पवनंजयने यह निश्चय कर लिया था कि यदि मैं उस मनोहारिणी प्रियाको नहीं पाऊँगा तो इस वनमें मर जाऊँगा ॥५४॥ जिसका मन प्रियामें लग रहा था ऐसे पवनंजयकी नाना संकल्पोंसे युक्त एक रात्रि वनमें चार वर्षसे भी अधिक बड़ी मालूम हुई १. मे न विद्यते म., ख., ब., ज. । २. दुःखात्सुते ख. । ३. कृष्णं म.। ४. विप्रयुक्तस्य म.। ५. 'उरश्छदः कङ्कटकोऽजगरः कवचोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । -मस्त्रकंटकम् म.। ६. शस्यं म.। ७. सार्थेन क.। ८. वर्षचतुष्टयादप्यधिका। 'हायनोऽस्त्री शरत्समा इत्यमरः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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