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________________ सप्तवर्श पर्व ३९३ अथान्यदाअनावोचत् कुक्षिमें चलितः सखि । आकुलेव च जातास्मि किमिदं नु भविष्यति ॥३०५॥ ततो वसन्तमालोचे समयः शोभने तव । अवश्यं प्रसवस्यैष प्राप्तो भव सुखस्थिता ॥३०६॥ ततो विरचिते तल्पे तया कोमलपल्लवैः । असूत सा सुतं चाव: प्राचीवाशा विरोचनम् ॥३०७॥ जातेन सा गुहा तेन तेजसा गात्रजन्मना । हिरण्मयीव संजात. नितध्वान्तसंचया ॥३०८॥ ततस्तमङ्कमारोप्य प्रमोदस्यापि गोचरे । स्मृतोमयकुला दैन्यं प्राप्ता प्ररुदितामवत् ॥३९॥ विललाप महावत्स ! कथं ते जननोत्सवः । क्रियता मैयकैतस्मिञ्जनस्य गहने वने ॥३१०॥ स्थानेऽजनिष्यथाश्चत्वं पितुर्मातामहस्य वा । अमविष्यन्महानन्दो जननोन्मत्तकारकः ॥३११॥ मुखचन्द्रमिमं दृष्ट्वा तव चारुविलोचनम् । न मवेद्विस्मयं कस्य भुवने शुमचेतसः ॥३१२॥ करोमि मन्दभाग्या किं सर्ववस्तुविवर्जिता । विधिनाहं दशामेतां प्रापिता दुःखदायिनीम् ॥३१३॥ जन्तुना सर्ववस्तुभ्यो वान्छयते दीर्घजीविता । यस्मात्त्वं जीवितात्तस्मान्मम वत्स परां स्थितिम् ॥३१॥ ईदृशे पतितारण्ये सद्यः प्राणापनोदिनि । यजीवामि तवैवायमनुमावः सुकर्मणः ॥३१५॥ मुञ्चन्तीमिति तां वाचं जगादैवं हिता सखी । देवि कल्याणपूर्णा स्वं या प्राप्तासीदृशं सुतम् ॥३१६॥ चारुलक्षणपूर्णोऽयं दृश्यतेऽस्य शुभा तनुः । अत्यन्तमहतीमृद्धिं वहत्येषा मनोहरा ॥३१७॥ षट्पदैः कृतसंगीताश्चलत्कोमलपल्लवाः । तव पुत्रोत्सवादेता नृत्यन्तीव लताङ्गनाः ॥३१८॥ तवास्य चानुभावेन बालस्याबालतेजसः । भविष्यस्यखिलं भद्रं मोन्मनीभूरनर्थकम् ॥३१९॥ अथानन्तर किसी दिन अंजना बोली कि हे सखि ! मेरी कूख चंचल हो रही है और मैं व्याकुल-सी हई जा रही है, यह क्या होगा? ||३०५॥ तब वसन्तमालाने कहा कि हे शोभने! अवश्य ही तेरे प्रसवका समय आ पहुँचा है इसलिए सुखसे बैठ जाओ ॥३०६॥ तदनन्तर वसन्तमालाने कोमल पल्लवोंसे शय्या बनायी सो उसपर, जिस प्रकार पूर्व दिशा सूर्यको उत्पन्न करती है उसी प्रकार अंजना सुन्दरीने पुत्र उत्पन्न किया ॥३०७|| पुत्र उत्पन्न होते ही उसके शरीर सम्बन्धी तेजसे गुफाका समस्त अन्धकार नष्ट हो गया और गुफा ऐसी हो गयी मानो सुवर्णकी ही बनी हो ॥३०८।। यद्यपि वह हर्षका समय था तो भी अंजना दोनों कुलोंका स्मरण कर दीनताको प्राप्त हो रही थी और इसीलिए वह पुत्रको गोदमें ले रोने लगी ॥३०९।। वह विलाप करने लगी कि हे वत्स ! मनुष्य के लिए भय उत्पन्न करनेवाले इस सघन वनमें मैं तेरा जन्मोत्सव कैसे करूं ? ॥३१०।। यदि तू पिता अथवा नानाके घर उत्पन्न हुआ होता तो मनुष्योंको उन्मत्त बना देनेवाला महा-आनन्द मनाया जाता ॥३११।। सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित तेरे इस मुखचन्द्रको देखकर संसारमें किस सहृदय मनुष्यको आश्चर्य उत्पन्न नहीं होगा ॥३१२॥ क्या करूँ ? मैं मन्दभागिनी सब वस्तुओंसे रहित हूँ। विधाताने मुझे यह सर्वदुःख-दायिनी अवस्था प्राप्त करायी है ॥३१३।। चूंकि संसारके प्राणी सब वस्तओंसे पहले दीर्घायष्यकी ही इच्छा रखते हैं इसलिए हे वत्स ! मेरा आशीर्वाद है कि तू उत्कृष्ट स्थिति पर्यन्त जीवित रहे ॥३१४॥ तत्काल प्राण हरण करनेवाले ऐसे जंगल में पड़ी रहकर भी जो मैं जीवित हूँ यह तुम्हारे पुण्य कर्मका ही प्रभाव है ॥३१५।। इस प्रकार वचन बोलती हुई अंजनासे हितकारिणी सखीने कहा कि हे देवि ! चूँकि तुमने ऐसा पुत्र प्राप्त किया है इसलिए तुम कल्याणोंसे परिपूर्ण हो ॥३१६।। यह पुत्र उत्तम लक्षणोंसे युक्त दिखाई देता है। इसका यह शुभ सुन्दर शरीर अत्यधिक सम्पदाको धारण कर रहा है ॥३१७॥ जिनपर भ्रमर संगीत कर रहे हैं और जिनके कोमल पल्लव हिल रहे हैं ऐसी ये लताएँ तुम्हारे पुत्रके जन्मोत्सवसे मानो नृत्य ही कर रही हैं ।।३१८॥ उत्कट तेजको धारण करनेवाले इस बालकके प्रभावसे सब कुछ ठीक होगा । तुम व्यर्थ ही खेद-खिन्न न हो ॥३१९॥ १. गोचरम् म. । २. दैन्यप्राप्ता म., ज., क., ख.। ३. किं मयतस्मिन् म.। ५० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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