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________________ ३८२ पद्मपुराणे पुरुसंवेगसंपन्नो विदितासारसंस्मृतिः । लक्ष्मीतिलकसंज्ञस्य मुनेरानच्छे शिष्यताम् ॥१५॥ अनुपाल्य समीचीनं व्रतं जिनवरोदितम् । अनित्यत्वादिभिः कृत्वा चेतना भावनामयीम् ॥१५९॥ तपः कापुरुषाचिन्त्यं तप्त्वा तन्वादरोज्झितम् । रत्नत्रितयतो जातां दधानः परमार्थताम् ॥१६॥ नानालब्धिसमुत्पत्तेः शक्तोऽप्यहितवारणे । परीषहरिपून घोरानधिसह्य सुमानसः ॥१६॥ आयुर्विराममासाद्य ध्यानमास्थाय निर्मलम् । ज्योतिषां पटलं भित्त्वा लान्तवेऽभत् सुरो महान् ॥१६२।। इच्छानुरूपमासाद्य तत्र मोगं परस्थितिः । छमस्थजनधीवाचां स्थितं संचेक्ष्य [संत्यज्य] गोचरम् ।। १६३॥ व्युत्वा पुण्यावशेषेण प्रेरितः परमोदयः । कुक्षिमस्या विवेशायं जीवः सौख्यस्य भाजनम् ॥१६॥ एवं तावदयं गर्भः स्वामिन्यास्ते तनुं श्रितः । हेतुं विरहदुःखस्य शृणु कल्याणचेष्टिते ॥१६५॥ भवेऽस्याः कनकोदर्या लक्ष्मी म सपत्न्यभूत् । सम्यग्दर्शनपूतास्मा साधुपूजनतत्परा ॥१६६॥ प्रतिमा देवदेवानां प्रतीके सद्मनस्तया । स्थापयित्वार्चिता भक्त्या स्तुतिमङ्गलवक्त्रया ॥१६॥ महादेव्यभिमानेन सपन्यै क्रुद्धया तया । चक्रे बाह्यावकाशेऽसौ जिनेन्द्र प्रतियातना ॥१६८॥ अत्रान्तरेऽविशद् गेहमस्या मिक्षार्थमार्यिका । संयमश्रीरिति ख्याता तपसा विष्टपेऽखिले ॥१६९॥ ततः परिभवं दृष्ट्वा साप्यहत्प्रतियातनम् । ययावतिपरं दुःखं पारणापेतमानसा ॥१७॥ विरक्त हो गया। तदनन्तर जो बहुत भारी संवेगसे युक्त था और संसारकी असारताको जिसने अच्छी तरह समझ लिया था ऐसा सिंहवाहन लक्ष्मीतिलक नामक मुनिका शिष्य हो गया अर्थात् उनके पास उसने दीक्षा धारण कर ली ॥१५७-१५८॥ जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए उत्तम व्रतका अच्छी तरह पालन कर उसने अनित्य आदि भावनाओंके चिन्तवनसे अपनी आत्माको प्रभावित किया ॥१५९।। शरीरका आदर छोडकर उसने ऐसा कठिन तपश्चरण किया कि का जिसका विचार भी नहीं कर सकते थे। वह सदा रत्नत्रयके प्रभावसे उत्पन्न होनेवाली परमार्थताको धारण करता था ॥१६०॥ नाना प्रकारकी ऋद्धियाँ उत्पन्न होनेसे यद्यपि वह अनिष्ट पदार्थोंका निवारण करने में समर्थ था तो भी शान्त हृदयसे उसने परीषहरूपी घोर शत्रुओंका कष्ट सहन किया था ॥१६१॥ आयुका अन्त आनेपर वह निर्मल ध्यानमें लीन हो गया और ज्योतिषी देवोंका पटल भेदन कर अर्थात् उससे ऊपर जाकर लान्तव स्वर्गमें उत्कृष्ट देव हुआ ॥१६२॥ वहाँ वह उत्कृष्ट स्थितिका धारी हुआ और छद्मस्थ जीवोंके ज्ञान तथा वचन दीनोंसे परे रहनेवाले इच्छानुकूल भोगोंका उपभोग करने लगा ॥१६३।। परम अभ्युदयसे सहित तथा सुखका पात्रभूत, इसी देवका जीव लान्तव स्वर्गसे च्युत होकर बाकी बचे पुण्यसे प्रेरित होता हुआ इस अंजनाके गर्भ में प्रविष्ट हुआ है ॥१६४।। इस प्रकार जो गर्भ तेरी स्वामिनीके शरीरमें प्रविष्ट हुआ है उसका वर्णन किया। अब हे शुभ चेष्टाकी धारक वसन्तमाले ! इसके विरह-जन्य दुःखका कारण कहता हूँ सो सुन ॥१६५।। जब यह अजना कनकोदराक भवमें थी तब इसकी लक्ष्मी नामक सोत थो। उसको आत्मा सम्यग्दर्शनसे पवित्र थी और वह सदा मनियोंकी पूजा करने में तत्पर रहती थी॥१६६।। उसने घरके एक भागमें देवाधिदेव जिनेन्द्र देवकी प्रतिमा स्थापित कराकर भक्तिपूर्वक मुखसे स्तुतियाँ पढ़ती हुई उसकी पूजा की थी ॥१६७।। कनकोदरी महादेवी थी इसलिए उसने अभिमानवश सोतके प्रति बहुत ही क्रोध प्रकट किया। इतना ही नहीं जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाको घरके बाहरी भागमें फिंकवा दिया ॥१६८।। इसी बीचमे संयमश्री नामक आर्यिकाने भिक्षाके लिए इसके घरमें प्रवेश किया। संयमश्री अपने तपके कारण समस्त संसारमें प्रसिद्ध थीं ॥१६९।। तदनन्तर जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाका १. तन्नादरो- क. । तप्त्वा ब, ज. । २. जातं म. | ३. समुत्पन्नः म. । ४. परिस्थिति ख., ब.। ५. संवक्ष्य ज. । उल्लङ्घच इति ब. पुस्तके टिप्पणम् । ६. वाप्यावकाशे। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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