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________________ षोडशं पर्व ३६५ ततो नितम्बफलकं दृष्ट्वास्या वसनोज्झितम् । उवाह हृदयं वायुर्मनोभूवेगरङ्गितम् ॥१९०॥ अथ केगापि वेगेन परायत्तीकृतात्मना । गृहीता दयिता गाढं पवनेनाब्जकोमला ॥१९१॥ यथा ब्रवीति वैदग्ध्यं यथाज्ञापयति स्मरः । अनुरागो यथा शिक्षा प्रयच्छति महोदयः ॥१९२॥ तथा तयो रतिः प्राप्ता दम्पत्योर्वृद्धिमुत्तमाम् । काले तत्र हि यो मावो नैवाख्यातुं स पार्यते ॥१९३॥ स्तनयोः कुम्भयोरेप जघने चाङ्गनोत्तमाम् । आस्फालयन् समारूढो मनोभवमहागजम् ॥१९॥ तिष्ठ मञ्च गृहाणेति नानाशब्दसमाकुलम् । तयोर्युद्धमिवोदारं रतमासीत्सविभ्रमाम् ॥१९५॥ अधरग्रहणे तस्याः पुरुसीत्कारपूर्वकम् । प्रविधूतः करो रेजे लताया इव पल्लवः ॥१९६॥ प्रियदत्ता नवास्तस्य नखाङ्का जघने बभुः । वैडूर्यजगतीभागे पद्मरागोद्गमा इव ॥१९७॥ तस्याः 'सेचनकत्वं तु जगाम जघनस्थलम् । निमेषमुक्ततनिष्ठमुकुलीभूतचक्षुषः ॥१९८॥ वलयानां रणकारः कलालापसमन्वितः । तदा मनोहरो जज्ञे भ्रमरोघरवोपमः ॥१९९॥ तस्यास्ते काम्यमानाया नेत्रकेकरतारके । मुकुले दधतुः शोभां चलालीन्दीवरस्थिताम् ॥२०॥ प्रस्वेदबिन्दुनिकरस्तस्या मुखकुचोद्गतः । स्वच्छमुक्ताफलाकारो रतस्यान्तेऽत्यराजत ॥२०१॥ रदग्रहारुणीभूतं साधरं बिभ्रती बभौ । पलाशवनराजीव समुद्भूतैककिंशुका ॥२०२॥ प्रियभुक्ता तनुस्तस्या ऊहे कान्तिमनुत्तमाम् । कनकाद्रितटाश्लिष्टघनपङ्क्तिकृतोपमाम् ॥२०३॥ के लिए उतावली करनेवाले पवनंजयके हाथको लज्जासे भरी अंजना रोकना तो चाहती थी पर उसका हाथ इतना अधिक काँप रहा था कि उससे वह रोकने में समर्थ नहीं हो सकी ॥१८९|| तदनन्तर वस्त्ररहित अंजनाका नितम्बफलक देखकर पवनंजयका हृदय कामके वेगसे चंचल हो गया ॥१९०।। तत्पश्चात् किसी अद्भुत वेगसे जिसकी आत्मा विवश हो रही थी ऐसे पवनंजयने कमलके समान कोमल अंजनाको कसकर पकड़ लिया ।।१९१॥ तदनन्तर चतुराई जो बात कहती थी, काम जैसी आज्ञा देता था, और बढ़ा हुआ अनुराग जैसी शिक्षा देता था 'वैसी ही उन दोनों' दम्पतियोंकी रति-क्रिया उत्तम वृद्धिको प्राप्त हुई। उस समय उन दोनोंके मनका जो भाव था वह शब्दों द्वारा नहीं कहा जा सकता ॥१९२-१९३॥ परम सन्दरी अंजनाके स्तनरूपी कलश तथा नितम्ब-स्थलका आस्फालन करते हए पवनंजय कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथीपर आरूढ़ थे ॥१९४॥ 'ठहरो', 'छोड़ो, 'पकड़ो' आदि नाना शब्दोंसे युक्त तथा हाव-भाव विभ्रमसे भरा उनका रत किसी महायुद्धके समान जान पड़ता था ||१९५।। अधरोष्ठको ग्रहण करते समय जोरसे सी-सी करती हुई अंजना जो हाथ हिलाती थी वह ऐसा जान पड़ता था मानो किसी लताका पल्लव ही हिल रहा हो ।।१९६।। अंजनाके नितम्ब-स्थलपर पवनंजयने जो नये-नये नखक्षत दिये थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो नीलमणिको भूमिमें पद्मरागमणि ही निकल रहे हों ॥१९७।। अंजनाका जघन-स्थल देखते-देखते पवनंजयको तृप्ति ही नहीं होती थी। वह अपने टिमकाररहित नेत्र उसीपर गड़ाये बैठे थे ॥१९८|| मधुर आलापसे सहित उसकी चूड़ियोंकी मनोहर रुनझुन ऐसी जान पड़ती थी मानो भ्रमरोंके समूह ही गुंजार कर रहे हों ॥१९९।। अंजनाके नेत्रोंके कटाक्ष और पुतलियां ऐसी जान पड़ती थीं मानो चंचल भ्रमरोंसे युक्त नील कमलोंकी शोभा ही धारण कर रही हो ॥२००॥ सम्भोगके अनन्तर अंजनाके मुख तथा स्तनोंके ऊपर जो पसीनोंकी बूंदोंका समूह प्रकट हुआ था वह ऐसा जान पड़ता था मानो स्वच्छ मोतियोंका समूह ही हो ।।२०१॥ दन्ताघातके कारण उसका अधरोष्ठ लाल-लाल हो गया था। उसे धारण करती हुई वह ऐसी जान पड़ती थी मानो जिसमें एक फूल आया है ऐसे टेसूके वनकी पंक्ति ही हो ॥२०२॥ पतिके द्वारा उपभुक्त १. अतृप्तिकरत्वम् । २. स्थिती म. । ३. किंशुकः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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