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________________ षोडशं पवं ततः क्षणं स्थिता चेदं जगादाज्जनसुन्दरी । प्रतिनिस्वनवत्येवं सख्यनूदितया गिरा ॥ १६४॥ असंभाव्यमिदं भद्र यया वर्ष जलोज्झितम् । भवत्यप्यथवा काले कल्याणं कर्मचोदितम् ॥ १६५॥ तथास्तु स्वागतं तस्य जीवितस्येशितुर्मम । अद्य मे फलितः पूर्व शुभानुष्ठानपादपः ।। १६६ ।। वदन्त्यामेवमेतस्यामानन्दस्राप्तचक्षुषि । तत्सख्येवान्तिकं नीतस्तस्याः करुणया प्रियः ॥ १६७॥ त्रस्तसारङ्गकान्ताक्षी दृष्ट्वा तं परमोत्सवम् । जानु द्वयासकृन्न्यस्तस्रस्तपाणिसरोरुहा ॥ १६८ ॥ स्तम्भवत्प्रसृताकाण्डा वेपथुश्रितविग्रहा । शनैरुत्थातुमारब्धा शयनस्था प्रयासिनी ॥ १६९ ॥ अथालमलमेतेन देवि क्लेशविधायिना । संभ्रमेणेति वचनं विमुञ्चन्नमृतोपमम् ॥१७० ॥ समुत्थितां प्रियां कृच्छ्रादञ्जलिं बधुमुद्यताम् । गृहीत्वा दयितः पाणौ शयने समुपाविशत् ॥१७१॥ * स्वेदी पाणिरसौ तस्याः परमं पुलकं वहन् । प्रियस्पर्शामृतेनेव सिक्तो व्यामुञ्चदङ्कुरान् ।।१७२ ।। नत्वा वसन्तमाला तं कृत्वा भाषणमादरात् । साकं प्रहसितेनास्थाद्रम्ये कक्षान्तरे सुखम् ॥१७३॥ अथानादरतः पूर्वं त्रपमाणः स्वयंकृतात् । पवनः कुशलं प्रष्टुं न प्रावर्तत चेतसा ॥ १७४॥ विलक्षस्तु प्रिये मृष्य मया कर्मानुभावतः । निकारं कृतमित्यूचे तत्क्षणाकुलमानसः ।।१७५।। आद्यसंभाषणात्सापि वहन्ती नतमाननम् । जगाद मन्दया वाचा निश्चलाखिलविग्रहा ।।१७६।। ४ तदनन्तर अंजनासुन्दरी क्षण-भर के लिए चुप हो रही । उसके बाद उसने सखीके द्वारा अनूदित वचनों के द्वारा उत्तर दिया । सखी जो वचन कह रही थी वे अंजनाकी प्रतिध्वनिके समान जान पड़ते थे || १६४|| उसने कहा कि हे भद्र ! जिस प्रकार जलसे रहित वर्षाका होना असम्भव है उसी प्रकार उनका आना भी असम्भव है । अथवा इस समय मेरे किसी शुभ कार्यंका उदय हुआ हो जिससे तुम्हारा कहना सम्भव भी हो सकता है || १६५॥ अस्तु, यदि प्राणनाथ आये हैं तो मैं उनका स्वागत करती हूँ। मेरा पूर्वोपार्जित पुण्यकर्मरूपी वृक्ष आज फलीभूत हुआ है || १६६ || इस प्रकार नेत्रोंमें हर्षंके आँसू भरे हुई अंजनासुन्दरी यह कह ही रही थी कि सखी के समान करुणा प्राणनाथको उसके समीप ले आयी || १६७ | उस समय अंजना शय्यापर बैठी थी । ज्यों ही उसने परम आनन्दके देनेवाले प्राणनाथको समीप आते देखा त्यों ही वह उठनेका प्रयास करने लगी । उसके नेत्र भयभीत हरिणके समान सुन्दर थे, वह खड़ी होनेके लिए अपने घुटनों पर बार-बार हस्त- कमल रखती थी पर वे दुर्बलताके कारण नीचे खिसक जाते थे । उसकी जाँघें खम्भेके समान अकड़ गयी थीं और सारा शरीर काँपने लगा था ।। १६८ - १६९ || यह देख पवनंजयने अमृततुल्य निम्न वचन कहे कि हे देवि ! रहने दो, क्लेश उत्पन्न करनेवाले इस सम्भ्रमसे क्या प्रयोजन है ? || १७० || इतना कहने पर भी अंजना बड़े कष्टसे खड़ी होकर हाथ जोड़नेका उद्यम करने लगी कि पवनंजयने उसका हाथ पकड़कर उसे शय्यापर बैठा दिया || १७१ || अंजनाका वह हाथ पसीनासे युक्त हो गया और रोमांच धारण करने लगा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पतिके स्पशंरूपी अमृत से सींचा जाकर अंकुर ही धारण कर रहा था || १७२ ॥ वसन्तमालाने पवनंजयको नमस्कार कर आदरपूर्वक उसके साथ वार्तालाप किया । तदनन्तर वह प्रहसित के साथ एक दूसरे सुन्दर कमरे में सुख से बैठ गयी ॥ १७३ ॥ अथानन्तर चूँकि पवनंजय अपने द्वारा किये हुए अनादरसे लज्जित हो रहा था अतः सर्वप्रथम कुशल समाचार पूछने के लिए वह हृदयसे प्रवृत्त नहीं हो सका || १७४ ॥ तदनन्तर लज्जित होते हुए उसने कहा कि हे प्रिये ! मैंने कर्मोदयके प्रभावसे तुम्हारा जो तिरस्कार किया है उसे क्षमा करो । यह कहते समय पवनंजयका मन अत्यन्त आकुल हो रहा था || १७५ || अंजनाका १. क्षणस्थिता ख. । २. - मानन्दात्प्राप्तचक्षुषि म. । ३ जङ्घाकाण्डा । ४. स्वेदयुक्तः । ५. क्षमस्व । Jain Education International ३६३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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