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________________ षोश पर्व तत्र चैकाकिनीमेकामाकुला चक्रवाकिकाम् । वियोगानलसंतप्ता नानाचेष्टितकारिणीम् ॥१०७॥ अस्ताचलसमासनमानुबिम्बगतेक्षणाम् । पमिनीदलरन्ध्रेषु मुहुय॑स्तनिरीक्षणाम् ॥१०॥ धुन्वानां पक्षती वेगापातोपातकृतभ्रमाम् । मृणालशकलस्वादु पश्यन्तीं दुःखितां विषम् ॥१०९॥ प्रतिबिम्बं निजं दृष्ट्वा जले दयितशतिनीम् । आह्वयन्तीं तदप्राप्त्या व्रजतीं परमां शुचम् ॥११०॥ नानादेशोद्भवं श्रुत्वा प्रतिशब्दं प्रियाशया। भ्रमं चक्रमिवारूढां कुर्वन्तीं साधुलोचनाम् ॥११॥ तटपादपमारुह्य न्यस्यन्ती दिक्षु लोचने । तत्रादृष्ट्वा पुनः पातमाचरन्ती महाजवम् ॥११२॥ उन्नयन्ती रजो दूरं पद्मानां पक्षधूति मिः । चिरं तद्गतया दृष्टया ददर्शासौ कृपाहृतः ॥११३॥ इति चाचिन्तयत्कष्टं प्राप्तमस्या इदं परम् । यस्त्रियेण विमुक्तेयं दह्यते शोकव हिना ॥११॥ तदेवेदं सरो रम्यं चन्द्रचन्दनशीतलम् । दावकल्पमभूदस्याः प्राप्य नाथवियुक्तताम् ॥११५॥ रमणेन वियुक्तायाः पल्लवोऽप्येति खड्गताम् । चन्द्रांशुरपि वज्रत्वं स्वर्गोऽपि नरकायते ॥११६॥ इति चिन्तयतस्तस्य प्रियायां मानसं गतम् । तत्प्रीत्या चैक्षतोद्देशांस्तद्विवाहे निषेवितान् ॥११७॥ चक्षुषो गोचरीभूतास्तस्य ते शोकहेतवः । बभूवुर्मर्मभेदानां कर्तार इव दुःसहाः ॥११८॥ अध्यासीच्चेति हा कष्टं मया सा करचेतसा । मुक्तेयमिव चक्राह्वा वैक्लव्यं दयितागमत् ॥११९॥ यदि नाम तदा तस्याः सख्याभाष्यत निष्ठुरम् । ततोऽन्यदीयदोषेण कस्मारसा वर्जिता मया ॥१२०॥ मध्यमें भ्रमरियोंका उत्कृष्ट झंकार सुनाई देता था ॥१०६।। उसी सरोवरके किनारे पवनंजयने एक चकवी देखी। वह चकवी अकेली होनेसे अत्यन्त व्याकुल थी, वियोगरूपी अग्निसे सन्तप्त थी, नाना प्रकारकी चेष्टाएँ कर रही थी, अस्ताचलके निकटवर्ती सूर्यबिम्बपर उसके नेत्र पड़ रहे थे, वह बार-बार कमलिनीके पत्तोंके विवरोंमें नेत्र डालती थी, वेगसे पंखोंको फड़फड़ाती थी, बार-बार ऊपर उड़कर तथा नीचे उतरकर खेदखिन्न हो रही थी, मृणालके टुकड़ोंसे स्वादिष्ट जलकी ओर देखकर दुःखी हो रही थी, पानीके भीतर अपना प्रतिबिम्ब देखकर पतिकी आशंकासे उसे बुलाती थी और अन्तमें उसके न आनेसे अत्यधिक शोक करती थी, नाना स्थानोंसे जो प्रतिध्वनि आती थी उसे सुनकर 'कहीं पति तो नहीं बोल रहा है' इस आशासे वह चक्रारूढ़की तरह गोल चक्कर लगाती लगाता था, उसके नेत्र सुन्दर थे, वह किनारेके वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओं में नेत्र डालती थी और वहाँ जब पतिको नहीं देखती थी तब बड़े वेगसे पुनः नीचे आ जाती थी, तथा पंखोंकी फड़फड़ाहटसे कमलोंकी परागको दूर तक उड़ा रही थी। पवनंजय दयाके वशीभूत हो उसकी सोर दृष्टि लगाकर देर तक देखता रहा ॥१०७-११३॥ चकवीको जो अत्यधिक दुःख प्राप्त हो रहा था उसीका वह इस प्रकार चिन्तवन करने लगा। वह विचारने लगा कि पतिसे वियुक्त हुई यह चकवी शोकरूपी अग्निसे जल रही है ॥११४॥ यह वही चन्द्रमा और चन्दनके समान शीतल, मनोहर सरोवर है पर पतिका वियोग पाकर इसे दावानलके समान हो रहा है ।।११५।। पतिसे रहित स्त्रियोंके लिए पल्लव भी तलवारका काम करता है, चन्द्रमाकी किरण भी वज्र बन जाती है और स्वर्ग भी नरक-जैसा हो जाता है ॥११६|| ऐसा विचार करते हुए उसका मन अपनी प्रिया अंजनासुन्दरीपर गया और उसी में प्रेम नेके कारण उसने विवाहके समय सेवित स्थानोंको बडे गौरसे देखा ॥११७॥ वे सब स्थान उसके नेत्रोंके सामने आनेपर शोकके कारण हो गये और मर्म भेद करनेवालोंके समान दुःसह हो उठे ॥११८॥ वह मन ही मन सोचने लगा कि हाय-हाय बड़े कष्टकी बात है-मुझ दुष्ट चित्तके द्वारा छोड़ी हुई वह प्रिया भी इस चकवीके समान दुःखको प्राप्त हो रही होगी ॥११९॥ यदि उस समय उसकी सखीने कठोर शब्द कहे थे तो दूसरेके दोषसे मैंने उसे क्यों छोड़ दिया? ॥१२०।। १. कृपादृतः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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