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________________ पञ्चदशं पवं संगमोत्कण्ठितः सोऽयमेभिर्मन्मथसंभवैः । पूरितो दशभिर्वेगैर्भटो बाणैरिवाहवे ||१५|| आ तद्विषया चिन्ता वेगे समुपजायते । द्वितीये द्रष्टुमाकारो बहिः समभिलष्यते ॥ ९६ ॥ तृतीये मन्ददीर्घोष्णनिः श्वासानां विनिर्गमः । चतुर्थे संज्वरो दृष्टज्वलनोपमचन्दनः || ९७ || विवर्तः पञ्चमेऽङ्गस्य कुसुमप्रस्तरादिषु । मन्यते विविधं स्वादु षष्ठे भक्तं विषोपमम् ||१८|| सप्तमे तरकथासक्त्या विप्रलापसमुद्भवः । उन्मत्तताष्टमे गीतनृत्यविभ्रमकारिणी ॥९९॥ मनोरगदष्टस्य नवमे मूर्च्छनोद्भवः । दशमे दुःखसंमारः स्वसंवेद्यः प्रवर्तते ॥ १०० ॥ विवेकिनोऽपि तस्येदं तदा जातमनङ्कुशम् । चरितं वायुवेगस्य हताशं धिगनङ्गकम् ॥१०१॥ अथ चेतोभुवो वेगैरसौ धैर्यात्परिच्युतः । उद्वर्तितकरच्छन्न निश्वास प्रचलाननः ॥ १०२ ॥ करसङ्गारुणीभूतस्वेद वद्गण्डमण्डलः । उष्णातिदीर्घ निश्वास ग्लपितासनपल्लवः ॥ १०३ ॥ जृम्भण कम्पनं जम्भां मन्दं कुर्वन् पुनः पुनः । निःसहं धारयन्कायं गाढाकल्पकशल्यतः ।।१०४।। रामाभिध्यानतो मोघं हृषीकपटलं दधत् । मनोज्ञेष्वपि देशेषु महतीमधृतिं व्रजन् ॥ १०५ ॥ दधानः शून्यमात्मानं परित्यक्ताखिलक्रियः । क्षणमात्रष्टतां भूयः परिमुञ्चनपत्रपाम् ॥ १०६॥ तैनुभूतसमस्ताङ्गः परिभ्रष्टविभूषणः । दध्याविति सचिन्तेन परिवारेण वीक्षितः ।।१०७।। कर सका ||९४ || निरन्तर समागमकी उत्कण्ठा रखनेवाला यह पवनंजय कामके दस वेगों से इस प्रकार पूर्ण हो गया जिस प्रकार कि युद्धमें कोई योद्धा शत्रुके बाणोंसे पूर्ण हो जाता है-भर जाता है ||९५|| प्रथम वेगमें उसे अंजनाविषयक चिन्ता होने लगी अर्थात् मनमें अंजनाकी इच्छा उत्पन्न हुई । दूसरे वेग समय बाह्यमें उसकी आकृति देखने की इच्छा हुई ||९६ || तीसरे वेगमें मन्द-लम्बी और गरम साँसें निकलने लगीं। चौथे वेगमें ऐसा ज्वर उत्पन्न हो गया कि जिसमें चन्दन अग्निके समान सन्तापकारी जान पड़ने लगा ||१७|| पंचम वेगमें उसका शरीर फूलोंकी शय्यापर करवटें बदलने लगा । छठें वेगमें अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजनको वह विषके समान मानने लगा ||९८॥ सातवें वेगमें उसीकी चर्चा में आसक्त रहकर विप्रलाप - बकवाद करने लगा । आठवें वेगमें उन्मत्तता प्रकट हो गयी जिससे कभी गाने लगता और कभी नाचने लगता था ॥ ९९ ॥ कामरूपी सर्पके द्वारा इसे हुए उस पवनंजयको नौवें वेगमें मूर्च्छा आने लगी और दसवें वेगमें जिसका स्वयं ही अनुभव होता था ऐसा दुःखका भार प्राप्त होने लगा ॥ १०० ॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि वह पवनंजय विवेकसे युक्त था तो भी उस समय उसका चरित्र स्वच्छन्द हो गया था सो ऐसे दुष्ट कामके लिए धिक्कार हो ॥ १०१ ॥ ३४१ अन्तर काम उपर्युक्त वेगोंके कारण पवनंजयका धैर्यं छूट गया। उसका मुख निरन्तर निकलनेवाले श्वासोच्छ्वाओंसे चंचल हो गया और वह उसे अपनी हथेलियोंसे ढँकने लगा ॥१०२॥ वह स्वेदसे भरे अपने कपोलमण्डलको सदा हथेलीपर रखे रहता था जिससे उसमें लालिमा उत्पन्न ही थी । वह शीतलता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे पल्लवोंके आसनपर बैठता था तथा उसे गरमगरम लम्बी श्वासोंसे म्लान करता रहता था ॥ १०३ ॥ बाणोंके गहरे प्रहार से असहनीय कामको धारण करनेवाला वह पवनंजय बार-बार जमुहाई लेता था, बार-बार सिहर उठता था और बार-बार अँगड़ाई लेता था || १०४ || निरन्तर स्त्रीका ध्यान रखनेसे उसकी इन्द्रियों का समूह व्यर्थं हो गया था अर्थात् उसकी कोई भी इन्द्रिय अपना कार्य नहीं करती थी और अच्छे-से-अच्छे स्थानोंमें भी उसे धैर्यं प्राप्त नहीं होता था - वह सदा अधीर ही बना रहता था ॥ १०५ ॥ उ शून्य हृदय होकर सब काम छोड़ दिये थे । क्षण भरके लिए वह लज्जाको धारण करता भी था तो पुनः उसे छोड़ देता था || १०६ || जिसके समस्त अंग दुर्बल हो गये थे और जिसने सब आभूषण १. पवनंजयस्य । २. कृशीभूत । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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