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________________ पञ्चदर्श पर्व ३३९ समीरणकृताकम्पः' केसरप्रकरः पतन् । मधुसिंहस्य पान्थेन ददृशे केसरोत्करः ॥६७॥ दंष्ट्रा वसन्तसिंहस्य मानस्तम्बेरमाङ्कुशः । अङ्कोलकेशरं रेजे प्रोषितस्त्रीभयङ्करम् ॥६॥ घनं कैरवजं जालं क्वणभृङ्गकदम्बकम् । वियोगिनीमनांसीव मधुनाक्रष्टुमुज्झितम् ॥६९॥ कुड्मलोद्दीपितोऽशोकः प्रचलन्नवपल्लवः । प्राचुर्याद्वनितोदीर्णरागराशिरिवाबभौ ॥७॥ किंशुकं घनमत्यन्तं दिदीपे वनराजिषु । वियोगिनीमनःस्थातिरिक्तदुःखानिलोपमम् ॥७॥ व्याप्तदिक्चक्रवालेन रजसा पुष्पजन्मना । वसन्तः पटवासेन चकारेव महोत्सवम् ॥७२॥ निमेषमपि सेहाते न स्त्रीपुंसावदर्शनम् । कुत एवान्यदेशन संगम प्रेमबन्धनौ ॥७३॥ गन्तुमारेभिरे देवा जिनभक्तिप्रचोदिताः । नन्दीश्वरं महामोदाः फाल्गुनाष्टदिनोत्सवे ॥७४॥ जग्मुरष्टापदे तत्र काले विद्याधराधिपाः । पूजोपकरणव्यग्रकरभृत्यगणान्विताः ॥७५॥ पूज्यं नाभेयनिर्वृत्या तमति भक्तिनिर्भरः । समेतो बन्धुवर्गेण महेन्द्रोऽपि समीयिवान् ॥७६॥ स तत्र जिनमर्चित्वा स्तुत्वा नवा च भावतः । रौक्मे शिलातले श्रीमानासाञ्चके यथासुखम् ॥७७॥ प्रह्लादोऽपि तदायासीत्तं गिरिं वन्दितं जिनम् । कृताभीष्टं भ्रमन्नासीन्महेन्द्रक्षणगोचरः ॥७८॥ महेन्द्रस्य ततोऽभ्याशं सुतप्रीत्या महादरः । ससप विकसन्नेत्रः प्रह्लादः प्रीतिमानसः ॥७९॥ अभ्युत्थाय महेन्द्रोऽपि मुदितः पुरुसंभ्रमः । आलिङ्गन्तं समालिङ्गत् प्रह्लाद लादकारणम् ॥८॥ समीर बहने लगा और सूर्य उत्तरायण हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो इस मलयसमीरसे प्रेरित होकर ही सूर्य उत्तरायण हो गया था ।।६६।। वायुसे हिलते हुए मौलश्रीके फूलोंका समूह नीचे गिर रहा था जिसे पथिक लोग ऐसा समझ रहे थे मानो वसन्तरूपी सिंहको जटाओंका समूह ही हो ॥६७|| विरहिणी स्त्रियोंको भय उत्पन्न करनेवाली अंकोल वृक्षके पुष्पोंकी केशर ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो वसन्तरूपी सिंहको दंष्ट्रा अर्थात् जबड़े ही हों अथवा मानरूपी हाथीका अंकुश ही हो ॥६८॥ जिसपर भ्रमर गूंज रहे थे ऐसा कुमुदोंका सघन जाल ऐसा जान पड़ता था मानो वियोगिनी स्त्रियोंके मनको खींचनेके लिए वसन्तने जाल ही छोड रखा था ॥६९॥ जिसके नये-नये पत्ते हिल रहे थे ऐसा बोंडियोंसे सुशोभित अशोकका वृक्ष ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अधिकताके कारण स्त्रियोंके द्वारा उगला हुआ रागका समूह ही हो ॥७०|| वनश्रेणियोंमें पलाशके सघन वृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो विरहिणी स्त्रियोंके मन में ठहरनेसे बाकी बचे हुए दुःखरूपो अग्निके समूह हो हों ।।७१।। समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाला फूलोंका पराग सब ओर फैल रहा था उससे ऐसा जान पड़ता था मानो बसन्त सुगन्धित चूर्णके द्वारा महोत्सव हो मना रहा था ।।७२।। जब प्रेमरूपी बन्धनसे बँधे स्त्री-पुरुष पल-भरके लिए भी एक दूसरेका अदर्शन नहीं सहन कर पाते थे तब अन्य देशमें गमन किस प्रकार सहन करते ? ||७३।। फाल्गुन मासके अन्तिम आठ दिनमें आष्टाह्निक महोत्सव आया सो जिनभक्तिसे प्रेरित तथा महाहर्षसे भरे देव नन्दीश्वर द्वीपको जाने लगे ||७४।। उसी समय पूजाके उपकरणोंसे व्यग्र हाथोंवाले सेवकोंसे सहित विद्याधर राजा कैलास पर्वतपर गये ॥७५॥ वह पर्वत भगवान् ऋषभदेवके मोक्ष जानेसे अत्यन्त पूजनीय था इसलिए भक्तिसे भरा राजा महेन्द्र भी बन्धुवर्गके साथ वहाँ गया था ।।७६।। श्रीमान वह राजा महेन्द्र वहाँपर जिन भगवानकी भावपूर्वक अचंना, स्तुति एवं नमस्कार करके स्वर्णमय शिलातलपर सखपूर्वक बैठ गया ||७७|| उसी समय राजा प्रह्लाद भी जिनेन्द्र देवकी वन्दना करनेके लिए केलास पर्वतपर गया था सो पूजाके अनन्तर भ्रमण करता हुआ राजा महेन्द्रको दिखाई दिया ॥७८॥ तदनन्तर जिसके नेत्र विकसित हो रहे थे और मन प्रीतिसे भर रहा था ऐसा प्रह्लाद पुत्रको प्रीतिसे बड़े आदरके साथ राजा महेन्द्रके पास गया ॥७९॥ सो हर्षसे १. वकुलकुसुमसमूहः । २. जटासमूहः । ३. प्रेषित-म.। ४. कौरवजङ्घालं ज., ख.। कौरवकं जालं म. । ५. कृष्ट-म. । ६. शोकप्रचलन्नव-म. । ७. ऋषभदेवनिर्वाणेन । ८. रौक्म्ये म. । ९. महेनण खगोचरः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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