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________________ पञ्चदशं पर्व तस्यैव च मुनेः पावें हनूमान् गृहिणां व्रतम् । विमीषणश्च जप्राह कृत्वा मात्र सुनिश्चितम् ॥१॥ न तया गिरिराजस्य स्थिरत्वं शस्यते बुधैः । हनूमच्छीलसम्यक्त्वं यथा परमनिश्चलम् ॥२॥ सौमाग्यादिमिरत्यन्तं हनूमति ततः स्तुते । इत्यूचे मगधाधीशो रोमा बिभ्रदुस्कटम् ॥३॥ हनूमान् को गणाधीश किंविशिष्टः कुतः क्व वा । भगवनस्य तत्त्वेन ज्ञातुमिच्छामि चेष्टितम् ॥४॥ ततः सत्पुरुषाभिख्यार्सजातपुरुसंमदः । वाचाहादनकारिण्या गेणप्राणहरोऽवदत् ॥५॥ दक्षिणस्यां नृप श्रेण्या विजयार्धस्य भूभृतः । दशयोजनमभ्वानमतिक्रम्य व्यवस्थितम् ॥६॥ आदित्यनगराभिख्यं पुरमस्ति मनोहरम् । प्रह्लादस्तत्र राजास्य नाम्ना केतुमती प्रिया ।।७।। शुमो वायुगतिर्नाम बभूव तनयोऽनयोः । लक्ष्म्या वक्षस्थल यस्य विपुलं निलयीकृतम् ॥८॥ संपूर्णयौवनं दृष्ट्वा तं तदारक्रियां प्रति । चकार जनकश्चिन्तां संतानच्छेदकातरः ॥९॥ आस्तां तावदिदं राजन्निदमन्यन्मती कुरु । वचनं येन तदारसंभवः परिकीर्त्यते ॥१०॥ वासस्य भरतस्यान्ते संनिकृष्टे महोदधेः । पूर्वदक्षिणदिग्भागे दन्तीत्यस्ति महीधरः ॥११॥ विपुला_लिहोदारतेजःशिखरसंकटः । नानागुमौषधिव्याप्तः सुनिर्भरमहातटः ॥१२॥ यतः प्रभृति तत्रास्थासं निवेश्य वरं पुरम् । विद्याधरो महेन्द्राख्यो महेन्द्रोपमविक्रमः ॥१३॥ ~ अथानन्तर उन्हीं मुनिराजके पास हनुमान् और विभीषणने भी अभिप्रायको सुदृढ़ कर गृहस्थोंके व्रत ग्रहण किये ॥१॥ गौतमस्वामी कहते हैं कि विद्वान् लोग सुमेरुपर्वतकी स्थिरताकी उस प्रकार प्रशंसा नहीं करते जिस प्रकार कि परमनिश्चलताको प्राप्त हए हनुमानके शील और सम्यग्दर्शनकी करते हैं ॥२॥ इस प्रकार जब गौतमस्वामीने सौभाग्य आदिके द्वारा हनुमान्की अत्यधिक प्रशंसा की तब उत्कट रोमांचको धारण करता हुआ श्रेणिक बोला कि ॥३॥ हे गणनाथ ! हनुमान् कौन ? इसकी क्या विशेषता है ? कहां किससे इसकी उत्पत्ति हुई है ? हे भगवन् ! मैं इसका चरित्र यथार्थमें जानना चाहता हूँ ॥४॥ तदनन्तर सत्पुरुषका नाम सुननेसे जिन्हें अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हो रहा था ऐसे गणधर भगवान् आह्लाद उत्पन्न करनेवाली वाणीमें कहने लगे ॥५॥ हे राजन् ! विजया, पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें दश योजनका मार्ग लांघकर आदित्यपुर नामक एक मनोहर नगर है । वहाँके राजा प्रह्लाद और उनकी रानीका नाम केतुमती था ॥६-७।। इन दोनोंके पवनगति नामका उत्तम पुत्र हुआ। पवनगतिके विशाल वक्षःस्थलको लक्ष्मीने अपना निवासस्थल बनाया था ।।८। उसे पूर्णयौवन देख, सन्तान-विच्छेदका भय रखनेवाले पिताने उसके विवाहकी चिन्ता की ॥९॥ गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! यह कथा तो अब रहने दो। दूसरी कथा हृदयमें धारण करो जिससे कि पवनगतिके विवाहकी चर्चा सम्भव हो सके ॥१०॥ __ इसी भरत क्षेत्रके अन्तमें महासागरके निकट आग्नेय दिशामें एक दन्ती नामका पवंत है ॥११॥ जो बड़ी-बड़ी गगनचुम्बी चमकीले शिखरोंसे युक्त है, नाना प्रकारके वृक्ष और औषधियोंसे व्याप्त है तथा जिसके लम्बे-चौड़े किनारे उत्तमोत्तम झरनोंसे युक्त हैं ।।१२।। महेन्द्रके समान पराक्रमको धारण करनेवाला महेन्द्र विद्याधर उत्तम नगर बसाकर जबसे उस पर्वतपर १. ततस्तुते क , म., ब., ज. । ततोस्तुते ख. । २. गणधरः । ३. गृहीकृतम् । ४. क्षेत्रस्य । ५. तत्रस्थात् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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