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________________ चतुर्दशं पर्व ३३३ करोमि प्रातरुत्थाय सांप्रतं प्रतिवासरम् । स्तुत्वा पूजां जिनेन्द्राणामभिषेकसमन्विताम् ॥३७३।। 'वरिवस्यामवस्त्राणामकृत्वा विधिनान्वितम् । अद्य प्रभृति नाहारं करोमीति ससंमदः ॥३७४।। जानुभ्यां भुवमाक्रम्य प्रणम्य मुनिमादरात् । अन्यानपि महाशक्तिनियमान् स समार्जयत् ॥३७५।। ततो देवा सुरा भक्ताः प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । यथास्वं निलयं जग्मुहषविस्तारितेक्षणाः ॥३७६।। अमि लङ्का दशास्योऽपि प्रतस्थे पृथुविक्रमः । खमुत्पत्य दधल्लीला सुरनाथसमुद्भवाम् ॥३७७॥ वरस्त्रीजनसंघातैः कृतप्रणतिपूजनः । नगरी स्वां विवेशासौ वस्त्रादिकृतभूषणाम् ॥३७८॥ प्रविश्य वसतिं स्वां च समस्तविमवार्चिताम् । अनावृत इवातिष्ठद्गंमीरां मान्दरी गुहाम् ॥३७९॥ वंशस्थवृत्तम् भवन्ति कर्माणि यदा शरीरिणां प्रशान्तियुक्तानि विमुक्तिमाविनाम् । ततोपदेशं परमं गुरोर्मुखादवाप्नुवन्ति प्रभवं शुमस्य ते ॥३८०॥ इति प्रबुद्धोधतमानसा जना जिनश्रुतौ सज्जत भो पुनः पुनः । परेण धर्म विनयेन शृण्वतां भवत्यमन्दोऽवगमो यथा रविः ॥३८॥ इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मवरिते अनन्तबलधर्माभिधानं नाम चतुर्दशं पर्व ॥१८॥ चारकी शरणमें जाकर यह नियम लिया कि 'मैं प्रतिदिन प्रातः काल उठकर तथा स्तुति कर अभिषेकपूर्वक जिनेन्द्र देवको पूजा करूँगा। साथ ही जबतक मैं निर्ग्रन्थ साधओंकी पूजा नहीं कर लँगा तबतक आजसे लेकर आहार नहीं करूंगा'। भानुकर्णने यह प्रतिज्ञा बड़े हर्षसे की ॥३७२-३७४।। इसके सिवाय उसने पृथिवीपर घुटने टेक मुनिराजको आदरपूर्वक नमस्कार कर और भी बड़े-बड़े नियम लिये ॥३७५।। तदनन्तर हर्षसे जिनके नेत्र फूल रहे थे ऐसे भक्त और असुर मुनिराजको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥३७६।। विशाल पराक्रमका धारी रावण भी आकाशमें उड़कर इन्द्रकी लीला धारण करता हुआ लंकाको ओर चला ॥३७७॥ उत्तमोत्तम स्त्रियोंके समूहने प्रणामपूर्वक जिसकी पूजा की थी ऐसे रावणने वस्त्रादिसे सुसज्जित अपनी नगरीमें प्रवेश किया ॥३७८॥ जिस प्रकार अनावृत देव मेरुपर्वतकी गम्भीर गुहामें रहता है उसी प्रकार रावण भी समस्त वैभवसे युक्त अपने निवासगृहमें प्रवेश कर रहने लगा ॥३७९॥ ____ गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जब भव्य जीवोंके कर्म उपशम भावको प्राप्त होते हैं तब वे सुगुरुके मुखसे कल्याणकारी उत्तम उपदेश प्राप्त करते हैं ॥३८०॥ ऐसा जानकर हे प्रबुद्ध एवं उद्यमशील हृदयके धारक भव्य जनो! तुम लोग बार-बार जिनधर्मके सुननेमें तत्पर होओ क्योंकि जो उत्तम विनयपूर्वक धर्म श्रवण करते हैं उन्हें सूर्य के समान विपुल ज्ञान प्राप्त होता है ॥३८१।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें अनन्तबल केवलीके द्वारा धर्मोपदेशका निरूपण करनेवाला चौदहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१४॥ १. पूजाम् । २. निग्रन्थगुरूणाम् । ३. अनावृतदेव इव । ४. मेरुसंबन्धिनीम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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