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________________ पद्मपुराणे परिवर्ज्या भुजङ्गीव वनिता न्यस्य दूरतः । सा हि लोभवशा पापा पुरुषस्य विनाशिका ॥१९१॥ यथा च जायते दुःखं रुद्वायामात्मयोषिति । नरान्तरेण सर्वेषामियमेव व्यवस्थितिः ॥ १९२॥ 'उदारश्च तिरस्कारः प्राप्यतेऽत्रैव जन्मनि । तिर्यङनरकयोर्दुःखं प्राप्यमेवातिदुस्सहम् ॥१९३॥ प्रमाणं कार्यमिच्छायाः सा हि दद्यानिरङ्कुशा । महादुःखमिहाख्येयौ भद्रकाञ्चनसंज्ञकौ ॥१९४॥ विक्रेता वदरादीनां मद्रो दीनारमात्रकम् । द्रविणं प्रत्यजानीत दृष्ट्वातो वर्त्मनि च्युतम् ॥ १९५॥ 'प्रसेवकमितोऽगृह्णादीनारं तु कुतूहली । तत्र काञ्चननामा तु सर्वमेव प्रसेवकम् ॥ १९६॥ दीनारस्वामिना राजा काञ्चनो वीक्ष्य नाशितः । स्वयमर्पितदीनारो भद्रस्तु परिपूजितः ॥ १९७ ॥ विगमोऽनर्थदण्डेभ्यो दिग्विदिक्परिवर्जनम् । भोगोपभोगसंख्यानं त्रयमेतद्गुणव्रतम् ॥१९८॥ सामायिकं "प्रयत्नेन प्रोषधानशनं तथा । संविभागोऽतिथीनां च संल्लेखश्चायुषः क्षये ॥ १९९॥ संकेतो न तिथौ यस्य कृतो यश्चापरिग्रहः । गृहमेति गुणैर्युक्तः श्रमणः सोऽतिथिः स्मृतः ॥ २००॥ संविभागोऽस्य कर्तव्यो यथाविभवमादरात् । विधिना लोभमुक्तेर्न मिझोपकरणादिभिः ॥ २०१ ॥ मधुनो मद्यतो मांसाद् द्यूततो रात्रिभोजनात् । वेश्यासंगमनाच्चास्य विरतिर्नियमः स्मृतः ॥२०२॥ ३२० चोरीका सर्वं प्रकारसे त्याग करे। जो कार्य दोनों लोकोंमें विरोधका कारण है वह किया ही कैसे जा सकता है ? || १९०॥ परस्त्रीका सर्पिणीके समान दूरसे ही त्याग करना चाहिए क्योंकि वह पापिनी लोभके वशीभूत हो पुरुषका नाश कर देती है || १९१ ।। जिस प्रकार अपनी स्त्रीको कोई दूसरा मनुष्य छेड़ता है और उससे अपने आपको दुःख होता है उसी प्रकार सभीकी यह व्यवस्था जाननी चाहिए || १९२ ॥ परखी सेवन करनेवाले मनुष्य को इसी जन्म में बहुत भारी तिरस्कार प्राप्त होता है और मरनेपर तिर्यंच तथा नरकगतिके अत्यन्त दुःसह दुःख प्राप्त करने ही पड़ते हैं ॥ १९३ || अपनी इच्छाका सदा परिमाण करना चाहिए क्योंकि इच्छापर यदि अंकुश नहीं लगाया गया तो वह महादुःख देती है। इस विषयमें भद्र और कांचनका उदाहरण प्रसिद्ध है || १९४ || वैर आदिको बेचनेवाला एक भद्र नामक पुरुष था । उसने प्रतिज्ञा की थी कि मैं एक दीनारका ही परिग्रह रखूंगा। एक बार उसे मार्ग में पड़ा हुआ बटुआ मिला। उस बटुए में यद्यपि बहुत दीनारें रखी थीं पर भद्रने अपनी प्रतिज्ञाका ध्यान कर कुतूहलवश उनमें से एक दीनार निकाल ली । शेष आ वहीं छोड़ दिया । वह बटुआ कांचन नामक दूसरे पुरुषने देखा तो वह सबका सब उठा लिया । दीनारोंका स्वामी राजा था। जब उसने जाँच-पड़ताल की तो कांचनको मृत्युकी सजा दी गयी और भद्रने जो एक दीनार ली थी वह स्वयं ही जाकर राजाको वापस कर दी जिससे राजाने उसका सम्मान किया ।।१९५-१९७।। अर्थदण्डों का त्याग करना, दिशाओं और विदिशाओंमें आवागमनकी सीमा निर्धारित करना और भोगोपभोगका परिमाण करना ये तीन गुणव्रत हैं || १९८ || प्रयत्नपूर्वक सामायिक करना, प्रोषधोपवास धारण करना, अतिथिसंविभाग और आयुका क्षय उपस्थित होनेपर सल्लेखना धारण करना ये चार शिक्षाव्रत हैं || १९९ || जिसने अपने आगमनके विषयमें किसी तिथिका संकेत नहीं किया है, जो परिग्रहसे रहित है और सम्यग्दर्शनादि गुणोंसे युक्त होकर घर आता है ऐसा मुनि अतिथि कहलाता है || २०० || ऐसे अतिथिके लिए अपने वैभवके अनुसार आदरपूर्वक लोभरहित हो भिक्षा तथा उपकरण आदि देना चाहिए यही अतिथिसंविभाग है || २०१ || इनके सिवाय गृहस्थ मधु, मद्य, मांस, जुआ, रात्रिभोजन और वेश्यासमागमसे जो १. अधिकः 1 २. महदुःख- म. । ३. दृष्ट्वा तो ब । ४. बटुआ इति हिन्दी । ५. प्रपन्नेन म. । ६. संलेख - वायुषः म । ७. युक्ताः म । ८ लोभयुक्तेन म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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