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________________ चतुर्दशं पर्व ३१९ 'क्षमया क्षमया तुल्याः कषायोद्रेकवर्जिताः । अशोत्या गुणलक्षाणां चतुःसहितयान्विताः ॥१७६॥ अष्टादशजिनोद्दिष्टशीललक्षसमन्विताः । अत्यन्ताब्यास्तपोभूत्या सिद्ध्याकाक्षणतत्पराः ॥१७७॥ जिनोदितार्थसंसक्ता विदितापरशासनाः । श्रुतसागरपारस्था मुनयो यमधारिणः ॥१७८॥ नियमानां विधातारः समुन्नतयोज्झिताः । नानालब्धिकृतासंगा महामङ्गलमूर्तयः ॥१७९॥ एवंगुणाः समस्तस्य जगतः कृतमण्डनाः । श्रमणास्तनुकर्माणः प्रयान्त्युत्तमदेवताम् ॥१८॥ द्वित्रर्भवेश्च निःशेषं कलुषं ध्यानवह्निना । निर्दा प्रतिपद्यन्ते सुखं सिद्धसमाश्रितम् ॥१८१॥ स्नेहपअररुद्धानां गृहाश्रमनिवासिनाम् । धर्मोपायं प्रवक्ष्यामि शृणु द्वादशधा स्थितम् ॥१८२॥ व्रतान्यणूनि पञ्चैषां शिक्षा चोक्ता चतुर्विधा । गुणास्त्रयो यथाशक्तिनियमास्तु सहस्रशः ॥१८३॥ प्राणातिपाततः स्थूलाद्विरतिर्वितथात्ता । ग्रहणात्परवित्तस्य परदारसमागमात् ॥१८४॥ अनन्तायाश्च गर्दायाः पञ्चसंख्यमिदं व्रतम् । भावना चेयमेतेषां कथिता जिनपुङ्गवः ॥१८५॥ इष्टो यथात्मनो देहः सर्वेषां प्राणिनां तथा । एवं ज्ञात्वा सदा कार्या देया सर्वासधारिणाम् ॥१८६॥ एषैव हि पराकाष्टा धर्मस्योक्ता जिनाधिपः । दयारहितचित्तानां धर्मः स्वल्पोऽपि नेष्यते ॥१८७॥ वचनं परपीडायां हेतुत्वं यत्प्रपद्यते । अलीकमेव तत्प्रोक्तं सत्यमस्माद्विपर्यये ॥१८॥ वधादि कुरते जन्मन्यस्मिस्स्तेयमनुष्टितम् । कर्तुः परत्र दुःखानि विविधानि कुयोनिषु ॥१८९॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मतिमान् वर्जयेन्नरः । लोकद्वयविरोधस्य निमित्तं क्रियते कथम् ॥१९॥ गुप्त रखनेवाले होते हैं ॥१७५॥ ये क्षमाधर्मके कारण क्षमा अर्थात् पृथ्वीके तुल्य हैं, कषायोंके उद्रेकसे रहित हैं और चौरासी लाख गुणोंसे सहित हैं ॥१७६।। जिनेन्द्र प्रतिपादित शीलके अठारह लाख भेदोंसे सहित हैं, तपरूपी विभूतिसे अत्यन्त सम्पन्न हैं तथा मुक्तिकी इच्छा करने में सदा तत्पर रहते हैं ॥१७७|| ये मुनि जिनेन्द्रनिरूपित पदार्थों में लीन रहते हैं, अन्य धर्मों के भी अच्छे जानकार होते हैं, श्रुतरूपी सागरके पारगामी और यमके धारी होते हैं ॥१७८॥ ये मुनि अनेक नियमोंके करनेवाले, उद्दण्डतासे रहित, नाना ऋद्धियोंसे सम्पन्न और महामंगलमय शरीरके धारक होते हैं ॥१७९|| इस तरह जो पूर्वोक्त गुणोंको धारण करनेवाले हैं, समस्त जगत्के आभरण हैं और जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं ऐसे मुनि उत्तम देव पदको प्राप्त होते हैं ॥१८०॥ तदनन्तर दो-तीन भवोंमें ध्यानाग्निके द्वारा समस्त कलषताको जलाकर निर्वाण-सुखको प्राप्त कर लेते हैं ॥१८१।। अब स्नेहरूपी पिंजड़ेमें रुके हुए गृहस्थाश्रमवासी लोगोंका बारह प्रकारका धर्म कहता हूँ सो सुनो ॥१८२।। गृहस्थोंको पांच अणुव्रत, चार शिक्षाव्रत, तीन गुणव्रत और यथाशक्ति हजारों नियम धारण करने पड़ते हैं ।।१८३।। स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल परद्रव्यग्रहण, परस्त्री समागम और अनन्ततृष्णासे विरत होना ये गृहस्थोंके पाँच अणुव्रत कहलाते हैं। इन व्रतोंको रक्षाके लिए जिनेन्द्रदेवने निम्नांकित भावनाका निरूपण किया है ॥१८४-१८५॥ जिस प्रकार मुझे अपना शरीर इष्ट है उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको भी अपना-अपना शरीर इष्ट होता है ऐसा जानकर गृहस्थको सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिए ॥१८६॥ जिनेन्द्रदेवने दयाको ही धर्मको परम सीमा बतलायी है । यथार्थमें जिनके चित्त दयारहित हैं उनके थोड़ा भी धर्म नहीं होता है ।।१८७।। जो वचन दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेमें निमित्त है वह असत्य ही कहा गया है, क्योंकि सत्य इससे विपरीत होता है ।।१८८।। की गयी चोरी इस जन्ममें वध, बन्धन आदि कराती है और मरनेके बाद कुयोनियोंमें नाना प्रकारके दुःख देती है ।।१८९॥ इसलिए बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिए कि वह १. क्षान्त्या । २. पथिव्या । ३. सहस्रशीलयान्विताः ख.। शीलसहस्रचान्विताः ब., म.। ४. निर्दा म. । ५. व्रतान्यमूनि म.। ६. शिखा म.। ७. निर्यमास्तु म.। ८. वितथा म.। ९. सर्वप्राणिनाम् । १०. -मस्मद्विपर्यये म.. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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