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________________ पपपुराणे दधानो वक्षसा हारं प्रस्फुरद्विमलप्रभम् । वसन्त इव संजातकुसुमौघविराजितः ॥३७१॥ वितृप्तिहर्षपूर्णाभिर्वधूमिः कृतवीक्षणः । स्वयं मृदुसमुद्धृतचामरामिः ससंभ्रमम् ॥३७२॥ नानावादिवशब्देन जयशब्देन चारुणा । आनन्दितः सुवेश्यामिनृत्यन्तीभिः समन्वितः॥३७३॥ प्रविष्टो मुदितो लङ्का समुद्भूतमहोत्सवाम् । भवनं च निजं बन्धुभृत्यवर्गामिनन्दितः ॥३७४।। शिखरिणीच्छन्दः सुसन्नद्धान् जित्वा तृणमिव समस्तानरिगणान् पुरोपात्तात् पुण्यात् समधिगतसुप्राज्यविभवः । क्षयं प्राप्ते तस्मिन् विगैलितरुचिभ्रष्टविमवो ____ बभूवासौ शक्रो धिगतिचपलं मानुषसुखम् ।।३७५।। असौ प्राप्तौ वृद्धि दशमुखखगः पूर्वचरिता ___च्छुमान्निधू यालं प्रबलमहितवातमखिलम् । इति ज्ञात्वा भव्या जगति निखिलं कर्मजनितं विमुक्तान्यासङ्गा रविरुचिकरं यातु सुकृतम् ।।३७६।। इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्त पद्मचरिते इन्द्रपराभवाभिधानं नाम द्वादशं पर्व ॥१२॥ वाले पुष्पक विमानपर सवार था। उसके मुकुटमें बड़े-बड़े रत्न देदीप्यमान हो रहे थे तथा उसकी भुजाएँ बाजूबन्दोंसे सुशोभित थीं ॥३७०॥ जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैल रही थी ऐसे हारको वह वक्षःस्थलपर धारण कर रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो उत्पन्न हुए फूलोंके समूहसे सुशोभित वसन्त ऋतु ही हो ।।३७१।। जो अतृप्तिकर हर्षसे पूर्ण थीं तथा धीरे-धीरे चमर ऊपर उठा रही थीं ऐसी स्त्रियां हाव-भावपूर्वक उसे देख रही थीं ॥३७२॥ वह नाना प्रकारके बाजोंके शब्द तथा मनोहर जय-जयकारसे आनन्दित हो रहा था और नृत्य करती हुई उत्तमोत्तम वेश्याओंसे सहित था ॥३७३।। इस प्रकार उसने बड़ी प्रसन्नतासे, अनेक महोत्सवोंसे भरी लंकामें प्रवेश किया और बन्धुजन तथा भृत्यसमूहसे अभिनन्दित हो अपने भवनमें भी पदार्पण किया ||३७४|| ___ गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि जिसने पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके प्रभावसे, सब प्रकारकी तैयारीसे युक्त समस्त शत्रुओंको तृणके समान जीतकर उत्तम वैभव प्राप्त किया था ऐसा इन्द्र विद्याधर पुण्यकर्मके क्षीण होनेपर कान्तिहीन तथा विभवसे रहित हो गया सो इस अत्यन्त चंचल मनुष्यके सुखको धिक्कार है ॥३७५।। तथा विद्याधर रावण अपने पूर्वोपाजित पुण्य कर्मके प्रभावसे समस्त बलवान् शत्रुओंको निर्मूल नष्ट कर वृद्धिको प्राप्त हुआ। इस प्रकार संसारके समस्त कार्य कर्मजनित हैं ऐसा जानकर हे भव्यजनो! अन्य पदार्थों में आसक्ति छोड़कर सूर्यके समान कान्तिको उत्पन्न करनेवाले एक पुण्य कर्मका ही संचय करो ॥३७६॥ इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें इन्द्र विद्याधरके पराभवका वर्णन करनेवाला बारहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१२॥ १. आनन्दितसूवेश्याभिः म. । २. विगतरुचिप्रभ्रष्टविभवो म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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