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________________ पद्मपुराणे 'ततोऽपकर्णनं कृत्वा पितुः संनाहमण्डपम् । गत्वा संनाहसंज्ञार्थ तूर्य तारमवीवदत् ॥१८॥ उपाहर गजं शीघ्रं सप्तिं पर्याणय द्रुतम् । मण्डलाग्रमितो देहि पटु चाहर कङ्कटम् ॥१८२॥ धनुराहर धावस्व शिरस्त्राणमितः कुरु । यच्छार्धबाहुकां क्षिप्रं देहि सायकपुत्रिकाम् ॥१८३॥ चेट यच्छ समायोगं सज्जमाशु रथं कुरु । एवमादि कृतारावः सुरलोकश्चलोऽभवत् ॥१८४॥ अथ क्षुब्धेषु वीरेषु रटत्सु पटहेषु च । तुङ्ग रणसु शङ्खषु सान्द्रं गर्जत्सु दन्तिषु ॥१८५॥ मुञ्चत्सु दीर्घहुङ्कारं स्पृष्टवेत्रेषु सप्तिषु । संक्रीडत्सु रथौधेषु ज्याजाले पटु गुञ्जति ॥१८६॥ मटानामट्टहासेन जयशब्देन वादिनाम् । अभूत्तदा जगत्सव शब्देनेव विनिर्मितम् ॥१८७॥ असिमिस्तोमरैः पाशैलजैश्छन्नः शरासनैः । ककुभश्छादिताः सर्वाः प्रभावोऽपहृतो रवेः ॥१८॥ निष्क्रान्ताश्च सुसंनद्धाः सुरा रमसरागिणः । गोपुरे कृतसंघट्टा घण्टाभिर्वरदन्तिनाम् ॥१८९॥ स्यन्दनं परतो धेहि प्राप्तोऽयं मत्तवारणः । आधोरण गजं देशादस्मात्सारय सत्वरम् ॥१९॥ स्तम्भितोऽसीह किं सादिन्नयाश्वं दूतमग्रतः । मुञ्च मुग्धे निवर्तस्व कुरु मां मा समाकुलम् ॥१९१॥ एवमादिसमालापाः सत्वरा मन्दिरात् सुराः । निष्क्रान्ता गर्वनिर्मुक्तशुभारभटगर्जिताः ॥१९२॥ आलीने च यथा 'जातप्रतिपक्षं चमूमुखे । विषमाहततूर्येण परमुत्साहमाहृते ॥१९३॥ ततो राक्षससैन्यस्य मुखमङ्गः कृतः सुरैः । मुञ्चद्भिः शस्त्रसंघातमन्तर्हितनमस्तलम् ॥१९॥ सेनामुखावसादेन कुपिता राक्षसास्ततः । अध्यूषुः पृतनावक्त्रं निजमूर्जितविक्रमाः ॥१९५॥ तदनन्तर पिताकी बात अनसुनी कर वह आयुधशालामें गया और वहां युद्धकी तैयारीका संकेत करनेके लिए उसने जोरसे तुरही बजवायो ॥१८१॥ 'हाथी शीघ्र लाओ, घोड़ापर शीघ्र ही पलान बाँधो, तलवार यहाँ देओ, अच्छा-सा कवच लाओ, दौड़कर धनुष लाओ, सिरको रक्षा करनेवाला टोप इधर बढ़ाओ, हाथपर बाँधनेकी पट्टी शीघ्र देओ, छुरी भी जल्दी देओ, अरे चेट, घोड़े जोत और रथको तैयार करो' इत्यादि शब्द करते हुए देव नामधारी विद्याधर इधर-उधर चलने लगे ॥१८२-१८४॥ अथानन्तर-जब वीर सैनिक क्षुभित हो रहे थे, बाजे बज रहे थे, शंख जोरदार शब्द कर रहे थे, हाथी बार-बार चिंघाड़ रहे थे, बेंतके छूते ही घोड़े दीर्घ हुंकार छोड़ रहे थे, रथोंके समूह चल रहे थे और प्रत्यंचाओंके समूह जोरदार गुंजन कर रहे थे, तब योद्धाओंके अट्टहास और चारणोंके जयजयकारसे समस्त संसार ऐसा हो गया था मानो शब्दसे निर्मित हो ॥१८५-१८७।। तलवारों, तोमरों, पाशों, ध्वजाओं, छत्रों और धनुषोंसे समस्त दिशाएं आच्छादित हो गयीं और सूर्यका प्रभाव जाता रहा ।।१८८।। शीघ्रताके प्रेमी देव तैयार हो-हो कर बाहर निकल पड़े और हाथियोंके घण्टाओंके शब्द सुन-सुनकर गोपुरके समीप धक्कमधक्का करने लगे ॥१८९॥ 'रथको उधर खड़ा करो, इधर यह मदोन्मत्त हाथी आ रहा है। अरे महावत ! हाथीको यहाँसे शीघ्र ही हटा। अरे सवार! यहीं क्यों रुक गया ? शीघ्र ही घोड़ा आगे ले जा। अरी मुग्धे! मुझे छोड़ तू लोट जा, व्यर्थ ही मुझे व्याकुल मत कर' इत्यादि वार्तालाप करते हुए शीघ्रतासे भरे देव, अपने-अपने मकानोंसे बाहर निकल पड़े। उस समय वे अहंकारके कारण शुभ गर्जना कर रहे थे ॥१९०-१९२॥ कभी धीमी और कभी जोरसे बजायी हुई तुरहीसे जिसका उत्साह बढ़ रहा था ऐसी सेना जब शत्रके सम्मुख जाकर यथास्थान खड़ी हो गयी तब आकाशको आच्छादित करनेवाले शस्त्रसमूहको छोड़ते हुए देवोंने राक्षसोंकी सेनाका मुख भंग कर दिया अर्थात् उसके अग्र भागपर जोरदार प्रहार किया ॥१९३-१९४॥ सेनाके १. तत्रोपकर्णयन् ख. । ततोपकर्णलं ब. । ततोपकर्णभं म. । २. कवचम् । ३. यच्छार्धवाहकां म. । ४. अश्वम् । ५. कृतारावं म. ख. । ६. देहि म. । ७. मा मां म. । ८. गर्भनिर्मुक्तसुतारभट- म. । गर्वनिर्मुक्तसुतारभटख., ब.। ९. यातप्रतिपक्षं ख.। १०. मादृते म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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