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________________ द्वादशं पर्व I तनाथ मन्त्रिभिः सार्धं चक्रेऽसौ संप्रधारणम् । कस्मै तु दीयतामेषा कन्येति रहसि स्थितः ॥ १ ॥ इन्द्रेण सह संग्रामे जीविते नास्ति निश्चयः । अतो वरं कृतं बालापाणिग्रहणमङ्गलम् ||२|| तं च चिन्तापरं ज्ञात्वा कन्यावरगवेषणे । हरिवाहनराजेने सूनुरोह्नानितोऽन्तिकम् ॥ ३॥ दृष्ट्वा तं सुन्दराकारं प्रणतं तोषमागतः । दशाननः सुतां चास्मै दातुं चक्रे मनोरथम् ||४|| उचिते चासने तस्मिन्नासीने सचिवान्विते । अचिन्तयद्दशग्रीवो नयशास्त्रविशारदः ||५|| मथुरानगरीनाथः सुगोत्रो हरिवाहनः । अस्मद्गुणगणो स्कोर्तिसततासक्तमानसः ॥६॥ अस्य च प्राणभूतोऽयं बन्धूनां च मधुः सुतः । श्लाघ्यो विनयसंपन्नो योग्यः प्रीत्यनुवर्तने ॥७॥ ज्ञात्वा चेतोव वृत्तान्तमयं सुन्दरविभ्रमः । प्रख्यातगुणसंघातः परिप्राप्तो मदन्तिकम् ||८|| art मधोरिदं प्राह मन्त्री देव तवाग्रतः । अस्य दुःखेन वर्ण्यन्ते गुणा विक्रमशालिनः ||९|| तथापि भवतु ज्ञाता स्वामिनोऽस्य यथात्मना । इत्यावेदयितुं किंचित् क्रियते प्रक्रमो मया ॥ १० ॥ आमोदं परमं बिभ्रत्सर्वलोकमनोहरः । मधुशब्दमयं धत्ते यथार्थ पृथिवीगतम् ॥११॥ गुणा एतावतैवास्य ननु पर्याप्तवर्णनाः । असुरेन्द्रेण यद्दत्तं शूलरत्नं महागुणम् ||१२|| यत्प्रत्यरिबलं क्षिप्तममोघं मासुरं भृशम् । द्विषत्सहस्त्रं नीत्वान्तं करं प्रतिनिवर्तते ॥१३॥ अथानन्तर - उसी गंगा तटपर रावणने एकान्तमें मन्त्रियोंके साथ सलाह की कि यह कृतचित्रा कन्या किसके लिए दी जाये ? ||१|| इन्द्र के साथ संग्राममें जीवित रहनेका निश्चय नहीं है इसलिए कन्याका विवाहरूप मंगल कार्य प्रथम ही कर लेना योग्य है ||२|| तब रावणको कन्याके योग्य वर खोजने में चिन्तातुर जानकर राजा हरिवाहनने अपना पुत्र निकट बुलाया || ३ || सुन्दर आकारके धारक उस विनयवान् पुत्रको देखकर रावणको बड़ा सन्तोष हुआ और उसने उसके लिए पुत्री देनेका विचार किया ॥४॥ जब वह मन्त्रियोंके साथ योग्य आसनपर बैठ गया तब नीतिशास्त्रका विद्वान् रावण इस प्रकार विचार करने लगा कि यह मथुरा नगरीका राजा हरिवाहन उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ है, इसका मन सदा हमारे गुण-कथन करनेमें आसक्त रहता है और यह इसका तथा इसके बन्धुजनोंका प्राणभूत मधु नामका पुत्र है । यह अत्यन्त प्रशंसनीय, विनयसम्पन्न और प्रोतिके निर्वाह करने में योग्य है ॥५-७॥ यह वृत्तान्त जानकर ही मानो इसकी चेष्टाएँ सुन्दर हो रही हैं। इसके गुणोंका समूह अत्यन्त प्रसिद्ध है । यह मेरे समीप आया सो बहुत अच्छा हुआ ॥८॥ तदनन्तर राजा मधुका मन्त्री बोला कि हे देव ! इस पराक्रमी के गुण बड़े दुःख वर्णन किये जाते हैं अर्थात् उनका वर्णन करना सरल फिर भी आप कुछ जान सकें इसलिए कुछ तो भी वर्णन करनेका प्रयत्न करता हूँ ॥ १०॥ सब लोगोंके मनको हरण करनेवाला यह कुमार वास्तविक मधु शब्दको धारण करता है क्योंकि यह सदा मधु जैसी उत्कृष्ट गन्धको धारण करनेवाला है ||११|| इसके गुणोंका वर्णन इतनेसे ही पर्याप्त समझना चाहिए कि असुरेन्द्र ने इसके लिए महागुणशाली शूलरत्न प्रदान किया है || १२ || ऐसा शूलरत्न कि जो कभी व्यर्थं नहीं जाता, अत्यन्त देदीप्यमान है और शत्रुसेनाकी ओर फेंका जाये जो हजारों शत्रुओंको आपके आगे नहीं है ॥ ९ ॥ १. 'राजाहः सखिभ्यष्टच्' इति टच् समासान्तः । २. आह्वानं प्रापितः आह्नानित: । ३. अस्मद्गुणगणे कीर्तिम., ख. । ४. प्रीत्यनुवर्तते म., ब, ख. । प्रीतेरनुवर्तनं तस्मिन् । ५. गुणपर्याप्तवर्णना म. । ६. नीत्वा तं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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