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________________ एकादशं प स्थितो वर्षसहस्रं च वज्राङ्गो स्थिरयोगभृत् । प्रलम्बितमहाबाहुः प्राप्तभूमिजटाचयः ॥ २८९ ॥ स्वामिनश्चानुरागेण गृहीतोग्रपरीषहैः । कच्छाद्यैर्नग्नता मुक्ता वल्कलादिसमाश्रितम् ॥ २९० ॥ अज्ञात परमार्थैस्तैः क्षुधादिपरिपीडितैः । फलाद्याहारसंतुष्टैः प्रणीतास्तापसादयः ॥२९१॥ ऋषभस्य तु संजातं केवलं सर्वभासनम् । महान्यग्रोधवृक्षस्य स्थितस्यासन्नगोचरे ॥२९२॥ तत्प्रदेशे कृता देवैस्तस्मिन् काले विभोर्यतः । पूजा तेनैव मार्गेण लोकोऽद्यापि प्रवर्तते ॥२९३॥ प्रतिमाश्च सुरैस्तस्य तस्मिन्देशे सुमानसैः । स्थापिता रम्यचैत्येषु मनुजैश्च महोत्सबैः ॥ २९४॥ भरतेनास्य पुत्रेण सृष्टा ये चक्रवर्तिना । पुरा मरीचिना ये च प्रमादस्मययोगतः ॥ २९५ ॥ विसर्पणमिमे सूत्रकण्ठस्तु भुवने गताः । प्राणिनां दुःखदा यद्वत्सलिले विषबिन्दवः ॥२९६॥ 'उद्वृत्तकुहुका चारैर्बहुदेम्भैः कुलिङ्गकः । प्रचण्डदण्डैरत्यन्तं तैरिदं मोहितं जगत् ॥ २९७॥ जातं शश्वत्प्रवृत्तातिक्रूरकर्मतमश्चितम् । प्रनष्टसुकृतालोकं साध्वसत्कारतत्परम् ॥२९८॥ एकविंशतिवारान् ये निधनं प्रापिताः क्षितौ । सुभूमचक्रिणा प्राप्ता न नितान्तमभावताम् ॥ २९९॥ ते कथं वद शाम्यन्ते त्वया विप्रा दशानन । उपशाम्यानया किंचिन्न कृत्यं प्राणिहिंसया ॥ ३०० ॥ जिनैरपि कृतं नैतत्सर्वज्ञैर्निः कुमार्गकम् । जगत् किमुत शक्येत कर्तुमस्मद्विधैर्जनैः ॥ ३०१ ॥ धारण किया था ||२८६-२८८ ।। उनका शरीर वज्रमय था, वे स्थिर योगको धारण कर एक हजार वर्षं तक खड़े रहे। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ नीचे की ओर लटक रही थीं और जटाओं का समूह पृथिवोको छू रहा था || २८९ || स्वामीके अनुरागसे कच्छ आदि चार हजार राजाओंने भी उनके साथ नग्न व्रत धारण किया था परन्तु कठिन परीषहोंसे पीड़ित होकर अन्तमें उन्होंने वह व्रत छोड़ दिया और वल्कल आदि धारण कर लिये || २९० || परमार्थको नहीं जाननेवाले उन राजाओंने क्षुधा आदि पीड़ित होनेपर फल आदिके आहार से सन्तोष प्राप्त किया । उन्हीं भ्रष्ट लोगोंने तापस आदि लोगों की रचना की || २९१ | | जब भगवान् ऋषभदेव महा वटवृक्षके समीप विद्यमान थे तब उन्हें समस्त पदार्थों को प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान प्रकट हुआ || २९२ | | उस समय उस स्थानपर चूँकि देवोंके द्वारा भगवान् की पूजा की गयी थी इसलिए उसी पद्धतिसे आज भी लोग पूजा करनेमें प्रवृत्त हैं अर्थात् आज जो वटवृक्षको पूजा होती है उसका मूल स्रोत भगवान् ऋषभदेवके केवलज्ञानकल्याणकसे है ।। २९३ || उत्तम हृदयके धारक देवोंने उस स्थानपर उनकी प्रतिमा स्थापित तथा महान् उत्सवोंसे युक्त मनुष्योंने मनोहर चैत्यालयोंमें उनकी प्रतिमाएँ विराजमान कीं ॥२९४॥ भगवान् ऋषभदेवके पुत्र भरत चक्रवर्तीने तथा इनके पुत्र मरीचिने पहले प्रमाद और अहंकार के योगसे जिन ब्राह्मणोंकी रचना की थी वे पानी में विषकी बूँदोंके समान प्राणियोंको दुःख देते हुए संसारमें सर्वत्र फैल गये । २९५ - २९६ ।। जिन्होंने कुत्सित आचारकी परम्परा चलायी है, जो अनेक प्रकारके कपटोंसे युक्त हैं, जो नाना प्रकार के खोटे-खोटे वेष धारण करते हैं और प्रचण्डअत्यन्त तीक्ष्ण दण्डके धारक हैं ऐसे इन ब्राह्मणोंने इस संसारको मोहित कर रखा है- भ्रम में डाल रखा है ।।२२७|| यह समस्त संसार निरन्तर प्रवृत्त रहनेवाले अत्यन्त क्रूर कार्यरूपी अन्धकारसे व्याप्त है, इसका पुण्यरूपी प्रकाश नष्ट हो चुका है और साधुजनोंका अनादर करने में तत्पर है || २९८ || इस पृथिवीपर सुभूम चक्रवर्तीने इक्कीस बार इन ब्राह्मणोंका सर्वनाश किया फिर भी ये अत्यन्ताभावको प्राप्त नहीं हुए ।। २९२ ।। इसलिए हे दशानन ! तुम्हारे द्वारा ये किस तरह शान्त किये जा सकेंगे—सो तुम्हीं कहो। तुम स्वयं उपशान्त होओ। इस प्राणिहिंसा से कुछ प्रयोजन नहीं है ||३००|| जब सर्वज्ञ जिनेन्द्र भी इस संसारको कुमागं से रहित नहीं कर सके तब फिर हमारे १. प्रवृत्त कुत्सिताचारै: । २. बहुडिम्भैः म. । ५. उपशान्तो भव । ६. कृतिम् -ख । ७ शक्यते म. । Jain Education International ३. कुलिङ्गिकैः ख. । २६१ ४. साधुसत्कार - क., ख., म. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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