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________________ पद्मपुराणे ओजीनं ततोsवादीदहो माणवक स्वया । किमिदं प्रस्तुतं दृष्टं सर्वज्ञैर्दुःखकारणम् ॥१६३॥ संवर्तः कुपितोऽवोचदहोऽत्यन्तविमूढता । यदत्यन्तमसंबद्धं भाषसे हेतुवर्जितम् ॥ १६४ ॥ भवतो यो मतः कोऽपि सर्वज्ञो रागवर्जितः । वैक्तृत्वाद्युपपत्तिभ्यो नासावेवं तथेतरः ॥ १६५॥ अशुद्धैः कर्तृभिः प्रोक्तं वचनं स्यान्मलीमसम् । अनीदृशं च नो कश्चिदुपपत्तेरभावतः ॥१६६॥ तस्मादकर्तृको वेदः प्रमाणं स्यादतीन्द्रिये । वर्णत्रयस्य यज्ञे च कर्म तेन प्रकीर्तितम् ॥ १६७॥ अपूर्वाख्यो ध्रुवो धर्मो यागेन प्रकटीकृतः । प्रयच्छति फलं स्वर्गे मनोज्ञविषयोत्थितम् ॥१६८॥ अन्तर्वेदि पशूनां च प्रत्यवायाय नो वधः । शास्त्रेण चोदितो यस्माद्यायाद्यागादिसेवनम् || १६९|| पशूनां च वितानार्थं कृता सृष्टिः स्वयंभुवा । तस्मात्तदर्थसर्गाणां को दोषो विनिपातने ।। १७० || इत्युक्ते नारदोऽवोचदवैद्यं निखिलं त्वया । भाषितं शृणु दुर्ग्रन्थभावनादूषितात्मना ॥ १७१ ॥ यदि सर्वप्रकारोऽपि सर्वज्ञो नास्ति स त्रिधा । शब्दार्थबुद्धिभेदेन स्ववाचा स्थितितो हताः ॥ १७२ ॥ अथ शब्दश्च बुद्धिश्च विद्यतेऽर्थस्तु नेष्यते । नैत्रमेतत्त्रयं दृष्टं यस्मात् सर्वगवादिषु || १७३ || असत्यर्थे नितान्तं च कुरुते क्व पदं मतिः । शब्दो वा स तथाभूतो व्रजेद्वीवाग्व्यतिक्रमम् ॥ १७४॥ २५० शास्त्रोंका अर्थ जाननेमें निपुण यह याजक (पुरोहित) जानता है || १६२ || नारदने याजकसे कहा कि अरे बालक ! तूने यह क्या प्रारम्भ कर रखा है ? सर्वज्ञ भगवान्ने तेरे इस कार्यको दुःखका कारण देखा हैं || १६३ || नारदकी बात सुन संवर्त नामक याजकने कुपित होकर कहा कि अहो, तेरी बड़ी मूर्खता है जो इस तरह बिना किसी हेतुके अत्यन्त असम्बद्ध बात बोलता है || १६४ || तुम्हारा जो यह मत है कि कोई पुरुष सर्वज्ञ वीतराग है सो वह सर्वज्ञ वक्ता आदि होनेसे दूसरे पुरुष के समान सर्वज्ञ वीतराग सिद्ध नहीं होता । क्योंकि जो सर्वज्ञ वीतराग है वह वक्ता नहीं हो सकता और जो वक्ता है वह सर्वज्ञ वीतराग नहीं हो सकता || १६५ ॥ अशुद्ध अर्थात् राग-द्वेषी मनुष्यों के द्वारा कहे हुए वचन मलिन होते हैं और इनसे विलक्षण कोई सर्वज्ञ है नहीं, क्योंकि उसका साधक कोई प्रमाण नहीं पाया जाता । इसलिए अकर्तृक वेद ही तीन वर्णोंके लिए अतीन्द्रिय पदार्थ के विषय में प्रमाण है । उसीमें यज्ञ कर्मका कथन किया है । यज्ञके द्वारा अपूर्व नामक ध्रुवधर्मं प्रकट होता है जो जीवको स्वर्ग में इष्ट विषयोंसे उत्पन्न फल प्रदान करता है || १६६-१६८॥ वेदी के मध्य पशुओं का जो वध होता है वह पापका कारण नहीं है क्योंकि उसका निरूपण शास्त्रमें किया गया है इसलिए निश्चिन्त होकर यज्ञ आदि करना चाहिए || १६९ || ब्रह्माने पशुओं की सृष्टि यज्ञके लिए ही की है इसलिए जो जिस कार्यंके लिए रचे गये हैं उस कार्यंके लिए उनका विघात करनेमें दोष नहीं है | १७० ॥ संवर्तके इतना कह चुकनेपर नारदने कहा कि तूने सब मिथ्या कहा है । तेरी आत्मा मिथ्या शास्त्रोंकी भावनासे दूषित हो रही है इसीलिए तूने ऐसा कहा है सुन ॥ १७१ ॥ तू कहता है कि सर्वज्ञ नहीं है सो यदि सर्वं प्रकारके सर्वज्ञका अभाव है तो शब्दसर्वज्ञ, अर्थसर्वज्ञ और बुद्धिसर्वज्ञ इस प्रकार सर्वज्ञके तीन भेद तूने स्वयं अपने शब्दों द्वारा क्यों कहे ? स्ववचनसे ही तू बाधित होता है || १७२ ॥ | यदि तू कहता है कि शब्दसर्वज्ञ और बुद्धिसर्वज्ञ तो है पर अर्थ सर्वज्ञ कोई नहीं है तो यह कहना नहीं बनता क्योंकि गो आदि समस्त पदार्थों में शब्द, अर्थ और बुद्धि तीनों साथ ही साथ देखे जाते हैं ॥ ७३ ॥ | यदि पदार्थका बिलकुल अभाव है तो उसके बिना बुद्धि और शब्द कहाँ टिकेंगे अर्थात् किसके आश्रयसे उस प्रकारको बुद्धि होगी और उस प्रकार शब्द बोला जावेगा । और उस प्रकारका अर्थ बुद्धि और वचनके व्यतिक्रमको प्राप्त हो I १. होतारम् । अतिजीनं क, ख । अतिजीनं म । २. होता । संधर्ता म । ३. यत्कृत्वाद्युप ( ? ) । ४. स्यादतीन्द्रियैः म. । ५. यज्ञार्थम् । ६. कुत्सितम् । ७. स्ववाचा स्थानतो हताः म., स्ववावास्था हतोता ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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