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________________ २४६ पद्मपुराणे उपनीताश्च तत्रैव पशवो दीनमानसाः । वराकाः शतशो बद्धाः श्वसत्कुक्षिपुटा भयात् ॥११०॥ नारदोऽथान्तरे तस्मिन्निच्छया नभसा व्रजन् । अपश्यद् धनपृष्ठस्थो जनं तं तत्र संगतम् ॥१११॥ अचिन्तयच्च दृष्ट्वैवं विस्मयाकुलमानसः । कुर्वन् विभ्रममङ्गस्य कुतूहलसमुद्भवम् ॥११२॥ एतत्सुनगरं कस्य कस्य चेयमनीकिनी । इयं च सागराकारा प्रजा' कस्मादिह स्थिता ॥१३॥ नगराणि जनौधाश्च वरूथिन्यश्च भूरिशः । मयेक्षाञ्चक्रिरे जातु नेदृग्दृष्टो जनोस्करः ॥११॥ कुतूहलादिति ध्वात्वाऽवतीर्णोऽसौ विहायसः। कमैतदेव तस्यासीद्यत्कुतूहलदर्शनम् ॥११५॥ पप्रच्छ मागधेशोऽथ भगवन् कः स नारदः । उत्पत्तिर्वा कुतस्तस्य गुणा वा तस्य कीदृशाः ।।११६॥ जगाद च गणाधीशः श्रेणिक ब्राह्मणोऽभवत् । नाम्ना ब्रह्मरूचिस्तस्य कूर्मी नाम कुटुम्बिनी॥१७॥ तापसेन सता तेन श्रितेन वनवासिताम् । एतस्यामाहितो गर्भः फलमूलादिवृत्तिना ॥११८॥ वीतसङ्गास्तमुद्देशमथाजग्मुर्महर्षयः । यान्तो मार्गवशात् क्वापि संयमासक्तमानसाः ॥११९॥ विशश्रमुः क्षणं तस्मिन्नाश्रमे श्रमनोदिनि । अपश्यन् दम्पती तौ च स्वाकारी कर्मगर्हितौ ॥१२॥ आगण्डुरशरीरां च दृष्ट्वा योषां पृथुस्तनीम् । कृशां गर्भभरम्लानां श्वसन्ती पन्नगीमिव ॥१२॥ संसारप्रकृतिज्ञानां श्रमणानां महात्मनाम् । कृपया संबभूवैतौ धर्म बोधयितुं मतिः ॥१२२॥ तेषां मध्ये ततो ज्येष्ठो जगाद मधुरं यतिः । कष्टं पश्यत नय॑न्ते कर्मभिर्जन्तवः कथम् ॥ १२३॥ त्यक्त्वा धर्मधिया बन्धून् संसारोत्तरणाशया। स्वयं खलीकृतोऽरण्ये किमात्मा तापस त्वया ॥१२४॥ मंगलपाठ कर रहे थे ऐसे बहुत सारे ब्राह्मणोंसे यज्ञकी समस्त भूमि आवृत होकर क्षोभको प्राप्त हो रही थी ॥१०९।। सैकड़ों दीनहीन पशु भी वहाँ लाकर बाँधे गये गये थे। भयसे उन पशुओंके पेट दुःखकी साँसें भर रहे थे ॥११०।। उसो समय अपनी इच्छासे आकाशमें भ्रमण करते हुए नारत ने वहाँ एकत्रित लोगोंका समूह देखा ॥१११॥ उसे देख नारद आश्चर्यसे चकित हो, कुतूहलजनित शरीरकी चेष्टाओंको धारण करता हुआ इस प्रकार विचार करने लगा ॥११२॥ यह उत्तम नगर कौन है ? यह किसकी सेना है ? और यह सागरके आकार किसकी प्रजा यहां किस प्रयोजनसे ठहरी हुई है ? ॥११३॥ मैंने बहुतसे नगर, बहुतसे लोगोंके समूह और बहुत सारी सेनाएँ देखीं पर कभी ऐसा जनसमूह नहीं देखा ॥११४॥ ऐसा विचारकर नारद कुतूहलवश आकाशसे नीचे उतरा सो ठीक ही है क्योंकि कुतूहल देखना ही उसका खास काम है ।।११५॥ यह सुनकर राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे पूछा कि भगवन् ! वह नारद कौन है ? उसकी उत्पत्ति किससे हुई है और उसके कैसे गुण हैं ? ॥११६|| इसके उत्तरमें गणधर कहने लगे कि श्रेणिक ! ब्रह्मरुचि नामका एक ब्राह्मण था और उसकी कूर्मी नामक स्त्री थो॥११७|| ब्राह्मण तापस होकर वनमें रहने लगा और फल तथा कन्दमूल आदि भक्षण करने लगा। ब्राह्मणी भी इसके साथ रहती थी सो ब्राह्मणने इसमें गर्भ धारण किया ॥११८॥ अथानन्तर किसी दिन संयमके धारक निर्ग्रन्थमुनि कहीं जा रहे थे सो मार्गवश उस स्थानपर आये ॥११९।। और श्रमको दूर करनेवाले उस आश्रममें थोड़ी देरके लिए विश्राम करने लगे। उसी आश्रममें उन मुनियोंने उस ब्राह्मण दम्पतीको देखा जिनका कि आकार तो उत्तम था पर कार्य निन्दनीय था ॥१२०।। जिसका शरीर पीला था, स्तन स्थूल थे, जो दुर्बल थी, गर्भके भारसे म्लान थी और साँसें भरती हुई सर्पिणीके समान जान पड़ती थी ऐसी स्त्रीको देखकर संसारके स्वभावको जाननेवाले उदार हृदय मुनियोंके मनमें दयावश उक्त दम्पतीको धर्मोपदेश देनेका विचार उत्पन्न हुआ॥१२१-१२२॥ उन मुनियोंके बीच में जो बड़े मुनि थे वे मधुर शब्दों में उपदेश देने लगे। उन्होंने कहा कि बडे खेदको बात है देखो.ये प्राणी कर्मोके द्वारा कैसे नचाये जाते हैं ? ॥१२३।। हे तापस ! तूने संसार-सागरसे पार होनेकी आशासे धर्म समझ भाई१. थान्तरे यस्मिन्नि -म. । २. अपश्यद्यान -म,। ३. प्रजाः म.। ४. स्थिता: म. । ५. कस्मैचिदेव ख.। ६. केऽपि म. । ७. अपश्यं म. । ८. दम्पती । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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