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________________ दशमं पर्व २३५ विज्ञापयामि नाथाहं प्रस्थितः खेचराधिपम् । वशीकर्तु श्रिया मत्तं कृतास्मत्पूर्वजागसम् ॥१४९॥ तत्र याते हि रेवायां रम्यायां जिनपूजनम् । मया तटस्थचक्रेण कृतं विमलसैकते ॥१५०॥ सेहोपकरणश्चासौ नीता पूजा सुरंहसा । सहसा पयसा यन्त्ररचितेनास्य मोगिनः ॥१५॥ ततो मया जिनेन्द्रार्चाध्वंसोद्भूतमहारुषा । कृतं कर्मेदमर्थेन न विना द्वेष्मि मानवान् ॥१५२॥ न चानेनोदितं मह्यं संप्राप्ताय प्रमादिना । यथा ज्ञातं मया नेदं क्षम्यतामिति मानिना॥१५३॥ भूचरान्मानुषाजेतुं यो न शक्तः स खेचरान् । कथं जेष्यामि विद्याभिः कृतनानाविचेष्टितान् ॥१५॥ वशीकरोम्यतस्तावद्भुचरान्मानशालिनः । ततो विद्याधराधीशं सोपानक्रमयोगतः ॥१५५॥ ततो वशीकृतस्यास्य मुक्तिया॑य्यैव किं पुनः । भवत्स्वाज्ञां प्रयच्छत्सु पुण्यवदृश्यमूर्तिषु ॥१५६॥ अथेन्द्रजिदुवाचेदं साधु देवेन भाषितम् । को वा नयविदं नाथं मुक्त्वा जानाति माषितुम् ॥१५७॥ वतो दशमुखादिष्टो मारीचोऽधिकृतैर्नरैः । आनाययत्सहस्रांशुं नग्नसायकपाणिभिः ॥१५॥ तातस्य चरणौ नत्वा भूमौ चासावुपाविशत् । संमान्य च दशास्येन विरोषेणेति भाषितः ॥१५९।। अद्य प्रभृति मे भ्राता तुरीयस्त्वं महाबलः । जेष्यामि भवता साकं कृताखण्डलविभ्रमम् ॥१६॥ स्वयंप्रमा च ते दास्ये मन्दोदर्याः कनीयसीम् । कृतं यद्भवता तच्च प्रमाणं मे वराकृते ॥१६॥ सहस्ररश्मिरूचे च धिङ्मे राज्यमशाश्वतम् । आपातमात्ररम्यॉश्च विषयान् दुःखभयसः ॥१६२॥ इन्द्रको वश करनेके लिए प्रयाण कर रहा हूँ ॥१४८-१४९।। सो इस प्रयाणकालमें मनोहर रेवा नदीके किनारे चक्ररत्न रखकर मैं बालूके निर्मल चबूतरेपर जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिए बैठा था सो इस भोगी-विलासी सहस्ररश्मिके यन्त्ररचित वेगशाली जलसे उपकरणोंके साथ-साथ मेरी वह सब पूजा अचानक बह गयी ॥१५०-१५१।। जिनेन्द्र भगवान्की पूजाके नष्ट हो जानेसे मुझे बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ सो इस क्रोधके कारण ही मैंने यह कार्य किया है। प्रयोजनके बिना मैं किसी मनुष्यसे द्वेष नहीं करता ॥१५२।। जब मैं पहुंचा तब इस मानी एवं प्रमादीने यह भी नहीं कहा कि मुझे ज्ञान नहीं था अतः क्षमा कीजिए ॥१५३॥ जो भूमिगोचरी मनुष्योंको जीतनेके लिए समर्थ नहीं है वह विद्याओंके द्वारा नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करनेवाले विद्याधरोंको कैसे जीत सकेगा?||१५४।। यही सोचकर मैं पहले अहंकारी भूमिगोचरियोंको वश कर रहा हूँ। उसके बाद श्रेणीके क्रमसे विद्याधराधिपति इन्द्रको वश करूँगा ॥१५५॥ इसे मैं वश कर चुका हूँ अतः इसको छोड़ना न्यायोचित ही है फिर जिनके दर्शन केवल पुण्यवान् मनुष्योंको ही हो सकते हैं ऐसे आप आज्ञा प्रदान कर रहे हैं अतः कहना ही क्या है ? ॥१५६।। तदनन्तर रावणके पुत्र इन्द्रजित्ने कहा कि आपने बिलकुल ठीक कहा है सो उचित ही है क्योंकि आप जैसे नीतिज्ञ राजाको छोड़कर दूसरा ऐसा कौन कह सकता है ? ॥१५७।। तदनन्तर रावणका आदेश पाकर मारीच नामा मन्त्रीने हाथमें नंगी तलवार लिये हुए अधिकारी मनुष्योंके द्वारा सहस्ररश्मिको सभामें बुलवाया ॥१५८॥ सहस्ररश्मि पिताके चरणोंमें नमस्कार कर भूमिपर बैठ गया। रावणने क्रोधरहित होकर बड़े सम्मानके साथ उससे कहा ॥१५९।। कि आजसे तुम मेरे चौथे भाई हो। चूंकि तुम महाबलवान् हो अतः तुम्हारे साथ मैं इन्द्रकी विडम्बना करनेवाले राजा इन्द्रको जीतूंगा ॥१६०॥ मैं तुम्हारे लिए मन्दोदरीकी छोटी बहन स्वयंप्रभा दूंगा। हे सुन्दर आकृतिके धारक ! तुमने जो किया है वह मुझे प्रमाण है ॥१६१।। सहस्ररश्मि बोला कि मेरे इस क्षणभंगुर राज्यको धिक्कार है। जो प्रारम्भमें रमणीय दिखते १, जाते ख., क. । २. महोपकरण -म., ब.। ३. अपहृता। ४. कथितम् । ५. भवत्सु + आज्ञा । ६. आपातरम्यांश्च विषयान्पश्चाददुःखभूयसः क., ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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