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________________ पद्मपुराणे श्रिता येsपि सुदुर्गाणि स्थानान्यम्बरगाधिपाः । नमितास्तेऽपि तत्पादौ शोभनैः पूर्वकर्मभिः ॥ २६ ॥ बलानां हि समस्तानां बलं कर्मकृतं परम् । तस्योदये स कं जेतु न समर्थो 'नरेश्वरः ॥ २७॥ अथेन्द्रजितये गन्तुं प्रवृत्तेनामुना स्मृता । स्वसात्यन्तघनस्नेहात् पारंपर्याच्च तत्पतिः ||२८|| प्रस्थितश्च स तं देशं श्रुतः स्वस्रा समुत्कया । प्राप्तः स्थितः समासन्ने देशे प्रीतिसमुत्कटः ॥२९॥ ततश्चरमयामादौ क्षपायाः शयितः सुखम् । कैकसेय्या परप्रीत्या बोधितः खरदूषणः ॥३०॥ ततो निर्गत्य तेनासावलंकारोदयात् पुरात् । दशवक्त्रो महाभक्त्या पूजितः परमोत्सबैः ॥ ३१॥ रावणोऽपि स्वसुः प्रीत्या चक्रेऽस्य प्रतिपूजनम् । प्रायो हि सोदरस्नेहात् परः स्नेहो न विद्यते ||३२|| चतुर्दशसहस्राणि कामरूपविकारिणाम् । दर्शितानि दशास्याय तेन व्योमविचारिणाम् ॥३३॥ दूषणाख्यश्व सेनायाः पतिरात्मसमः कृती । शूरो गुणसमाकृष्टसर्वसामन्तमानसः ||३४|| एतैश्च प्रस्थितः साकं कृतसर्वास्त्रकौशलैः । आवृतोऽसुरसंघातैः पातालाच्चामरो यथा ||३५|| हिडम्बो हैहिडो डिम्बो विकटत्रिजटो हयः । साकोर्टः सुजटष्टङ्कः किष्किन्धाधिपतिस्तथा ॥३६॥ त्रिपुरो मलयो हेमपालकोलवसुन्धराः । नानायानसमारूढा नानाशस्त्रविराजिताः || ३७ ॥ एवमाद्यैः खगाधीशैरापुपूरे स निर्गतः । विद्युदिन्द्रधनुर्युक्तैर्घनौधैः श्रावणो यथा ॥ ३८ ॥ सहस्रमधिकं जातं विहायस्तलचारिणाम् | अक्षौहिणीप्रमाणानां "कैलासोल्लासकारिणः || ३९॥ २२६ अवस्थित रखता था || २४ - २५ || जो विद्याधर राजा अत्यन्त दुर्गम स्थानोंमें रहते थे उन्होंने भी उत्तमोत्तम शिष्टाचार के साथ रावणके चरणोंमें नमस्कार किया था ||२६|| आचार्य कहते हैं कि सब बलोंमें कर्मोंके द्वारा किया हुआ बल ही श्रेष्ठ बल है सो उसका उदय रहते हुए रावण किसे जीतने के लिए समर्थं नहीं हुआ था ? अर्थात् वह सभीको जीतनेमें समर्थं था ||२७|| अथानन्तर - रावण रथनूपुर नगरके राजा इन्द्र विद्याधरको जीतनेके लिए प्रवृत्त हुआ सो उसने इस अवसर पर अपनी बहन चन्द्रनखा और उसके पति खरदूषणका बड़े भारी स्नेहसे स्मरण किया ||२८|| प्रस्थान कर पाताललंकाके समीप पहुँचा । जब बहनको इस बातका पता चला कि प्रीति से भरा हमारा भाई निकट ही आकर स्थित है तब वह उत्कण्ठासे भर गयी ||२९|| उस समय रात्रिका पिछला पहर था और खरदूषण सुखसे सो रहा था सो चन्द्रनखाने बड़े प्रेमसे उसे जगाया ||३०|| तदनन्तर खरदूषणने अलंकारोदयपुर ( पाताललंका ) से निकलकर बड़ी भक्ति और बहुत भारी उत्सवसे रावण की पूजा की ॥ ३१ ॥ रावणने भी बदले में प्रीतिपूर्वक बहनकी पूजा की सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें भाईके स्नेहसे बढ़कर दूसरा स्नेह नहीं है ||३२|| खरदूषणने रावण के लिए इच्छानुसार रूप बदलनेवाले चौदह हजार विद्याधर दिखलाये ||३३|| जो अत्यन्त कुशल था, शूरवीर था और जिसने अपने गुणोंसे समस्त सामन्तोंके मनको अपनी ओर खींच लिया था ऐसे खरदूषणको रावणने अपने समान सेनापति बनाया ||३४|| जिस प्रकार असुरोंके समूह से आवृत चामरेन्द्र पाताल से निकलकर प्रस्थान करता है उसी प्रकार रावणने सर्वप्रकारके शस्त्रों में कौशल प्राप्त करनेवाले खरदूषण आदि विद्याधरोंके साथ पाताललंका से निकलकर प्रस्थान किया ||३५|| हिडम्ब, हैहिड, डिम्ब, विकट, त्रिजट, हय, माकोट, सुजट, टंक, किष्किन्धाधिपति, त्रिपुर, मलय, हेमपाल, कोल और वसुन्धर आदि राजा नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ़ होकर साथ जा रहे थे । ये सभी राजा नाना प्रकारके शस्त्रोंसे सुशोभित ॥ ३६-३७ ॥ जिस प्रकार बिजली और इन्द्रधनुषसे युक्त मेघोंके समूहसे सावनका माह भर जाता है उसी प्रकार उन समस्त विद्याधर राजाओंसे दशानन भर गया था ||३८|| इस प्रकार कैलासको कम्पित 1 १. नरेश्वर म. । २. स्मृतः म ख । ३. चन्द्रनखया । ४. माकोट स्त्रिजटष्टंक: म. । ५. केलाशो - ल्लासकारिणाम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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