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________________ नवमं पवं किं तर्हि दारुणं कृत्वा क्रोधाग्निज्वलितं मनः । कर्मणा येन लभ्यन्ते भोगाः क्षणविनश्वराः ॥७९॥ प्राप्य तान् कदलीस्तम्भनिस्सारान् मोहवाहिताः । पतन्ति नरके जीवा महादुःखमहाकुले ॥ ८० ॥ हिंसित्वा जन्तुसंघातं नितान्तं प्रियजीवितम् । दुःखं कृतसुखाभिख्यं प्राप्यते तेन को गुणः ॥ ८१ ॥ 'अरघट्टघटीयन्त्रसदृशाः प्राणधारिणः । शश्वद्भवमहाकूपे भ्रमन्त्यत्यन्त दुःखिताः ॥ ८२ ॥ पादयं जिनेन्द्राणां मवनिर्गमकारणम् । प्रणम्य कथमन्यस्य क्रियते प्रणतिर्मया ॥ ८३ ॥ प्रबुद्धेन सता चेयं कृता संस्था मया पुरा । अन्यं न प्रणमामीति जिनपादाब्जयुग्मतः ॥८४॥ भङ्गं करोमि नास्थाया न च प्राणिनिपातनम् । गृह्णामि संगनिर्मुक्तां प्रव्रज्यां मुक्तिदायिनीम् ॥ ८५ ॥ aौ करौ वरनारीणां कृतौ स्तनतटोचितौ । भुजौ चालिङ्गितौ चारुरत्नकेयूरलक्षणी ॥ ८६ ॥ अरार्यः प्रयुङ्क्ते तौ पुरुषोऽञ्जलिबन्धने । ऐश्वर्यं कीदृशं तस्य जीवितं वा हतात्मनः ॥ ८७ ॥ इत्युक्त्वाहूय सुग्रीवमुवाच शृणु बालक । कुरु तस्य नमस्कारं मा वो राज्यप्रतिष्ठितः ॥८८॥ स्वसारं यच्छ मा वास्मै न ममानेन कारणम् । एषोऽस्मि निर्गतोऽद्यैव पथ्यं यत्तव तत्कुरु ॥ ८९ ॥ इत्युक्त्वा निर्गतो गेहाद् बभूव च निरम्बरः । पार्श्व गगनचन्द्रस्य गुरोर्गुणगरीयसः ॥ ९० ॥ परमार्थहितस्वान्तः संप्राप्तपरमोदयः । एकभावरतो वीरः सम्यग्दर्शन निर्मलः ॥ ९१ ॥ सम्यग्ज्ञानाभियुक्तात्मा सम्यक् चारित्रतत्परः । अनुप्रेक्षाभिरात्मानं भावयन्मोहवर्जितः ||९२ ॥ फिर कठिन मनको क्रोधाग्निसे प्रज्वलित किया जाये तो कहना ही क्या है ? फिर भी मुझे उस कर्मकी आवश्यकता नहीं जिससे कि क्षणभंगुर भोग प्राप्त होते हैं || ७९ || मोही जीव केलाके स्तम्भके समान निःसार भोगोंको प्राप्त कर महादुःखसे भरे नरक में पड़ते हैं ||८०|| जिन्हें अपना जीवन अत्यन्त प्रिय है ऐसे जीवोंके समूहको मारकर सुख नामको धारण करनेवाला दुःख ही प्राप्त होता है, अत: उससे क्या लाभ है ? || ८१ || ये प्राणी अरहट (रहट ) की घटी के समान अत्यन्त दुःखी होते हुए संसाररूपी कूपमें निरन्तर घूमते रहते हैं ॥ ८२|| संसारसे निकलने में कारणभूत जिनेन्द्र भगवान्‌के चरण युगलको नमस्कार कर अब मैं अन्य पुरुषके लिए नमस्कार कैसे कर सकता हूँ ? ||८३ || जब पहले मुझे सम्यग्ज्ञान प्राप्त हुआ था तब मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं जिनेन्द्रदेव के चरणकमलोंके सिवाय अन्य किसीको नमस्कार नहीं करूँगा || ८४|| मैं न तो इस प्रतिज्ञाका भंग करना चाहता हूँ और न प्राणियोंकी हिंसा ही । मैं तो मोक्ष प्रदान करनेवाली निर्ग्रन्थ दीक्षा ग्रहण करता हूँ || ८५ ॥ जो हाथ उत्तमोत्तम स्त्रियों के स्तनतटका स्पर्श करनेवाले थे तथा मनोहर रत्नमयी बाजूबन्दोंसे सुशोभित जो भुजाएँ उत्तमोत्तम स्त्रियोंका आलिंगन करनेवाली थीं उन्हें जो मनुष्य शत्रुओं के समक्ष अंजलि बाँधने में प्रयुक्त करता है उस अधमका ऐश्वर्यं कैसा ? और जीवन कैसा ? ||८६-८७।। इस प्रकार कहकर उसने छोटे भाई सुग्रीवको बुलाकर कहा कि हे बालक ! तू राज्यपर प्रतिष्ठित होकर दशाननको नमस्कार कर अथवा न कर और इसके लिए अपनी बहन दे अथवा न दे, मुझे इससे प्रयोजन नहीं। मैं तो आज ही घर से बाहर निकलता हूँ। जो तुझे हितकर मालूम हो वह कर ||८८-८९|| इतना कहकर बाली घरसे निकल गया और गुणोंसे श्रेष्ठ गगनचन्द्र समीप दिगम्बर हो गया ||१०|| अब तो उसने अपना मन परमार्थ में ही लगा रखा था । उसे अनेक ऋद्धि आदि अभ्युदय प्राप्त हुए थे । वह एक शुद्ध भावमें ही सदा रत रहता था, परीषहोंके सहन करनेमें शूरवीर था, सम्यग्दर्शनसे निर्मल था अर्थात् शुद्ध सम्यग्दृष्टि था, उसकी आत्मा सदा सम्यग्ज्ञानमें लीन रहती थी, वह सम्यक् चारित्रमें तत्पर रहता था और मोहसे रहित हो अनुप्रेक्षाओंके द्वारा आत्माका चिन्तवन करता रहता था । ९१ - ९२ ॥ सूक्ष्म जीवोंसे रहित तथा निर्मल आचारके धारी महामुनियोंसे सेवित धर्माराधनके योग्य भूमियोंमें ही वह विहार करता था । १. क्रोधाग्नि ज्वलितं म । २. अरहट्ट ब. । ३. सदृशं ख., सदृशे म. । Jain Education International २१३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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