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________________ ~ अष्टम पर्व २०१ इति स्वपक्षदौःस्थित्यमवगम्य मयोदितम् । देव प्रमाणमत्रार्थे कृत्यहं त्वनिवेदनात् ॥४५॥ व्रणभङ्ग ततस्तस्य कर्तुमादिश्य सादरम् । उच्चचाल महाक्रोधः स्मितं कृत्वा दशाननः ॥४५९॥ जगाद चोद्यतान् क्लेशमहार्णवमुपागतान् । वैतरण्यादिनिक्षिप्तान् वारयाम्यसुधारिणः ॥४६०॥ अग्रस्कन्धेन चोदाराः प्रहस्तप्रमुखा नृपाः । प्रवृत्ताः शस्त्रतेजोमिः कुर्वाणा ज्वलितं नमः ॥४६१॥ विचित्रवाहनारूढाश्छत्रध्वजसमाकुलाः । तूर्यनादसमुद्भतमहोत्साहा महौजसः ॥४६२॥ नाथा गगनयात्राणां क्षितिं प्राप्ताः पुरान्तिकाम् । शोभया गृहपङ्क्तीनां परमं विस्मयं गताः ॥४६३॥ दिशि किष्कुपुरस्याथ दक्षिणस्यां दशाननः । ददर्श नरकावासगांक्षिप्ता नृसंहतीः ॥४६॥ कृत्वा मरकपालानां ध्वंसनं दुःखसागरात् । उत्तारितास्ततः सर्व बन्धुनेवामुना जनाः ॥४६५।। श्रुत्वा परबलं प्राप्त साटोपो नाम वीर्यवान् । निर्ययौ सर्वसैन्येन प्रक्षुब्ध इव सागरः ॥४६६॥ द्विपैर्गिरिनिभै(मैनिधारान्धकारिभिः । तुरङ्गश्च चलञ्चारुचामरप्राप्तभूषणैः ॥४६७॥ रथैरादित्यसंकाशैर्ध्वजपङ्क्तिविभूषितैः । पिनद्धकवचैः शस्त्रैर्मटैवीं रैरधिष्ठितैः ॥४६॥ ततस्तं स्यन्दनारूढो हसन् यममर्ट क्षणात् । मङ्गं विभीषणो निन्ये बाणै रणविशारदः ॥४६९॥ यमस्य किङ्करा दीनाः कुर्वाणाः खमायतम् । बाणैः समाहताश्चक्रुः क्षिप्रं क्वापि पलायनम् ।।४७०॥ आपके पास आया हूँ॥४५६-४५७।। इस प्रकार अपने पक्षके लोगोंकी दुर्दशा जानकर मैंने आपसे कही है। इस विषयमें अब आप ही प्रमाण हैं अर्थात् जैसा उचित समझें सो करें। मैं तो आपसे निवेदन कर कृतकृत्य हो चुका ।।४५८॥ तदनन्तर महाक्रोधी रावणने अपने पक्षके लोगोंको बड़े आदरसे आदेश दिया कि इस शाखावलीके घाव ठीक किये जावें। तदनन्तर मुसकराता हुआ वह उठा और साथ ही उठे अन्य लोगोंसे कहने लगा कि मैं कष्टरूपी महासागरमें पड़े तथा वैतरणी आदि कष्टदायी स्थानोंमें डाले गये लोगोंका उद्धार करूँगा ॥४५९-४६०।। प्रहस्त आदि बड़े-बड़े राजा सेनाके आगे दौड़े। वे शस्त्रोंके तेजसे आकाशको देदीप्यमान कर रहे थे ॥४६१॥ नाना प्रकारके वाहनोंपर सवार थे, छत्र और ध्वजाओंको धारण करनेवाले थे। तुरहीके शब्दोंसे उनका बड़ा भारी उत्साह प्रकट हो रहा था और वे महातेजस्वी थे ही ॥४६२।। इस प्रकार विद्याधरोके अधिपति आकाशसे उतरकर पृथिवीपर आये और नगर के समीप महलोंकी पंक्तिकी शोभा देख परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥४६३।। तदनन्तर रावणने किष्कुपुर नगरकी दक्षिण दिशामें कृत्रिम नरकके गर्त में पड़े मनुष्योंके समूहको देखा ॥४६४॥ देखते ही उसने नरककी रक्षा करनेवाले लोगोंको नष्ट किया और जिस प्रकार बन्धुजन अपने इष्ट लोगोंको कष्टसे निकालते हैं उसी प्रकार उसने सब लोगोंको नरकसे निकाला ।।४६५।। तदनन्तर शत्रुसेनाको आया सुनकर बड़े भारी आडम्बरको धारण करनेवाला, शक्तिशाली यम नाम लोकपालका साटोप नामका प्रमुख भट युद्ध करनेके लिए अपनी सब सेनाके साथ बाहर निकला। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो क्षोभको प्राप्त हुआ सागर ही हो ॥४६६।। पहाड़के समान ऊँचे, भयंकर और मदकी धारासे अन्धकार फैलानेवाले हाथी, चलते हुए सुन्दर चामररूपी आभूषणोंको धारण करनेवाले घोड़े, सूर्यके . . समान देदीप्यमान तथा ध्वजाओंकी पंक्तिसे सुशोभित रथ, और कवच धारण करनेवाले एवं शस्त्रोंसे युक्त शूरवीर योद्धा इस प्रकार चतुरंग सेना उसके साथ थी ॥४६७-४६८॥ तदनन्तर रथपर आरूढ़ एवं रणकलामें निपुण विभीषणने हँसते-हँसते ही बाणोंके द्वारा उस साटोपको क्षण-भरमें मार गिराया ॥४६९॥ यमके जो दीन हीन किंकर थे वे भी बाणोंसे ताड़ित हो आकाशको लम्बा १. कृती + अहम्, कृत्योऽहं म.। कृतोऽहं तन्निवेदनात् क., ख.। २. तथा म.। ३. हंसनैः सुभटं म. । ४. दीनं क.,ख.। २६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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