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________________ अष्टमं पर्व चिन्तयनिति चान्यच्च बहुदुःखितमानसः । विस्मृतो जननीशोकं स बभ्राम ग्रही यथा ॥३१९॥ पर्यटश्च बहून् देशान् प्राप्तः सिन्धुनदं पुरम् । तदवस्थोऽपि वीर्येण तेजसा 'चोरुणान्वितः ॥३२०॥ बहिः क्रीडाविनिष्क्रान्तस्तत्र तं वीक्ष्य योषितः । स्तम्मिता इव निश्चेष्टाः स्पष्टाक्ष्यः शतशोऽभवन् ॥३२॥ पुण्डरीकेक्षणं मेरुकटकोदारवक्षसम् । दिङ्मतङ्गजकुम्मांसमिभस्तम्भसमोरुकम् ॥३२२॥ उन्मत्तत्वमुपेतानामनन्यगतचेतसाम् । पश्यन्तीनां न तं तृप्तिर्बभूव पुरयोषिताम् ॥३२३॥ अथाञ्जनगिरिच्छायः प्रगलद्दाननिर्भरः । आजगाम गजस्तासां स्त्रीणामभिमुखो बलात् ॥३२४॥ न शक्नोमि गजं धतु कुरुताशु पलायनम् । यदि शक्तियुताः नार्य इत्यारोहेण चोदितम् ॥३२५॥ नरवृन्दारकासक्तचेतनास्ता न तद्वचः । चक्रुः श्रवणयोर्नापि समर्थाः प्रपलायितुम् ॥३२६॥ मुहुः प्रचण्डमारोहे ततो रटति चेतितम् । वनिताभिर्बभूवुश्च भव्यव्याकुलचेतसः ॥३२७॥ ततस्ताः शरणं जग्मुस्तं नरं कृतकम्पनाः । भयेनोपकृतं तासां तत्समागमचेतसाम् ॥३२८॥ ततः स करुणायुक्तो हरिषेणो व्यचिन्तयत् । संभ्रान्तोत्तमरामाङ्गसंगमात् पुलकाञ्चितः ॥३२९॥ इतः सिन्धुर्गभीरोऽयमितः शालो गजोऽन्यतः । संकटे तु परिप्राप्त करोमि प्राणिपालनम् ॥३३॥ वृषः खनति वल्मीकं शृङ्गाभ्यां न तु भूधरम् । पुरुषः कदलीं छिन्ते सायकेन शिला तु न ॥३३॥ मृदुं पराभवत्येष लोकः प्रखलचेष्टितः । उद्धृत्याप्यसुखं कर्तुं नाभिवाञ्छति कर्कशे ॥३३२॥ कभीका मर जाता। वास्तवमें मेरे प्राण उसोके समागमकी आशासे रुके हुए हैं ॥३१८॥ जिसका मन अत्यन्त दुःखी था ऐसा हरिषेण इस प्रकार तथा अन्य प्रकारकी चिन्ता करता हुआ माताका शोक भूल गया । अब तो वह भूताक्रान्त मानवके समान इधर-उधर घूमने लगा ॥३१९|| इस प्रकार अनेक देशोंमें घूमता हुआ सिन्धुनद नामक नगरमें पहुँचा। यद्यपि उसकी वैसी अवस्था हो रही थी तो भी वह बहत भारी पराक्रम और विशाल तेजसे यक्त था॥३२०॥ उस नगरकी ज क्रीड़ा करने के लिए नगरके बाहर गयी थीं वे हरिषेणको देखकर आश्चर्यचकितकी तरह निश्चेष्ट हो गयीं। वे सैकड़ों बार आंखें फाड़-फाड़कर उसे देखती थीं।।३२१।। जिसके नेत्र कमलके समान थे, जिसका वक्षःस्थल मेरुपर्वतके कटकके समान लम्बा-चौड़ा था, जिसके कन्धे दिग्गजके गण्डस्थलके समान थे, और जिसकी जाँघे हाथी बाँधनेके खम्भेके समान सुपुष्ट थीं ऐसे हरिषेणको देखकर वे स्त्रियाँ पागल-सी हो गयीं, उनके चित्त ठिकाने नहीं रहे तथा उसे देखने-देखते उन्हें तृप्ति नहीं हुई ॥३२२-३२३।। अथानन्तर-अंजनगिरिके समान काला और झरते हुए मदसे भरा एक हाथी बलपूर्वक उन स्त्रियों के सामने आया ।।३२४|| हाथीका महावत जोर-जोरसे चिल्ला रहा था कि हे स्त्रियो ! यदि तुम लोगोंमें शक्ति है तो शीघ्र ही भाग जाओ, मैं हाथीको रोकनेमें असमर्थ हूँ ॥३२५॥ पर स्त्रियाँ तो श्रेष्ठ पुरुष हरिषेणके देखनेमें आसक्त थीं इसलिए महावतके वचन नहीं सुन सकी और न भागने में ही समर्थ हुई ॥३२६।। जब महावतने बार-बार जोरसे चिल्लाना शुरू किया तब स्त्रियोंने उस ओर ध्यान दिया और तब वे भयसे व्याकुल हो गयीं ॥३२७।। तदनन्तर काँपती हुई वे स्त्रियाँ हरिषेणकी शरणमें गयीं। इस तरह उसके साथ समागमकी इच्छा करनेवाली स्त्रियोंका भयने उपकार किया ।।३२८।। तत्पश्चात् घबड़ायी हुई उत्तम स्त्रियोंके शरीरके सम्पर्कसे जिसे रोमांच उठ आये थे ऐसे हरिषेणने दयायक्त हो विचार किया ॥३२९|| कि इस ओर गहर है. उस ओर प्राकार है और उधर हाथी है इस तरह संकट उपस्थित होनेपर मैं प्राणियोंकी रक्षा अवश्य करूँगा ।।३३०। जिस प्रकार बैल अपने सींगोंसे वामीको खोदता है पर्वतको नहीं। और पुरुष बाणसे केलेके वृक्षको छेदता है शिलाको नहीं ।।३३१।। इसी प्रकार दुष्ट चेष्टाओंसे भरा मानव १. च+ऊरुणा = विशालेन, चारुणा म.। २. स्पष्टाक्षाः । २. शक्नुवतो म.। ४. हस्तिपके । ५. ज्ञातम् । ६. शालोऽयमेकतः क. । ७. उद्वत्याप्य म.। ८. कर्कश: क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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