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________________ सप्तमं पर्व सुमाली माल्यवान् सूर्यरजा ऋक्षरजास्तथा । रत्नश्रवाश्च तान् स्नेहादालिलिङ्गुः पुनः पुनः ॥३६९॥ समं बान्धवलोकेन भृत्यवर्गेण चावृताः । चक्रुरभ्यवहारं ते स्वेच्छाकल्पितसंपदः ॥३७०॥ गुरुपु प्राप्तपूजेषु ततो वस्त्रादिदानतः । यथार्ह भृत्यबर्गे च संप्राप्तप्रतिमानने ॥३७१॥ विश्रब्धा गुरवोऽपृच्छंस्तान् प्रीतिविकचेक्षणाः । दिवसा नियतो वत्साः सुखेन सुस्थिता इति ॥३७२॥ ततस्ते मस्तके कृत्वा करयुग्मं प्रणामिनः । ऊचुनः कुशलं नित्यं प्रसादाद् भवतामिति ॥३७३॥ मालिनः संकथाप्राप्तं कथयन् मरणं ततः । सुमाली शोकभारेण सद्यो मूच्छा समागतः॥३७४।। रत्नश्रवःसुतेनासौ ततः शीतलपाणिना । संस्पृश्य पुनरानीतो ज्येष्ठेन व्यकचेतनाम् ॥३७५॥ आनन्दितश्च तद्वाक्यैरूर्जितैर्हिमशीतलैः । समस्तशत्रुसंघातघातबीजाङ्कुरोद्गमैः ॥३७६।। पुण्डरीकेक्षणं पश्यन् सुमाली तं ततोऽर्भकम् । शोकं क्षणात्समुत्सृज्य पुनरानन्दमागताः ॥३७७।। इति चोवाच तं हृद्यैर्वचोभिर्वितथेतरैः । अहो वत्स तवोदारं सत्त्वं तोषितदैवतम् ॥३७८॥ अहो द्युतिरियं जित्वा स्थिता तव दिवाकरम् । अहो गाम्भीर्यमुत्साय स्थितमेतन्नदीपतिम् ॥३७९।। अहो पराक्रमः कान्त्या सहितोऽयं जेनातिगः । अहो रक्षःकुलस्यासि जातस्तात विशेषकः ॥३८०॥ मन्दरेण यथा जम्बूद्वीपः कृतविभूषणः । नमस्तलं शशाङ्केन यथा तिग्मकरेण च ॥३८१॥ सुपुत्रेण तथा रक्षःकुलमेतद्दशानन । त्वया लोकमहाश्चर्यकारिचेष्टेन भूषितम् ॥३८२।। आसंम्तोयदवाहाद्या नरास्त्वत्कुलपूर्वजाः । भुक्त्वा लकापुरीं कृत्वा सुकृतं ये गताः शिवम् ॥३८३।। भी अधिक है अतः उन्होंने यही कहा कि तुम लोग चिरकाल तक जीवित रहो ॥३६८।। सुमाली, माल्यवान्, सूर्यरज, ऋक्षरज और रत्नश्रवाने स्नेहवश उनका बार-बार आलिंगन किया था ।।३६९|| तदनन्तर इच्छानुसार जिन्हें सब सम्पदाएँ प्राप्त थीं ऐसे उन सब लोगोंने बन्धुजनों तथा भृत्यवर्गसे आवृत होकर भोजन किया ।।३७०।। तदनन्तर दशाननने वस्त्र आदि देकर गुरुजनोंकी पूजा की और यथायोग्य भृत्यवर्गका भी सम्मान किया ॥३७१।। तत्पश्चात् प्रीतिसे जिनके नेत्र फूल रहे थे ऐसे समस्त गुरुजन निश्चिन्ततासे बैठे थे। प्रकरण पाकर उन्होंने कहा कि हे पुत्रो ! इतने दिन तक तुम सब सुखसे रहे ? ॥३७२।। तब दशानन आदि कुमारोंने हाथ जोड़ सिरसे लगाकर प्रणाम करते हुए कहा कि आप लोगोंके प्रसादसे हम सबकी कुशल है ॥३७३।। तदनन्तर प्रकरणवश मालीके मरणकी चर्चा करते हुए सुमाली इतने शोकग्रस्त हुए कि उन्हें तत्काल ही मूर्छा आ गयी ॥३७४।। तत्पश्चात् रत्नश्रवाके जेष्ठ पुत्र दशाननने अपने शीतल हाथसे स्पर्श कर उन्हें पुनः सचेत किया ॥३७५।। तथा बर्फ के समान ठण्डे और समस्त शत्रुसमूहके घातरूपी बोजके अंकुरोद्गमके समान शक्तिशाली वचनोंसे उन्हें आनन्दित किया ।।३७६।। तब कमलके समान नेत्रोंसे सुशोभित दशाननको देख, सुमाली तत्काल ही सब शोक छोड़कर पुनः आनन्दको प्राप्त हो गये ॥३७७|| और दशाननसे हृदयहारी सत्य वचन कहने लगे कि अहो वत्स ! सचमुच ही तुम्हारा उदार बल देवताओंको सन्तुष्ट करनेवाला है ॥३७८|| अहो! तुम्हारी यह कान्ति सूर्यको जीतकर स्थित है तम्हारा गाम्भीर्य समद्रको दर हटाकर विद्यमान है॥३७९॥ अहो ! तम्हारा यह कान्तिसहित पराक्रम सर्वजनातिगामी है अर्थात् सब लोगोंसे बढ़कर है। अहो पुत्र ! तुम राक्षसवंशके तिलकस्वरूप उत्पन्न हुए हो ।।३८०॥ हे दशानन ! जिस प्रकार सुमेरुपर्वतसे जम्बूद्वीप सुशोभित है और चन्द्रमा तथा सूर्यसे आकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार लोगोंको महान् आश्चर्य में डालनेवाली चेष्टाओंसे युक्त तुझ सुपुत्रसे यह राक्षसवंश सुशोभित हो रहा है ।।३८१-३८२।। मेघवाहन आदि तुम्हारे कुलके पूर्वपुरुष थे जो लंकापुरीका पालन कर तथा अन्तमें तपश्चरण कर मोक्ष गये हैं १. -दालिलिङ्ग म., क. । २. जिनातिगः म. । ३. जातस्तत म. । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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