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________________ सप्तमं पर्व १६३. चतुःसमुद्रपर्यन्ते नागम्यन्तरसंकुले । तिष्ठत्वत्र यथाच्छन्दं जम्बूद्वीपतले भवान् ॥३४२॥ द्वीपस्यास्य समस्तस्य वसिताहमकण्टकः । यथेप्सितं चरेस्तस्मिनुद्धरन् शत्रुसंहतिम् ॥३४३॥ प्रसन्ने मयि ते वस्स स्मृतिमात्रपुरःस्थिते । ईप्सितव्याहतौ शक्तो न शक्रोऽपि कुतोऽपरे ॥३४४॥ द्राषिष्ठं जीव कालं त्वं भ्रातृभ्यां सहितः सुखी । वर्द्धन्तां भूतयो दिव्या बन्धुसेव्याः सदा तव ॥३४५॥ इत्याशीभिः समानन्ध सत्याभिस्तान् पुनः पुनः । जगाम स्वालयं यक्षः परिवारसमन्वितः ॥३४६॥ तं रत्नश्रवसं श्रुत्वा विद्यालिङ्गितविग्रहम् । सर्वतो रक्षसां सङ्घाः प्राप्ताः कृतमहोत्सवाः ॥३४७॥ उन्नतं ननृतुः केचिच्चक्रुरास्फोटनं तथा । केचित् प्रमोदसंपूर्णाः संभूता न स्वविग्रहे ॥३४८॥ 'उदात्तं नदितं कैश्चिच्छत्रुपक्षमयंकरम् । सुधयेव नमः कैश्चिलिम्पनिर्हसितं चिरम् ॥३४९॥ सुमाली माल्यवान् सूर्यरजा ऋक्षरजास्तथा । आगता नितरां प्रीताः समारुह्योत्तमान् रथान् ॥३५०॥ अन्ये च स्वजनाः सर्वे विमानैर्वाजिभिर्गजैः । स्वदेशेभ्यो विनिष्क्रान्तास्त्रासेन परिवर्जिताः ॥३५१॥ अथ रत्नश्रवाः पुत्रस्नेहसंपूर्णमानसः । वैजयन्तीमिराकाशं शुक्लीकुर्वनिरन्तरम् ॥३५२॥ विभूत्या परया युक्तो वन्दिवृन्दैरभिष्टुतः । संप्राप्तो रथमारूढो महाप्रासादसंनिमम् ॥३५३॥ एकीभूय व्रजन्तोऽमी पञ्चसंगमपर्वते । दुःखेन रजनीं निन्युररातिमययोगतः ॥३५४॥ ततो गुरून् प्रणामेन समाश्लेषणतः सखीन् । स्निग्धेन चक्षषा भृत्यान् जगृहुः कैकसीसुताः ॥३५५॥ हे महाबुद्धिमन् ! मैं तुम्हारे वीर्यसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥३४१॥ अतः जिसके अन्तमें पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण इस प्रकार चार समुद्र हैं तथा जो नागकुमार और व्यन्तर देवोंसे व्याप्त है ऐसे इस जम्बूद्वीपमें इच्छानुसार रहो।।३४२॥ मैं इस समस्त दीपका अधिपति हूँ, मेरा कोई भी प्रतिद्वन्द्वी नहीं है अतः तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम शत्रुसमूहको उखाड़ते हुए इस जम्बूद्वीपमें इच्छानुसार सर्वत्र विचरण करो ॥३४३।। हे वत्स ! मैं तुझपर प्रसन्न हैं और तेरे स्मरण मात्रसे सदा तेरे सामने खड़ा रहूँगा। मेरे प्रभावसे तेरे मनोरथमें बाधा पहुंचाने के लिए इन्द्र भी समर्थ नहीं हो सकेगा फिर साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है ? ॥३४४॥ तू अपने दोनों भाइयोंके साथ सुखी रहता हुआ दीर्घ काल तक जीवित रह । तेरी दिव्य विभूतियाँ सदा बढ़ती रहें और बन्धुजन सदा उनका सेवन करते रहें ॥३४५॥ इस प्रकार यथार्थ आशीर्वादसे उन तीनों भाइयोंको आनन्दित कर वह यक्ष परिवारके साथ अपने स्थानपर चला गया ॥३४६।। तदनन्तर दशाननको विद्याओंसे आलिंगित सुन चारों ओरसे राक्षसोंके समूह महोत्सव करते हुए उसके समीप आये ||३४७|| उनमें कोई तो नृत्य करते थे, कोई ताल बजाते थे, कोई हर्षसे इतने फूल गये थे कि अपने शरीर में ही नहीं समाते थे ॥३४८|| कितने ही लोग शत्रुपक्षको भयभीत करनेवाला जोरका सिंहनाद करते थे, कोई आकाशको चूनासे लिप्त करते हुए को तरह चिरकाल तक हँसते रहते थे ॥३४९|| प्रीतिसे भरे सुमाली, माल्यवान्, सूर्यरज और ऋक्षरज उत्तमोत्तम रथोंपर सवार हो उसके समीप आये ||३५०॥ इनके सिवाय अन्य सभी कुटुम्बीजन, कोई विमानोंपर बैठकर, कोई घोड़ोंपर सवार होकर और कोई हाथियोंपर आरूढ़ होकर आये। वे सब भयसे रहित थे ॥३५१।। अथानन्तर पुत्रके स्नेहसे जिसका मन भर रहा था ऐसा रत्नश्रवा पताकाओंसे आकाशको निरन्तर शुक्ल करता हुआ बड़ी विभूतिके साथ आया। बन्दीजनोंके समूह उसकी स्तुति कर रहे थे, और वह किसी बड़े राजमहलके समान सुन्दर रथपर सवार था ॥३५२-३५३।। ये सब मिलकर साथ ही साथ आ रहे थे सो मार्ग में पंचसंगम नामक पर्वतपर उन्होंने शत्रुके भयके कारण बहुत ही दुखसे रात्रि बितायी ॥३५४।। तदनन्तर केकसीके पुत्र दशानन १. भ्रमणं कुर्याः । २. श्रवजं म.। ३. प्रशशंसुश्च रावणम् म.। ४. चन्द्रकान्ति तिरस्कुर्वत् म.। ५. महाप्रसाद -म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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