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________________ १५२ पद्मपुराणे किमेतदिति नाथ त्वं ज्ञातुमर्हसि सांप्रतम् । ज्ञातव्येषु हि नारीणां प्रमाणं प्रियमानसम् ॥१८४॥ ततोऽष्टाङ्गनिमित्तज्ञः कुशलो जिनशासने । रत्नश्रवाः प्रमोदेन स्वप्नार्थान् व्यवृणोत् क्रमात् ॥१८५॥ उत्पत्स्यन्ते त्रयः पुत्रास्त्रिजगद्गतकीर्तयः । तव देवि महासत्त्वाः कुलवृद्धिविधायिनः ॥१८६॥ भवान्तरनिबद्धन सुकृतेनोत्तमक्रियाः । वल्लभत्वं प्रपत्स्यन्ते सुरेष्वपि सुरैः समाः ॥१८७॥ कान्त्युत्सारिततारेशा दीप्त्युत्सारितभास्कराः। गाम्भीर्यजिततोयेशाः स्थैर्योत्सारितभूधराः ॥१८८॥ चारुकर्मफलं भुक्त्वा स्वर्ग शेषस्य कर्मणः । परिपाकमवाप्स्यन्ति सुरैरप्यपराजिताः ॥१८९॥ दाजेन कामजलदाश्चक्रवर्तिसमर्द्धयः । वरसीमन्तिनीचेतोलोचनालीमलिम्लुचाः ॥१९०॥ श्रीवत्सलक्षणात्यन्तराजितोत्तुङ्गवक्षसः । नाममात्रश्रुतिध्वस्तमहासाधनशत्रवः ॥१९१॥ भविता प्रथमस्तेषां नितान्तं जगते हितः । साहसैकरसासक्तः शत्रपद्मक्षपाकरः ॥१९२॥ संग्राम गमनात्तस्य भविष्यति समन्ततः । शरीरं निचितं चारोच्चरोमाञ्चकण्टकैः ॥१९३॥ निधानं कर्मणामेष दारुणानां भविष्यति । वस्तुन्यूरीकृते तस्य न शक्रोऽपि निवर्तकः ॥१९४॥ कृत्वा स्मितं ततो देवी परमप्रमदाञ्चिता । भतराननमालोक्य विनयादित्यभाषत ।।१९५।। अर्हन्मतामृतास्वादसुचिताभ्यां कथं प्रभो । आवाभ्यां प्राप्य जन्मायं क्रूरकर्मा भविष्यति ॥१९६॥ आवयोनन मजापि जिनवाक्येन भाविता । मवेदमृतवल्लीतो विषस्य प्रसवः कथम् ॥१९७।। प्रत्युवाच स तामेवं प्रिये शृणु वरानने । कर्माणि कारणं तस्य न वयं कृत्यवस्तुनि ॥१९८॥ आश्चर्यसे भर गया और उसी समय प्रातःकालीन तुरहीकी ध्वनिसे मेरी निद्रा टूट गयी ।।१८३|| हे नाथ ! यह क्या है ? इसे आप ही जाननेके योग्य हैं क्योंकि स्त्रियोंके जानने योग्य कार्यों में पतिका मन ही प्रमाणभूत है ।।१८४॥ तदनन्तर अष्टांग निमित्तके जानकार एवं जिन-शासनमें कुशल रत्नश्रवाने बड़े हर्षसे क्रमपूर्वक स्वप्नोंका फल कहा ।।१८५।। उन्होंने कहा कि हे देवि ! तुम्हारे तीन पुत्र होंगे। ऐसे पुत्र कि जिनकी कीर्ति तीनों लोकोंमें व्याप्त होगी, जो महापराक्रमके धारी तथा कुलकी वृद्धि करनेवाले होंगे ॥१८६।। वे तीनों ही पुत्र पूर्व भवमें संचित पुण्यकर्मसे उत्तम कार्य करनेवाले होंगे, देवोंके समान होंगे और देवोंके भी प्रीतिपात्र होंगे ।।१८७।। वे अपनी कान्तिसे चन्द्रमाको दूर हटावेंगे, तेजसे सूर्यको दूर भगावेंगे और स्थिरतासे पर्वतको ठकरावेंगे ॥१८८॥ स्वर्गमें पुण्य कर्मका फल भोगनेके बाद जो कुछ कर्म शेष बचा है अब उसका फल भोगेंगे। वे इतने बलवान् होंगे कि देव भी उन्हें पराजित नहीं कर सकेंगे ॥१८९॥ वे दानके द्वारा मनोरथको पूर्ण करनेवाले मेघ होंगे, चक्रवर्तियोंके समान ऋद्धिके धारक होंगे, और श्रेष्ठ स्त्रियोंके मन तथा नेत्रोंको चुरानेवाले होंगे ॥१९०॥ उनका उन्नत वक्षःस्थल श्रीवत्स चिह्नसे अत्यन्त सुशोभित होगा, और उनका नाम सुनते ही बड़ी-बड़ी सेनाओंके अधिपति शत्रु नष्ट हो जावेंगे ॥१९१॥ उन तीनों पुत्रोंमें प्रथम पुत्र जगत्का अत्यन्त हितकारी होगा, साहसके कार्यमें वह बड़े प्रेमसे आसक्त [ शत्रुरूपी कमलोंको निमीलित करने के लिए चन्द्रमाके समान होगा ॥१९२॥ वह युद्धका इतना प्रेमी होगा कि युद्ध में जाते ही उसका सारा शरीर खड़े हुए रोमांचरूपी कंटकोंसे व्याप्त हो जावेगा ।।१९३।। वह घोर भयंकर कार्योंका भाण्डार होगा तथा जिस कार्यको स्वीकृत कर लेगा उससे उसे इन्द्र भी दूर नहीं हटा सकेगा ॥१९४|| पतिके ऐसे वचन सुन परम प्रमोदको प्राप्त हुई केकसी, मन्द हासकर तथा पतिका मुख देखकर विनयसे इस प्रकार बोली कि हे नाथ! हम दोनों का चित्त तो जिनमतरूपी अमृतके आस्वादसे अत्यन्त निर्मल है फिर हम लोगोंसे जन्म पाकर यह पुत्र क्रूरकर्मा कैसे होगा ? ॥१९५-१९६।। निश्चयसे हम दोनोंकी मज्जा भी जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंसे संस्कारित है फिर हमसे ऐसे पुत्रका जन्म कैसे होगा ? क्या कहीं अमृतकी वेलसे विषकी भी उत्पत्ति होती है ? ॥१९७।। इसके उत्तरमें राजा रत्नश्रवाने कहा कि हे प्रिये ! हे उत्कृष्टमुखि ! १. स्थैर्यात्सादित म.। २. निश्चितं म.। ३. च म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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