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________________ सप्तमं पर्व १४९ यशो विभूषणं तस्य भूषणानां सुभूषणम् । गुणाः कीर्त्या समं तस्मिन् सकुटुम्बा इव स्थिताः ॥१४४॥ सभूतिं परमां वाञ्छन् क्रमाद् गोत्रसमागताम् । संत्याजितो निजं स्थानं पत्या स्वर्गनिवासिनाम् ॥ १४५॥ परित्यज्य भयं धीरो विद्यां साधयितुं क्षमः । रौद्रं भूतपिशाचादिनादि पुष्पादिकं वनम् ॥१४६॥ विद्यायां विदितां पूर्वमथों तद्भामिनीं सुताम् । व्योमबिन्दुर्ददावस्मै तपसे परिचारिकाम् ॥ १४७ ॥ तस्य सा योगिनः पार्चे विनीता समवस्थिता । कृताञ्जलिपुटादेशं वाञ्छन्ती तन्मुखोद्गतम् ॥ १४८ ॥ ततः समाप्तनियमः कृतसिद्धनमस्कृतिः । एकाकिनां सतां बालां दृष्टा सरललोचनाम् ॥ १४९ ॥ नीलोत्पलेक्षणां पद्मवक्त्रां कुन्ददल द्विजाम् । शिरीषमालिकाबाहु पाटलादन्तवाससम् ॥ १५०॥ बकुलामोदनिःश्वासां चम्पकत्विक्समत्विषम् । कुसुमैरिव निःशेषां निर्मितां दधतीं तनुम् ॥ १५१ ॥ पद्मालया पद्मां रूपेणैव वशीकृताम् । परमोत्कण्ठयानीतां पादविन्यस्तलोचनाम् ॥१५२॥ अपूर्वपुरुषा लोकलज्जितानतविग्रहाम् । ससाध्वसविनिक्षिप्तनिःश्वासोत्कम्पितस्तनीम् ॥ १५३ ॥ लावण्येन विलिम्पन्तीं पल्लवानन्तिकागताम् । निःश्वासाकृष्टमत्तालिकुलव्याकुलिताननाम् ॥ १५४ ॥ सौकुमार्यादिवोदासद् बिभ्यतानतिनिर्भरम् | यौवनेन कृताश्लेषां संभूतिं योषितः पराम् ॥ १५५ ॥ गृहीत्वेवाखिल स्त्रैणं लावण्यं त्रिजगद्गतम् । कर्मभिर्निर्मितां कर्तुमद्भुतं सार्वलौकिकम् ॥१५६॥ महाबुद्धिमान्ने धर्म, अर्थ, काम में से एक धर्मं में ही महान् प्रयत्न किया था ॥ १४३ ॥ सब आभूषणोंका आभूषण यश ही उसका आभूषण था । गुण उसमें कीर्ति के साथ इस प्रकार रह रहे थे मानो उसके कुटुम्बी ही हों ॥ १४४॥ वह रत्नश्रवा, अपनी वंश-परम्परासे चली आयी उत्कृष्ट विभूतिको प्राप्त करना चाहता था पर इन्द्र विद्याधर ने उसे अपने स्थानसे च्युत कर रखा था ॥ १४५ ॥ निदान, वह धीर-वीर विद्या सिद्ध करनेके लिए, जहाँ भूत-पिशाच आदि शब्द कर रहे थे ऐसे महाभयंकर पुष्प वनमें गया || १४६ || सो रत्नश्रवा तो इधर विद्या सिद्ध कर रहा था उधर विद्याके विषय में पहले से ही परिज्ञान रखनेवाली तथा जो बादमें रत्नश्रवाकी पत्नी होनेवाली थी ऐसी अपनी छोटी कन्या केकसीको व्योमबिन्दुने उसकी तपकालीन परिचर्या के लिए भेजा || १४७ || सो कसी उस योगी के समीप बड़े विनयसे हाथ जोड़े खड़ी हुई उसके मुखसे निकलनेवाले आदेशकी प्रतीक्षा कर रही थी || १४८|| तदनन्तर जब रत्नश्रवाका नियम समाप्त हुआ तब वह सिद्ध भगवान्को नमस्कार कर उठा । उसी समय उसकी दृष्टि अकेली खड़ी केकसीपर पड़ी । केकसीकी आँखों से सरलता टपक रही थी || १४९ || उसके नेत्र नीलकमलके समान थे, मुख कमलके समान था, दाँत कुन्दकी कलीके समान थे, भुजाएँ शिरीषको मालाके समान थीं, अधरोष्ठ गुलाबके समान था || १५ || उसकी श्वाससे मौलिश्री के फूलोंकी सुगन्धि आ रही थी, उसकी कान्ति चम्पेके फूल के समान थी, उसका सारा शरीर मानो फूलोंसे ही बना था ।। १५१ ।। रत्नश्रवाके पास खड़ी केकसी ऐसी जान पड़ती थी मानो उसके रूपसे वशीभूत हो लक्ष्मी ही कमलरूपी घरको छोड़कर बड़ी उत्कण्ठासे उसके पास आयी हो और उसके चरणों में नेत्र गड़ाकर खड़ी हो ॥। १५२ || अपूर्व पुरुष के देखनेसे उत्पन्न लज्जाके कारण उसका शरीर नोचेकी ओर झुक रहा था तथा भयसहित निकलते हुए श्वासोच्छ्वाससे उसके स्तन कम्पित हो रहे थे || १५३ || वह अपने लावण्यसे समीपमें पड़े पल्लवोंको लिप्त कर रही थी तथा श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धिसे आकृष्ट मदोन्मत्त भ्रमरोंके समूह वनको आकुलित कर रही थी || १५४ || वह अत्यधिक सौकुमार्य के कारण इतनी अधिक नीचे को झुक रही थी कि यौवन डरते-डरते ही उसका आलिंगन कर रहा था । केकसी क्या थी मानो arrant परम सृष्टि थी || १५५ || समस्त संसार सम्बन्धी आश्चर्य इकट्ठा करनेके लिए ही मानो १. पुष्पान्तकं म । २. मद्योनाद्भाविनीं क. ख. ज. ( मन्दोद्योतोद्भाविनीम् ) । ३. सुतां म । ४. वाससाम् म. । ५. विलपन्तीं म । ६ -नन्तिकीगतान् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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