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________________ १३६ पपपुराणे आस्तां ततः फलेनैव शमतां तात यास्यसि । तन्मर्यादं कृतं चेदं मया चूडाविमोक्षणम् ॥५४७॥ अथामङ्गलमीताभ्यां वाचा ते न निवारिताः । पितृभ्यां तनया यात स्निग्धदृष्टयानुवीक्षिताः ॥५४८॥ पातालादथ निर्गत्य यथा भवनवासिनः । जग्मुः प्रत्यरि सोसाहा भ्रातरः शस्त्रमासुराः ॥५४९॥ तेषामनुपदं लग्ना ततो राक्षसवाहिनी । चलदायुधधारोमिमाला व्याप्य नभस्तलम् ॥५५०॥ निरीक्षिताः पितृभ्यां ते यावलोचनगोचरम् । व्रजन्तः स्नेहसंपूर्णमानसाभ्यां समङ्गलम् ॥५५१॥ त्रिकूटशिखरेणासौ ततस्तैरुपलक्षिता । दृष्टयैव प्रौढया ज्ञाता गृहीतेति पुरी वरा ॥५५२॥ वजगिरेव तैः केचिदैत्या मृत्युवशीकृताः । केचित्प्रवणतां नीताः केचित् स्थानानिमोचिताः ॥५५३॥ विशद्भिः सैन्यमागत्य प्रणतैः शत्रुगोचरैः । ते सामन्तरलं जाता महान्तः पृथुकीर्तयः ॥५५४॥ शत्रुणामागमं श्रुत्वा निर्घातो निर्ययौ ततः । युद्धौण्डश्चलच्छत्रच्छायाच्छन्नदिवाकरः ॥५५५॥ ततोऽभवन्महायुद्धं सेनयोः सत्त्वदारणम् । वाजिमिरिणमत्तैर्विमानः स्यन्दनैस्तथा ॥५५६॥ महीमयमिवोत्पन्नं गगनं दन्तिनां कुलैः । तथा जलात्मकं जातं तेषां गण्डच्युताम्भसा ॥५५७॥ वातात्मकं च तत्कर्णतालसंजातवायुना। तेजोमयं तथान्योऽन्यशस्त्राघातोत्थवह्निना ॥५५८॥ दीनैः किमपरैरत्र निहतैः क्षुद्रखेचरैः । क्वासौ क्वासौ गतः पापो निर्घात इति चोदयन् ॥५५९॥ हैं वे लोकमें शक्तिशाली होनेपर भी महान् अनादरको पाते हैं ।।५४६।। अथवा रहने दो, यह सब कहनेसे क्या ? हे तात ! आप फल देखकर ही शान्तिको प्राप्त होंगे। जबतक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता है तबतकके लिए मैं यह चोटी खोलकर रखूगा ॥५४७॥ अथानन्तर अमंगलसे भयभीत माता-पिताने उन्हें वचनोंसे मना नहीं किया। केवल स्नेहपूर्ण दृष्टिसे उनकी ओर देखकर कहा कि हे पुत्रो! जाओ ।।५४८।। तदनन्तर वे तीनों भाई भवनवासी देवोंके समान पातालसे निकल. कर शत्रुको ओर चले। उस समय वे तीनों भाई उत्साहसे भर रहे थे तथा शस्त्रोंसे देदीप्यमान हो रहे थे ।।५४९।। तदनन्तर चंचल शस्त्रोंकी धारा ही जिसमें लहरोंका समूह था ऐसी राक्षसोंकी सेनारूपी नदी आकाशतलको व्याप्त कर उनके पीछे लग गयी ॥५५०॥ तीनों पुत्र आगे बढ़े जा रहे थे और जिनके हृदय स्नेहसे परिपूर्ण थे ऐसे माता-पिता उन्हें जब तक वे नेत्रोंसे दिखते रहे तब तक मंगलाचार पवंक देखते रहे॥५५॥ तदनन्तर त्रिकटाचलकी शिखरसे उपलक्षित लंकापुरीको उन्होंने गम्भीर दृष्टि से देखकर ऐसा समझा मानो हमने उसे ले ही लिया है ॥५५२।। जाते-जाते ही उन्होंने कितने ही दैत्य मौतके घाट उतार दिये, कितने ही वश कर लिये और कितने ही स्थानसे च्युत कर दिये ॥५५३॥ शत्रुपक्षके सामन्त नम्रीभूत होकर सेनामें आकर मिलते जाते थे इससे विशालकीतिके धारक तीनों ही कुमार एक बड़ी सेनासे युक्त हो गये थे ॥५५४॥ युद्ध में निपुण तथा चंचल छत्रकी छायासे सूर्यको आच्छादित करनेवाला निर्घात शत्रुओंका आगमन सुन लंकासे बाहर निकला ॥५५५॥ तदनन्तर दोनों सेनाओंमें महायुद्ध हुआ। उनका वह महायुद्ध घोड़ों, मदोन्मत्त हाथियों तथा अपरिमित रथोंसे जीवोंको नष्ट करनेवाला था ॥५५६॥ हाथियोंके समूहसे आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो पृथ्वीमय ही हो, उनके गण्डस्थलसे च्युत जलसे ऐसा जान पड़ता था मानो जलमय ही हो, उनके कर्णरूपी तालपत्रसे उत्पन्न वायुसे ऐसा जान पड़ता था मानो वायुरूप ही हो और परस्परके आघातसे उत्पन्न अग्निसे ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निरूप ही हो ॥५५७-५५८॥ युद्ध में दीन-हीन अन्य क्षुद्र विद्याधरोंके मारनेसे क्या लाभ है ? वह पापी निर्घात कहाँ है ? कहाँ है ? इस प्रकार प्रेरणा करता हुआ १. प्रौढ्या म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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