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________________ षष्ठं पर्व अहरन्मानसं पित्रोर्बन्धूनां द्विषतां तथा । तेषां क्रीडा कुमाराणां देवानामिव सोद्भुता ॥५३२॥ सिद्धविद्यासमुद्भूतवीर्योवृत्र्तक्रियास्ततः । निवारिताः पितृभ्यां ते यत्नादिति पुनः पुनः ॥५३३॥ रन्तुं चेद्यात किष्किन्धं पुत्राः कौमारचापलात् । मा ब्राजिष्ट समीपं त्वं जातुचिदक्षिणाम्बुधेः ॥५३४॥ ततः प्रणम्य तैः पृष्टौ पितरौ तत्र कारणम् । कुतूहलस्य बाहुल्याद्वीर्यशैशवसंभृतान् ॥५३५॥ अनाख्येयमिदं वत्सा इति तौ विहितोत्तरौ। सुतरामनुबन्धेन सुतैः पृष्टौ सचाटुभिः ॥५३६॥ ततस्तेभ्यः सुकेशेन कथितं शृणुतात्मजाः । हेतुना विदितेनात्र यद्यवश्यं प्रयोजनम् ॥५३७॥ पुर्यामशनिवेगेन लङ्कायां स्थापितः पुरा । निर्घातो नामतः करः खेचरो बलवानलम् ॥५३८॥ कुलक्रमेण सास्माकमागता नगरी शुभा। रिपोस्तस्माद भयात्त्यक्ता नितान्तमसुवत् प्रिया ॥५३९॥ देशे देशे चरास्तेन नियुक्ताः पापकर्मणा । दत्तावधानाः सततमस्मच्छिद्रगवेषणे ॥ ५४० ॥ यन्त्राणि च प्रयुक्तानि यानि कुर्वन्ति मारणम् । विदित्वा रमणासन्तान् भवतो गगनाङ्गणे ॥५४१॥ निघ्नन्ति तानि रन्ध्रेषु कृत्वा रूपेण लोभनम् । प्रमदाचरणानीवाशकं तपसि योगिनम् ॥५४२॥ एवं निगदितं श्रुत्वा पितृदुःखानुचिन्तनात् । निःश्वस्य मालिना दीर्घ समुद्भूताश्रुचक्षुषा ॥५४३॥ क्रोधसंपूर्णचित्तेन कृत्वा गर्वस्मितं चिरम् । निरीक्ष्य बाहुयुगलं प्रगल्भमिति भाषितम् ॥५४४॥ इयन्तं समयं तात कस्मान्नो न निवेदितम् । अहो स्नेहापदेशेन गुरुणा वञ्चिता वयम् ॥५४५॥ अविधाय नराः कार्य ये गर्जन्ति निरर्थकम् । महान्तं लाघवं लोके शक्तिमन्तोऽपि यान्ति ते ॥५४६॥ उन कुमारोंकी क्रीड़ा देवोंकी क्रीड़ाके समान अद्भुत थी तथा माता-पिता, बन्धुजन और शत्रुओंके भी मनको हरण करती थी ॥५३२।। सिद्ध हुई विद्याओंसे समुत्पन्न पराक्रमके कारण जिनकी क्रियाएँ अत्यन्त उद्धत हो रही थीं ऐसे उन कुमारोंको माता-पिता बड़े प्रयत्नसे बार-बार मना करते थे कि हे पुत्रो ! यदि तुम लोग अपनी बालचपलताके कारण क्रीड़ा करनेके लिए किष्किन्धगिरि जाओ तो दक्षिण समुद्रके समीप कभी नहीं जाना ॥५३३-५३४|| पराक्रम तथा बाल्य अवस्थाके कारण समुत्पन्न कुतूहलकी बहुलतासे वे पुत्र प्रणाम कर माता-पितासे इसका कारण पूछते थे तो वे यही उत्तर देते थे कि हे पुत्रो! यह बात कहनेकी नहीं है। एक बार पुत्रोंने बड़े अनुनयविनयके साथ आग्रह कर पूछा तो पिता सुकेशने उनसे कहा कि हे पुत्रो! यदि तुम्हें इसका कारण अवश्य ही जाननेका प्रयोजन है तो सुनो ॥५३५-५३७|| बहुत पहलेकी बात है कि अशनिवेगने लंकामें शासन करनेके लिए निर्घात नामक अत्यन्त क्रूर एवं बलवान् विद्याधरको नियुक्त किया है। वह लंका नगरी कुल-परम्परासे चली आयी हमारी शुभ नगरी है। वह यद्यपि हमारे लिए प्राणोंके समान प्रिय थी तो भी बलवान् शत्रुके भयसे हमने उसे छोड़ दिया ॥५३८-५३९।। पाप कर्ममें तत्पर शत्रुने जगह-जगह ऐसे गुप्तचर नियुक्त किये हैं जो सदा हम लोगोंके छिद्र खोजने में सावधान रहते हैं ।।५४०॥ उसने जगह-जगह ऐसे यन्त्र बना रखे हैं कि जो आकाशांगणमें क्रीड़ा करते हुए आप लोगोंको जानकर मार देते हैं ।।५४१।। वे यन्त्र अपने सौन्दर्यसे प्रलोभन देकर दर्शकोंको भीतर बुलाते हैं और फिर उस तरह नष्ट कर देते हैं कि जिस तरह तपश्चरणके समय होनेवाले प्रमादपूर्ण आचरण असमर्थ योगीको नष्ट कर देते हैं ।।५४२।। इस प्रकार पिताका कहा सुन और उनके दुःखका विचारकर माली लम्बी साँस छोड़ने लगा तथा उसकी आँखोंसे आँसू बहने लगे ।।५४३।। उसका चित्त क्रोधसे भर गया, वह चिरकाल तक गर्वसे मन्द-मन्द हँसता रहा और फिर अपनी भुजाओंका युगल देख इस प्रकार गम्भीर स्वरसे बोला ||५४४।। हे पिताजी ! इतने समय तक यह बात तुमने हम लोगोंसे क्यों नहीं कही ? बड़े आश्चर्यकी बात है कि आपने बड़े भारी स्नेहके बहाने हम लोगोंको धोखा दिया ।।५४५।। जो मनुष्य कार्य न कर केवल निष्प्रयोजन गर्जना करते १. चाद्भुता म.। २. वीर्योद्धत ख. । वीर्योद्धृत म. । ३. तो म. । ४. त्यक्त्वा म. । ५. अस्मभ्यम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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