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________________ षष्ठं पर्व १२९ यावञ्च तुमुलं तेषां वर्तते खगरक्षसाम् । तावदादाय तां कन्यां किष्किन्धः कृतितां गतः ॥४५१॥ आहूय चाभियातस्य तावदन्ध्रकभूभृता । कृपाणेन शिरस्तुङ्गं जयसिंहस्य पातितम् ।।४५२॥ तेनैकेन विना सैन्यमितश्चेतश्च तदगतम् । आत्मनेव विना देहे हृषीकाणां कुलं धनम् ॥४५३।। ततः सुतवधं श्रुत्वा वज्रेणेव समाहतः । शोकेनाशनिवेगोऽभून्मूर्छान्धतमसावृतः ॥४५४॥ ततः स्वदारनेत्राम्बुसिक्तवक्षःस्थलश्चिरात् । गतः प्रबोधमाकारं बभार क्रोधमीषणम् ॥४५५॥ ततस्तस्य समाकारं परिवर्गोऽपि नेक्षितुम् । शशाक प्रलयोत्पातभास्कराकारसन्निभम् ॥४५६॥ सर्वविद्याधरैः साई ततोऽसौ शस्त्रभासुरैः । गत्वा किष्कुपुरस्याभूत्तुङ्गशाल इवापरः ॥४५७॥ विदित्वा नगरं रुद्धं ततस्तौ वानरध्वजौ । तडिकेशिसमायुक्तौ निष्क्रान्तौ रणलालसौ ॥४५॥ गदामिः शक्तिभिर्बाणः पाशैः प्रासैमहासिभिः । ततो दानवसैन्यं तद्ध्वस्तं वानरराक्षसैः ॥४५९।। दिशा ययान्धको यातः किष्किन्धो वा महाहवे । सुकेशो वा तया याता मार्गाचूर्णितखेचराः ॥४६०॥ तत्र पुत्रवधक्रोधवह्निज्वालाप्रदीपितः । अन्ध्रकाभिमुखो जातो वज्रवेगः कृतध्वनिः ॥४६१॥ बालोऽयमन्ध्रकः पापोऽशनिवेगोऽयमुद्धतः । इति ज्ञात्वोत्थितो योद्धं किष्किन्धोऽशनिरंहसो ॥४६२॥ विद्युद्वाहननाम्नासौ तत्सुतेन पुरस्कृतः । अभवच्च तयोर्युद्धं दारजातं पराभवम् ॥४६३॥ यावच्च तत्तयोयुद्धं वर्ततेऽत्यन्तभीषणम् । निहतोऽशनिवेगेन तावदन्ध्रकवानरः ॥४६४॥ इधर जबतक विद्याधर और राक्षसोंके बीच भयंकर युद्ध होता है उधर तबतक कन्याको लेकर किष्किन्ध कृतकृत्य हो गया अर्थात् उसे लेकर युद्धसे भाग गया ॥४५१॥ विद्याधरोंका राजा विजयसिंह ज्यों ही सामने आया त्यों ही अन्ध्रकरूढिने ललकारकर उसका उन्नत मस्तक तलवारसे नीचे गिरा दिया॥४५२॥ जिस प्रकार एक आत्माके बिना शरीरमें इन्द्रियोंका समूह जहाँ-तहाँ बिखर जाता है उसी प्रकार एक विजयसिंहके विना समस्त सेना इधर-उधर बिखर गयी ॥४५३।। जब अशनिवेगने पुत्रके वधका समाचार सुना तो वह शोकके कारण वज्रसे ताड़ित हुएके समान परम दुखी हो मूर्छारूपी गाढ़ अन्धकारसे आवृत हो गया ।।४५४॥ तदनन्तर अपनी स्त्रियोंके नयन जलसे जिसका वक्षःस्थल भीग रहा था ऐसा अशनिवेग, जब प्रबोधको प्राप्त हुआ तब उसने क्रोधसे भयंकर आकार धारण किया ॥४५५।। तदनन्तर प्रलयकालके उत्पातसूचक भयंकर सूर्य के समान उसके आकारको परिकरके लोग देखने में भी समर्थ नहीं हो सके ॥४५६।। तदनन्तर उसने शस्त्रोंसे देदीप्यमान समस्त विद्याधरोंके साथ जाकर किसी दूसरे ऊँचे कोटके समान किष्कुपुरको घेर लिया ॥४५७।। तदनन्तर नगरको घिरा जान दोनों भाई यद्धकी लालसा रखते हए सूकेशके साथ बाहर निकले ॥४५८॥ फिर वानर और राक्षसोंकी सेनाने गदा, शक्ति, बाण, पाश, भाले तथा बड़ी-बडी तलवारोंसे विद्याधरोंकी सेनाको विध्वस्त कर दिया ॥४५९॥ उस महायुद्धमें अन्ध्रक, किष्किन्ध और सुकेश जिस दिशामें निकल जाते थे उसी दिशाके मार्ग चूर्णीकृत वानरोंसे भर जाते थे ॥४६०॥ तदनन्तर पुत्रवधसे उत्पन्न क्रोधरूपी अग्निकी ज्वालाओंसे प्रदीप्त हुआ अशनिवेग जोरका शब्द करता हुआ अन्ध्रकके सामने गया ॥४६१॥ तब किष्किन्धने विचारा कि अन्ध्रक अभी बालक है और यह पापी अशनिवेग महा उद्धत है, ऐसा विचारकर वह अशनिवेगके साथ युद्ध करनेके लिए स्वयं उठा ।।४६२।। सो अशनिवेगके पुत्र विद्युद्वाहनने उसका सामना किया और फलस्वरूप दोनोंमें घोर युद्ध हुआ सो ठोक ही है क्योंकि संसारमें जितना पराभव होता है वह स्त्रीके निमित्त ही होता है ।।४५३॥ इधर जबतक किष्किन्ध और विद्युद्वाहनमें भयंकर युद्ध चलता है उधर तबतक अशनिवेगने अन्ध्रकको १. कृतिनो भावः कृतिता ताम् । कृत्यतां म.। २. भूतिना क.। ३. बलम् म.। ४. अशनिवेगः । ५. अशनिवेगेन । १७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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