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________________ १२८ पद्मपुराणे करं करेण कश्चिञ्च स्मितयुक्तमताडयत् । तथा यथा गतः पान्थः श्रुतैर्वधिरतां चिरम् ॥४३८॥ मूलजालदृढाबद्धमहापीठस्य शाखिनः । कश्चिदुन्मूलनं चक्रे चलत्पल्लवधारिणः ॥४३९॥ मञ्चस्य स्तम्भमादाय बमजांसे परः कपिः । क्षुद्रमंगैनमस्तस्य व्याप्तमन्तरवर्जितैः ॥४४०॥ गात्रं बलितमेकेन स्फुटदृढवृणाङ्कितम् । शोणितोदारधाराभिरूपातधनसंनिभम् ॥४४१॥ कृताट्टहासमन्येन हसितं विवृताननम् । शब्दात्मकमिवाशेषं कुर्वता भुवनान्तरम् ॥४४२॥ धूतोऽन्येन जटामारश्छन्नाशेषदिगाननः । छायया तस्य संजाता शर्वरीव तदा चिरम् ॥४४३॥ 'संकोचिना भुजे कश्चिद्वामे दक्षिणपाणिना । चकार ताडनं घोरं निर्घातापातभीषणम् ॥४४४॥ सहध्वं ध्वंसनं वाचः परुषायाः फलं खलाः । दुःखंगा इति तारेण ध्वनिना मुंखराननः ॥४४५॥ अपूर्वायाः पराभूतेस्ततस्ते सहसा भृशम् । कपयोऽभिमुखीभूता हन्तुं खेचरवाहिनीम् ॥४४६॥ गजा गजैस्तता सार्द्ध रथारूढा रथस्थितैः । पदातयश्च पादातैश्चक्रुर्युद्धं सुदारुणम् ॥४४७॥ सेनयोरुभयोर्जातस्ततस्तत्र रणो महान् । दूरस्थितामरवातजनितोदारविस्मयः ॥४४८॥ श्रुत्वा च तत्क्षणं युद्धं सुकेशो राक्षसाधिपः । मनोरथ इवायातः किष्किन्धान्ध्रकयोः सुहृत् ॥४४९॥ अकम्पनसुताहेतोर्यथा युद्धममत् परम् । तथेदमपि संवृत्तं बीजं युद्धस्य योषितः ॥४५०॥ उससे ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त क्रूर कर्म करनेके लिए किसी बड़े स्थानकी खोज ही कर रहा हो ॥४३७।। किसीने मुसकराते हुए अपने एक हाथसे दूसरे हाथको इतने जोरसे पीटा कि उसका शब्द सुनकर पथिक चिरकालके लिए बहरा हो गया ॥४३८॥ जिसका महापीठ जड़ोंके समूहसे पृथ्वीपर मजबूत बंधा था और जो चंचल पल्लव धारण कर रहा था ऐसे किसी वृक्षको कोई सैनिक जड़से उखाड़ने लगा ॥४३९।। किसी वानरने मंचका खम्भा लेकर कन्धेपर इतने जोरसे तोड़ा कि उसके निरन्तर बिखरे हुए छोटे-छोटे टुकड़ोंसे आकाश व्याप्त हो गया ॥४४०।। किसीने अपने शरीरको इतने जोरसे मोड़ा कि उसके पुरे हुए घाव फिरसे फट गये तथा खूनकी बड़ी मोटी धाराओंसे उसका शरीर उत्पात-कालके मेधके समान जान पड़ने लगा ।।४४१॥ किसीने मुँह फाड़कर इतने जोरसे अट्टहास किया कि मानो वह समस्त संसारके अन्तरालको शब्दमय ही करना चाहता था ॥४४२॥ किसीने अपनी जटाओंका समूह इतनी जोरसे हिलाया कि उससे समस्त दिशाएँ व्याप्त हो गयीं और उससे ऐसा जान पड़ने लगा मानो चिरकालके लिए रात्रि ही हो गयी हो ॥४४३॥ कोई सैनिक दाहिने हाथको संकुचित कर उससे बायीं भुजाको इतनी जोरसे पीट रहा था कि उससे वज्रपातके समान भयंकर घोर शब्द हो रहा था ॥४४४॥ 'अरे दुष्ट विद्याधरो! तुमने जो कठोर वचन कहे हैं उसके फलस्वरूप इस विध्वंसको सहन करो' इस प्रकारके उच्च शब्दोंसे किसीका मुख शब्दायमान हो रहा था अर्थात् कोई चिल्ला-चिल्लाकर उक्त शब्द कह रहा था ॥४४५।। तदनन्तर उस अपूर्व तिरस्कारके कारण वानरवंशी, विद्याधरोंकी सेनाको नष्ट करनेके लिए सम्मुख आये ॥४४६।। तत्पश्चात् हाथी हाथियोंसे, रथोंके सवार रथके सवारोंसे और पैदल सिपाही पैदल सिपाहियोंके साथ भयंकर युद्ध करने लगे ॥४४७|| इस प्रकार दोनों सेनाओंमें वहां महायुद्ध हुआ। ऐसा महायुद्ध कि जो दूर खड़े देवोंके समूहको महान् आश्चर्य उत्पन्न कर रहा था ।।४४८॥ किष्किन्ध और अन्ध्रकका मित्र जो सुकेश नामका राक्षसोंका राजा था वह युद्धका समाचार सुन तत्काल हो मनोरथके समान वहाँ आ पहुँचा ।।४४९।। पहले अकम्पनकी पुत्री सुलोचनाके निमित्त जैसा महायुद्ध हुआ था वैसा ही युद्ध उस समय हुआ सो ठीक ही है क्योंकि युद्धका कारण स्त्रियां ही हैं ।।४५०।। १. संकोचिते म.। २. साम्प्रतम् म.। ३. दुष्टविद्याधराः । ४. मुखराननाः मः। ५. सहनात् म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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