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________________ षष्ठं पर्व १०७ अतिक्रान्ताँस्ततो दृष्ट्वा मानुषोत्तरपर्वतम् । गीर्वाणनिवहान् सर्वान् परमं शोकमागतः ॥१३॥ परिदेवमथो चक्रे भग्नोत्साहो गतद्युतिः । हा कष्टं क्षुद्रशक्तीनां मनुष्याणां धिगुन्नतिम् ॥१४॥ नन्दीश्वरे जिनेन्द्राणां प्रतिमानां महात्विषाम् । अकृत्रिमेण भावेन करिष्यामीति दर्शनम् ॥१४५॥ पूजां च विविधैः पुष्पै— पैर्गन्धैश्च हारिभिः । नमस्कारं च शिरसा धरासंसक्तमौलिना ॥१६॥ ये कृता मन्दमाग्येन मया चारुमनोरथाः । कथं ते कर्मभिर्भग्ना अशुभैः पूर्वसंचितैः ॥१७॥ अथवा श्रुतमेवासीन्मया मानुषपर्वतम् । अतिक्रम्य न गच्छन्ति मानुषा इत्यनेकशः ॥१४८॥ तथापि श्रद्धया तन्मे नितान्तं वृद्धियक्तया। विस्मृतं गन्तमद्यक्तो यतोऽस्मि स्वल्पशक्तिकः ॥१४॥ तस्मात् करोमि कर्माणि तानि यैरन्यजन्मनि । यातुं नन्दीश्वरं द्वीपं गतिमें न विहन्यते ॥१५०॥ इति निश्वित्य मनसा न्यस्य राज्यभरं सुते । अभून्महामुनिर्धारस्त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥१५॥ वज्रकण्ठस्ततः सार्धं चारुण्या श्रियमुत्तमाम् । भुक्त्वा किष्कुपुरे रम्ये श्रुत्वोपाख्यानकं पितुः ॥१५२॥ 'ऐश्वयं तनये क्षिप्त्वा प्राप दैगम्बरी क्रियाम् । कीदृशं तदुपाख्यानमित्युक्तो गणभृजगौ ॥१५३॥ वणिजौ भ्रातरावास्ता प्रीती स्त्रीभ्यां वियोजितौ । कनीयान् दुर्विधो ज्येष्ठः स्वापतेयो गृहीतवाक्॥१५॥ श्रेष्ठिनः संगमादेव प्राप्तः श्रावकतां पराम् । मृगयाजीविना भ्रात्रा परमं दुःखितोऽभवत् ॥१५५॥ प्रिया पद्माभाके साथ बैठकर राजा श्रीकण्ठ आकाशमार्गसे जा रहा था परन्तु जब मानुषोत्तर पर्वतपर पहुँचा तो उसका आगे जाना रुक गया ॥१४३।। इसकी गति तो रुक गयी परन्तु देवोंके समूह मानुषोत्तर पर्वतको उल्लंघ कर आगे निकल गये। यह देख श्रीकण्ठ परम शोकको प्राप्त हुआ ॥१४४|| उसका उत्साह भग्न हो गया और कान्ति नष्ट हो गयी। तदनन्तर वह विलाप करने लगा कि हाय-हाय, क्षुद्रशक्तिके धारी मनुष्योंकी उन्नतिको धिक्कार हो ॥१४५॥ 'नन्दीश्वर द्वीपमें जो जिनेन्द्र भगवान्की महाकान्तिशाली प्रतिमाएँ हैं में निश्छलभावसे उसके दर्शन करूंगा, नाना प्रकारके पुष्प, धूप और मनोहारी गन्धसे उनकी पूजा करूँगा तथा पृथ्वीपर मुकुट झुकाकर शिरसे उन्हें नमस्कार करूंगा' मुझ मन्दभाग्यने ऐसे जो सुन्दर मनोरथ किये थे वे पूर्वसंचित अशुभ कर्मोंके द्वारा किस प्रकार भग्न कर दिये गये ? ॥१४६-१४७।। अथवा यद्यपि यह बात मैंने अनेक बार सुनी थी कि मनुष्य मानुषोत्तर पर्वतका उल्लंघन कर नहीं जा सकते हैं तथापि अतिशय वृद्धिको प्राप्त हुई श्रद्धाके कारण मैं इस बातको भूल गया और अल्पशक्तिका धारी होकर भी जानेके लिए तत्पर हो गया ॥१४८-१४९।। इसलिए अब मैं ऐसे कार्य करता हूँ कि जिससे अन्य जन्ममें नन्दीश्वर द्वीप जानेके लिए मेरी गति रोको न जा सके ॥१५०।। ऐसा हृदयसे निश्चय कर श्रीकण्ठ, पुत्रके लिए राज्य सौंपकर, समस्त परिग्रहका त्यागी महामुनि हो गया ॥१५१॥ तदनन्तर श्रीकण्ठका पुत्र वज्रकण्ठ अपनी चारुणो नामक वल्लभाके साथ महामनोहर किष्कपुरमें उत्कृष्ट राज्यलक्ष्मीका उपभोग कर रहा था कि उसने एक दिन वृद्धजनोंसे अपने पिताके पूर्वभव सुने । सुनते ही उसका वैराग्य बढ़ गया और पुत्रके लिए ऐश्वर्य सौंपकर उसने जिनदीक्षा धारण कर ली। यह सुनकर राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे पूछा कि श्रीकण्ठके पूर्वभवका वर्णन कैसा था जिसे सुनकर वनकण्ठ तत्काल विरक्त हो गया। उत्तर में गणधर भगवान् कहने लगे ॥१५२-१५३॥ कि पूर्वभवमें दो भाई वणिक् थे, दोनोंमें परम प्रीति थी परन्तु सियोंने उन्हें पृथक्पृथक् कर दिया। उनमें छोटा भाई दरिद्र था और बड़ा भाई धनसम्पन्न था। बड़ा भाई किसी सेठका आज्ञाकारी था सो उसके समागमसे वह श्रावक अवस्थाको प्राप्त हुआ परन्तु छोटा भाई शिकार आदि कुव्यसनोंमें फंसा था। छोटे भाईकी इस दशासे बड़ा भाई सदा दुःखी रहता था १. ऐश्वर्य म.। २. तनयं म.। ३. प्रीते म.। ४. स्वापतेयं धनमस्ति यस्य स स्वापतेयी धनवानित्यर्थः । ५. गृहीतवान् ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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