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________________ षष्ठं पर्व तयोः कुशलवृत्तान्तप्रश्नो यावत्प्रवर्तते । तावरपुष्पोत्तरः प्राप्तो महाबलसमन्वितः ॥२७॥ कीर्तिशुक्लस्ततोऽपश्यद् गगनं सर्वतश्चितम् । विद्याधरसमूहेन प्रदीप्तमुरुतेजसा ॥२८॥ असिकुन्तादिमिः शस्त्रविकरालं महारवम् । स्थानभ्रंशमिवागच्छद् बलं खेचरसंगमात् ॥२९॥ वाजिभिर्वायुरहोभिर्गजैश्च जलदोपमैः । विमानैश्च महामानैः सिंहश्च प्रचलत्सटैः ॥३०॥ दृष्ट्वोत्तरां दिशं व्याप्त विहस्य क्रोधमिश्रितम् । सचिवानां समादेशं कीर्तिशुक्लो युधे ददौ ॥३१॥ अकायण ततः स्वेन श्रीकण्ठोऽयं पानतः । कीर्तिशुभ्रमिदं वाक्यं जगाद त्वरयान्वितम् ॥३२॥ एत बन्धुजनं रक्ष त्वं मदीयमिहाधुना। करोमि निर्जितं यावत्प्रतिपक्षं तवाश्रयात् ॥३३॥ एवमुक्त जगादासौ वचनं नयसंगतम् । तवायुक्तमिदं वक्तुं प्राप्यं मां भीतिभेदनम् ॥३४॥ यदि नामैष नो साम्ना शमं यास्यति दुर्जनः । ततः पश्य प्रविष्टोऽयं मृत्योर्वक्त्रं मदीरितः ॥३५॥ स्थापयित्वेति विश्रब्धं प्रियायाः सोदरं नृपः । उत्कृष्टवयसो धीरान् दूतान् द्रुतमजीगमत् ॥३६॥ उपर्युपरि ते गत्वा क्रमेणेदं बभाषिरे । पुष्पोत्तरं महाप्राज्ञा मधुरालापकोविदाः ॥३७॥ पुष्पोत्तर वदत्येतद्भवन्तं कीर्तिनिर्मलः । अस्मद्वदनविन्यस्तैः पदैरादरसंगतैः ॥३८॥ महाकुलसमुत्पन्नो भवान् विमलचेष्टितः । सर्वस्मिन् जगति ख्यातिं गतः शास्त्रार्थकोषिदः ॥३९॥ आगता गोचरं का ते न मर्यादा महामते । कर्णजाह निधीयेत यास्माभिरधुना तव ॥४०॥ श्रीकण्ठोऽपि कुले जातः शशाङ्ककरनिर्मले । वित्तवान् विनयोपेतः कान्तः सर्वकलान्वितः॥४१॥ अतिथिसत्कार किया ॥२६॥ जबतक उन दोनोंके बीच कुशल-समाचारका प्रश्न चलता है कि तबतक बड़ी भारी सेनाके साथ पुष्पोत्तर वहाँ जा पहुँचा ॥२७॥ तदनन्तर कीर्तिधवलने आकाशकी ओर देखा तो वह आकाश सब ओरसे विद्याधरोंके समहसे व्याप्त था. विशाल तेजसे देदीप्यमान हो रहा था ॥२८॥ तलवार, भाले आदि शस्त्रोंसे महाभयंकर था, बड़ा भारी शब्द उसमें हो रहा था, विद्याधरोंके समागमसे वह सेना ऐसी जान पड़ती थी मानो अपने स्थानसे भ्रष्ट होनेके कारण ही उसमें वह महाशब्द हो रहा था ॥२९॥ वायुके समान वेगवाले घोड़ों, मेघोंकी उपमा रखनेवाले हाथियों, बड़े-बड़े विमानों और जिनकी गरदनके बाल हिल रहे थे ऐसे सिंहोंसे उत्तर दिशाको व्याप्त देख कीर्तिधवलने क्रोधमिश्रित हँसी हँसकर मन्त्रियोंके लिए युद्धका आदेश दिया ॥३०-३१॥ तदनन्तर अपने अकार्य-खोटे कार्यके कारण लज्जासे अवनत श्रीकण्ठने शीघ्रता करनेवाले कीर्तिधवलसे निम्नांकित वचन कहे ॥३२॥ कि जबतक मैं आपके आश्रयसे शत्रुको परास्त करता हूँ तबतक आप यहाँ मेरे इष्टजन (स्त्री) की रक्षा करो ॥३३॥ श्रीकण्ठके ऐसा कहनेपर कीर्तिधवलने उससे नीतियुक्त वचन कहे कि भयका भेदन करनेवाले मुझको पाकर तुम्हारा यह कहना युक्त नहीं है ॥३४॥ यदि यह दुर्जन साम्यभावसे शान्तिको प्राप्त नहीं होता है तो तुम निश्चित देखना कि यह मेरे द्वारा प्रेरित होकर यमराजके ही मुखमें प्रवेश करेगा ॥३५॥ ऐसा कह अपनी स्त्रीके भाईको तो उसने निश्चिन्त कर महलमें रखा और शीघ्र ही उत्कृष्ट अवस्थावाले धीर-वीर दूतोंको पुष्पोत्तरके पास भेजा ॥३६॥ अतिशय बुद्धिमान और मधुरभाषण करनेमें निपुण दूतोंने लगे हाथ जाकर पुष्पोत्तरसे यथाक्रम निम्नांकित वचन कहे।॥३७॥ हे पष्पोत्तर ! हम लोगोंके मुखमें स्थापित एवं आदरपूर्ण वचनोंसे कीर्तिधवल राजा आपसे यह कहता है ॥३८॥ कि आप उच्चकुलमें उत्पन्न हैं, निर्मल चेष्टाओंके धारक हैं, समस्त संसारमें प्रसिद्ध हैं और शास्त्रार्थमें चतुर हैं ॥३९॥ हे महाबुद्धिमान् ! कौन-सी मर्यादा आपके कानोंमें नहीं पड़ी है जिसे इस समय हम लोग आपके कानोंके समीप रखें ॥४०॥ श्रीकण्ठ भी चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कुलमें उत्पन्न हुआ है, धनवान् है, विनयसे युक्त है, सुन्दर है, और सब कलाओंसे सहित है ।।४१॥ १. भीतिभेदिनम् । २. धीरो म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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