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________________ पद्मपुराणे चैत्यानां वन्दनां कतु श्रीकण्ठः सुरपर्वतम् । गतोऽन्यदा विमानेन वायुवेगेन चारुणा ॥१३॥ तस्मान्निवर्तमानोऽसौ चेतःश्रोत्रापहारिणम् । भृङ्गाणामिव झंकारमशृणोद् गीतनिःस्वनम् ॥१४॥ रम्यप्रक्वणमिश्रेण तेन गीतस्वनेन सः । तो ऋजुगुणेनेव बद्ध्वा निश्चलविग्रहः ।।१५।। अलोकनमथो चक्रे ततोऽपश्यत् स कन्यकाम् । गुरुणाधिष्ठितां कान्तां संगीतकगृहाङ्गणे ॥१६॥ तस्या रूपसमुद्रेऽसौ निमग्नं मानसं द्रुतम् । न शशाक समुद्धर्तु धर्तुं नागानिव प्रभुः ॥१७॥ स्थितश्चैषोऽन्तिकव्योम्नि तया नीलोत्पलाभया । वध्वेव पीवरस्कन्धो दृष्टयाकृष्टो मनोमुषा ॥१८॥ ततो दर्शनमन्योन्यं तयोर्माधुर्यपेशलम् । चकार वरणं प्रेमबद्धभावस्य सूचनम् ॥१९॥ ततस्तामिङ्गिताभिज्ञो भुजपञ्जरमध्यगाम् । कृत्वा नमस्तले यातः स्पर्शामीलितलोचनः ॥२०॥ परिवर्गस्ततस्तस्याः प्रलापमुखरीकृतः । पुष्पोत्तराय कन्यायाः श्रीकण्ठेन हृति जगौ ॥२१॥ सर्वोद्योगेन संनय ततः पुष्पोत्तरो रुषा । तस्यानुपदवीं यातो दन्तदष्टरदच्छदः ॥२२॥ तेनानुधावमानेन व्रजता सुनभस्तले । शशीव धनवृन्देन श्रीकण्ठः शुशुभेऽधिकम् ॥२३॥ आयान्तं पृष्ठतो दृष्टा श्रीकण्ठस्तं महाबलम् । त्वरित प्रस्थितो लङ्का नीतिशास्त्रविशारदः ॥२४॥ तत्र स्वसुः पतिं गत्वा शरणं स समाश्रयत् । कालप्राप्तं नयं सन्तो युञ्जानां यान्ति तुङ्गताम् ॥२५॥ सोदरो मम कान्ताया इति स स्नेह निमरम् । संभ्रमेण परिष्वज्य तं चकाराप्तपूजनम् ॥२६॥ किसी एक दिन श्रीकण्ठ अकृत्रिम प्रतिमाओंको वन्दना करने के लिए वायुके समान वेगवाले सुन्दर विमानके द्वारा सुमेरुपर्वत पर गया था ||१३|| वहाँसे जब वह लौट रहा था तब उसने मन और कानोंको हरण करनेवाला, भ्रमरोंकी झंकारके समान सुन्दर संगीतका शब्द सुना ॥१४|| वीणाके स्वरसे मिले हुए संगीतके शब्दसे उसका शरीर ऐसा निश्चल हो गया मानो सीधी रस्सीसे ही बाँधकर उसे रोक लिया हो ॥१५।। तदनन्तर उसने सब ओर देखा तो उसे संगीतगृहके आंगनमें गुरुके साथ बैठी हुई पुष्पोत्तरकी पुत्री पद्माभा दिखी ॥१६॥ उसे देखकर श्रीकण्ठका मन पद्माभाके सौन्दर्यरूपी सागरमें शीघ्र ही ऐसा निमग्न हो गया कि वह उसे निकालनेमें असमर्थ हो गया। जिस प्रकार कोई हाथियोंको पकड़नेमें समर्थ नहीं होता उसी प्रकार वह मनको स्थिर करने में समर्थ नहीं हो सका ||१७|| श्रीकण्ठ उस कन्याके समीप ही आकाशमें खड़ा रह गया। श्रीकण्ठ सुन्दर शरीरका धारक तथा स्थूल कन्धोंसे युक्त था। पद्माभाने भी चित्तको चुरानेवाली अपनी नीली-नीली दृष्टिसे उसे आकर्षित कर लिया था ॥१८॥ तदनन्तर दोनोंका परस्परमें जो मधुर अवलोकन हुआ उसीने दोनोंका वरण कर दिया अर्थात मधर अवलोकनसे ही श्रीकण्ठने पद्माभाको और पद्माभाने श्रीकण्ठको वर लिया। उनका यह वरना पारस्परिक प्रेम भावको सूचित करनेवाला था ।।१९।। तदनन्तर अभिप्रायको जाननेवाला श्रीकण्ठ पद्माभाको अपने भुजपंजरके मध्यमें स्थित कर आकाशमें ले चला। उस समय पद्माभाके स्पर्शसे उसके नेत्र कुछकछ बन्द हो रहे थे ॥२०॥ प्रलापसे चिल्लाते हए परिजनके लोगोंने राजा पुष्पोत्तरको खबर दी कि श्रीकण्ठने आपकी कन्याका अपहरण किया है ।।२१।। यह सुन पुष्पोत्तर भी बहुत क्रुद्ध हुआ। वह क्रोधवश दाँतोंसे ओठ चाबने लगा और सब प्रकारसे तैयार हो श्रीकण्ठके पीछे गया ॥२२॥ आगे-आगे जा रहा था और पुष्पोत्तर उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था जिससे आकाशके बीच श्रीकण्ठ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मेघसमूह जिसके पीछे उड़ रहा है ऐसा चन्द्रमा ही हो ॥२३।। नीतिशास्त्रमें निपुण श्रीकण्ठने जब अपने पीछे महाबलवान् पुष्पोत्तरको आता देखा तो वह शीघ्र ही लंकाकी ओर चल पड़ा ।।२४।। वहाँ वह अपने बहनोई कोतिधवलकी शरण में पहुँचा सो ठीक ही है। क्योंकि जो समयानुकूल नीतियोग करते हैं वे उन्नतिको प्राप्त होते ही हैं ।।२५।। 'यह मेरी स्त्रीका भाई है' यह जानकर कीर्तिधवलने बड़े स्नेहसे उसका आलिंगन कर १. सुकन्यकाम् ख.। २. नाङ्गानि च म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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