SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 141
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पश्च पर्व मधु स्रवन्ति ये वाचा हृदये विषदारुणाः । वशे स्थिता हृषीकाणी त्रिःसंध्या दुग्धमानसाः ॥३३१॥ साध्वाचारविनिर्मुक्ता यथाकामविधायिनः । ते भ्रमन्ति दुरात्मानस्तिर्यग्गर्भपरम्पराम् ॥३३२॥ दुर्लभं सति जन्तुत्वे मनुष्यत्वं शरीरिणाम् । तस्मादपि सुरूपत्वं ततो धनसमृद्धता ॥ ३३३॥ ततोऽप्यार्यत्वसंभूतिस्ततो विद्यासमागमः । ततोऽप्यर्थज्ञता तस्माद्दुर्लभो धर्मंसंगमः ॥ ३३४॥ कृत्वा धर्मं ततः केचित् सुखं प्राप्य सुरालये । देव्यादिपरिवारेण कृतं मानसगोचरम् ॥३३५॥ च्युत्वा गर्भगृहे भूयो विण्मूत्रकृतलेपने । चलत्कृमिकुलाकीर्णे दुर्गन्धेऽत्यन्तदुस्सहे ॥३३६॥ चर्मजालकसंछन्नाः पित्तश्लेष्मादिमध्यगाः । जनन्याहारनिष्यन्दं लिहन्तो नाडिकाच्युतम् ॥ ३३७॥ पिण्डीकृतसमस्ताङ्गा दुःखमारसमेर्दिताः । उषित्वा निर्गता लब्ध्वा मनुष्यत्वमनिन्दितम् ॥ ३३८ ॥ जन्मनः प्रभृति क्रूरा नियमाचारवर्जिताः । सदृष्टिरहिताः पापा विषयान् समुपासते ॥३३९॥ ये कामवशतां याताः सम्यक्त्वपरिवर्जिताः । प्राप्नुवन्तो महादुःखं ते भ्रमन्ति मवार्णवे ॥ ३४० ॥ परपीडाकरं वाक्यं वर्जनीयं प्रयत्नतः । हिंसायाः कारणं तद्धि सा च संसारकारणम् || ३४१ ॥ तथा स्तेयं स्त्रियाः सङ्गं महाद्रविणवान्छनम् । सर्वमेतत्परित्याज्यं पीडाकारणतां गतम् ॥ ३४२॥ श्रुत्वा धर्म समाविष्टो वैराग्यं खेचराधिपः । पप्रच्छ प्रणतिं कृत्वा व्यतीतं भवमात्मनः ॥ ३४३ ॥ के समान सीधे नरक में ही पड़ते हैं ||३३० || जो वचनसे तो मानो मधु झरते हैं पर हृदयमें विषके समान दारुण हैं । जो इन्द्रियोंके वशमें स्थित हैं और बाहरसे जिनका मन त्रैकालिक सन्ध्याओंमें निमग्न रहता है ||३३१|| जो योग्य आचारसे रहित हैं और इच्छानुसार मनचाही प्रवृत्ति करते हैं ऐसे दुष्ट जीव तिर्यंचयोनि में परिभ्रमण करते हैं ||३३२|| सर्वप्रथम तो जीवोंको मनुष्यपद प्राप्त होना दुर्लभ है, उससे अधिक दुर्लभ सुन्दर रूपका पाना है, उससे अधिक दुर्लभ धनसमृद्धिका पाना है, उससे अधिक दुर्लभ आर्यकुलमें उत्पन्न होना है, उससे अधिक दुर्लभ विद्याका समागम होना है, उससे अधिक दुर्लभ हेयोपादेय पदार्थको जानना है और उससे अधिक दुर्लभ धर्मका समागम होना है ||३३३-३३४ ॥ ९१ कितने ही लोग धर्म करके उसके प्रभावसे स्वर्ग में देवियों आदिके परिवारसे मानसिक सुख प्राप्त करते हैं ||३३५ ॥ | वहाँसे चयकर, विष्ठा तथा मूत्रसे लिप्त बिलबिलाते कीड़ाओंसे युक्त, दुर्गन्धित एवं अत्यन्त दुःसह गर्भगृहको प्राप्त होते हैं ||३३६ || गर्भ में यह प्राणी चमके जालसे आच्छादित रहते हैं, पित्त, श्लेष्मा आदिके बीच में स्थित रहते हैं और नालद्वारसे च्युत माता द्वारा उपभुक्त आहार द्रवका आस्वादन करते रहते हैं ||३३७|| वहाँ उनके समस्त अंगोपांग संकुचित रहते हैं, और दुःखके भारसे वे सदा पीड़ित रहते हैं । वहाँ रहनेके बाद निकलकर उत्तम मनुष्य पर्याय प्राप्त करते हैं ||३३८|| सो कितने ही ऐसे पापी मनुष्य जो कि जन्मसे ही क्रूर होते हैं, नियम, आचार-विचारसे विमुख रहते हैं और सम्यग्दर्शनसे शून्य होते हैं, विषयोंका सेवन करते हैं ||३३९|| जो मनुष्य कामके वशीभूत होकर सम्यक्त्व से भ्रष्ट हो जाते हैं वे महादु:ख प्राप्त करते हुए संसाररूपी समुद्र में परिभ्रमण करते हैं || ३४० || दूसरे प्राणियोंको पीड़ा उत्पन्न करनेवाला वचन प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिए क्योंकि ऐसा वचन हिंसाका कारण है और हिंसा संसारका कारण है ||३४१|| इसी प्रकार चोरी, परस्त्रीका समागम तथा महापरिग्रहकी आकांक्षा, यह सब भी छोड़नेके योग्य है क्योंकि यह सभी पीड़ाके कारण हैं || ३४२|| 'विद्याधरोंका राजा महारक्ष, मुनिराजके मुखसे धर्मका उपदेश सुनकर वैराग्यको प्राप्त हो गया । तदनन्तर उसने नमस्कार कर मुनिराजसे १. त्रीन्वारान्, त्रिसन्ध्या-म । २. समादिताः म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy