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________________ पद्मपुराणे राजा च श्रमणो भूत्वा देवीभूय च्युतो भवान् । भगीरथः समुत्पन्नो ग्रामस्तु सगराङ्गजाः ॥२९२।। संघस्य निन्दनं कृत्वा मृत्युमेति भवे भवे । तेनासौ युगपद्ग्रामो जातः स्तुत्या स्वमीदृशः ॥२९३।। श्रुत्वा पूर्वमवानेवमुपशान्तो भगीरथः । बभूव मुनिमुख्यश्च तपोयोग्यं पदं ययौ ॥२९४॥ वृत्तान्तगतमेतत्ते चरितं सगराश्रितम् । कथितं प्रस्तुतं वक्ष्ये शृणु श्रेणिक सांप्रतम् ॥२९५॥ योऽसौ तत्र महारक्षो नाम विद्याधराधिपः । लङ्कायां कुरुते राज्यं कण्टकैः परिवर्जितम् ॥२९६॥ सोऽन्यदा कमलच्छन्नदीर्घिकाकृतमण्डनम् । नानारत्नप्रमोत्तुङ्गक्रीडापर्वतकारितम् ॥२९७॥ आमोदिकुसुमोनासि तरुखण्डविराजितम् । कलकूजितविभ्रान्तशकुन्तगणसंकुलम् ॥२९८॥ रत्नभूमिपरिक्षिप्तं विकासिविविधा ति । घनपल्लवसच्छायलतामण्डपमण्डितम् ।।२९९॥ अगमत् प्रमदोद्यानमन्तःपुरसमन्वितः । महत्या संपदा युक्तो विद्याबलसमुच्छ्रयः ॥३०॥ तत्र क्रीडितुमारेभे वनिताभिरसौ समम् । कुसुमैस्ताड्यमानश्च ताडयंश्च यथोचितम् ॥३०१॥ काञ्चित्पादप्रणामेन कुपिता मोय॑या स्त्रियम् । सान्वयनन्यया तेन सान्व्यमानः सुलीलया ॥३०२॥ उरसा प्रेरयन् काञ्चिस्त्रिकूटतटशोभिना । पीवरस्तनरम्येण प्रेर्यमाणस्तथान्यया ॥३०॥ पश्यन् प्रच्छन्नगात्राणि क्रीडाव्याकुलयोषिताम् । रतिसागरमध्यस्थो नन्दनेऽमरराजवत् ॥३०४॥ गिजाई हुए सो राजाके हाथीसे चूर्ण होकर वे सब गिंजाइयोंके जीव संसारमें भ्रमण करते रहे ॥२९१।। कुम्भकारके जीव राजाने मुनि होकर देवपद प्राप्त किया और वहाँसे च्युत होकर तू भगीरथ हुआ है तथा गाँवके सब लोग मरकर सगर चक्रवर्ती के पुत्र हुए हैं ॥२९२।। मुनि संघकी निन्दा कर यह मनुष्य भव-भवमें मृत्युको प्राप्त होता है। इसी पापसे गाँवके सब लोग भी एक साथ मृत्युको प्राप्त हुए थे और संघकी स्तुति करनेसे तू इस तरह सम्पन्न तथा दीर्घायु हुआ है ॥२९३॥ इस प्रकार भगीरथ भगवान्के मुखसे पूर्वभव सुनकर अत्यन्त शान्त हो गया और मुनियोंमें मुख्य बनकर तपके योग्य पदको प्राप्त हुआ ॥२२४|| गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! प्रकरण पाकर यह सगरका चरित्र मैंने तुझसे कहा। अब इस समय प्रकृत कथा कहूँगा सो सुन ।।२९५॥ अथानन्तर-जो महारक्ष नामा विद्याधरोंका राजा लंकामें निष्कण्टक राज्य करता था विद्याबलसे समुन्नत वह राजा एक समय अन्तःपुरके साथ क्रीड़ा करनेके लिए बड़े वैभवसे उस प्रमदवनमें गया जो कि कमलोंसे आच्छादित वापिकाओंसे सुशोभित था, जिसके बीचमें नाना रत्नोंकी प्रभासे ऊँचा दिखनेवाला क्रीड़ापर्वत बना हुआ था, खिले हुए फूलोंसे सुशोभित वृक्षोंके समूह जिसकी शोभा बढ़ा रहे थे, अव्यक्त मधुर शब्दोंके साथ इधर-उधर मंडराते हुए पक्षियोंके समूहसे व्याप्त था, जो रत्नमयी भूमिसे वेष्टित था, जिसमें नाना प्रकारकी कान्ति विकसित हो रही थी, और जो सघन पल्लवोंकी समीचीन छायासे युक्त लतामण्डपोंसे सुशोभित था ॥२९६-३००। राजा महारक्ष उस प्रमदवनमें अपनी स्त्रियोंके साथ कीड़ा करने लगा। कभी स्त्रियाँ उसे फूलोंसे ताड़ना करती थीं और कभी वह फलोंसे स्त्रियोंको ताड़ना करता था ॥३०१।। कोई स्त्री अन्य स्त्रीके पास जानेके कारण यदि ईर्ष्यासे कुपित हो जाती थी तो उसे वह चरणोंमें झुककर शान्त कर लेता था। इसी प्रकार कभी आप स्वयं कुपित हो जाता था तो लीलासे भरी स्त्री इसे प्रसन्न कर लेतो थी ॥३०२।। कभी यह त्रिकूटाचलके तटके समान सुशोभित अपने वक्षःस्थलसे किसी स्त्री को प्रेरणा देता था तो अन्य स्त्री उसे भी अपने स्थल स्तनोंके आलिंगनसे प्रेरणा देती थी ॥३०३।। इस तरह क्रोड़ामें निमग्न स्त्रियोंके प्रच्छन्न शरीरोंको देखता हुआ यह १. दुति म. । २. -गीर्षया म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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