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________________ ६२ पद्मपुराणे 1 तयोगजघटाटोपसंघट्टरवसंकुलम् । संजातं प्रथमं युद्धं बहुलत्वक्षयावहम् ॥ ६९ ॥ अथोवाच विहस्यैवं भरतं बाहुविक्रमी । किं वराकेन लोकेन निहतेनामुनावयोः ॥७०॥ यदि निःस्पन्दया दृष्ट्या भवताहं पराजितः । ततो निर्जित एवास्मि दृष्टियुद्धे प्रवर्त्यताम् ॥७१॥ दृष्टियुद्धे ततो भग्नस्तथा बाहुरणादिषु । वधार्थं मरतो भ्रातुश्चक्ररत्नं विसृष्टवान् ॥७२॥ तत्तस्यान्त्यशरीरत्वादक्षमं विनिपातने । तस्यैव पुनरायायं समीपं विफलक्रियम् ॥७३॥ ततो भ्रात्रा समं वैरमवबुध्य महामनाः । संप्राप्तो भोगवैराग्यं परमं भुजविक्रमी ||७४ || संत्यज्य स ततो भोगान् भूत्वा निर्वस्त्रभूषणः । वर्षं प्रतिमया तस्थौ मेरुवनिःप्रकम्पकः ||७५|| वल्मीकविवरोधातैरत्युयैः स महोरगैः । श्यामादीनां च वल्लीभिः वेष्टितः प्राप केवलम् ॥ ७६ ॥ ततः शिवपदं प्रापदायुषः कर्मणः क्षये । प्रथमं सोऽवसर्पिण्यां मुक्तिमार्गं व्यशोधयत् ॥ ७७ ॥ भरतस्त्वकरोद् राज्यं कण्टकैः परिवर्जितम् । षड्भिर्भागैर्विभक्तायां सर्वस्यां भरतक्षितौ ॥७८॥ विद्याधरपुराकारा ग्रामाः सर्व सुखावहाः । देवलोकप्रकाराश्च पुरः परमसंपदः ||७९ || देवा इव जनास्तेषु रेजुः कृतयुगे सदा । मनोविषय संप्राप्तविचित्राम्बरभूषणाः ||८०|| देशा भोगभुवा तुल्या लोकपालोपमा नृपाः । अप्सरः सदृशो नार्यो मदनावासभूमयः ॥ ८१ ॥ एवमेकातपत्रायां पृथिव्यां भैरतोऽधिपः । आखण्डल इव स्वर्गे भुक्के कर्मफलं शुभम् ॥ ८२ ॥ अहंकारसे चकनाचूर भरत अपनी चतुरंग सेनाके द्वारा पृथिवीतलको आच्छादित करता हुआ उसके साथ युद्ध करनेके लिए पोदनपुर गया ।। ६८ ।। वहाँ उन दोनोंमें हाथियोंके समूहकी टक्कर से उत्पन्न हुए शब्दसे व्याप्त प्रथम युद्ध हुआ । उस युद्ध में अनेक प्राणी मारे गये || ६९॥ यह देख भुजाओंके बलसे सुशोभितं बाहुबलीने हँसकर भरतसे कहा कि इस तरह निरपराध दीन प्राणियों के वधसे हमारा और आपका क्या प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ||७० || यदि आपने मुझे निश्चलदृष्टिसे पराजित कर दिया तो मैं अपने आपको पराजित समझ लूंगा अतः दृष्टियुद्ध में प्रवृत्त होना चाहिए ||७१|| बाहुबली के कहे अनुसार दोनोंका दृष्टियुद्ध हुआ और उसमें भरत हार गया । तदनन्तर जल-युद्ध और बाहु-युद्ध भी हुए उनमें भी भरत हार गया । अन्तमें भरतने भाईका वध करनेके लिए चक्ररत्न चलाया ॥७२॥ परन्तु बाहुबली चरमशरीरी थे अतः वह चक्ररत्न उनका वध करनेमें असमर्थ रहा और निष्फल हो लौटकर भरतके समीप वापस आ गया || ७३|| तदनन्तर भाईके साथ बैरका मूल कारण जानकर उदारचेता बाहुबली भोगोंसे अत्यन्त विरक्त हो गये ||१४|| उन्होंने उसी समय समस्त भोगोंका त्यागकर वस्त्राभूषण उतारकर फेंक दिये और एक वर्षं तक मेरु पर्वत के समान निष्प्रकम्प खड़े रहकर प्रतिमा योग धारण किया || ७५ || उनके पास अनेक वामियाँ लग गयीं जिनके बिलोंसे निकले हुए बड़े-बड़े साँपों और श्यामा आदिकी लताओंने उन्हें वेष्टित कर लिया। इस दशामें उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया || ७६ ॥ तदनन्तर आयुकर्मका क्षय होनेपर उन्होंने मोक्ष पद प्राप्त किया और इस अवसर्पिणी कालमें सर्वप्रथम उन्होंने मोक्षमार्गं विशुद्ध किया - निष्कण्टक बनाया || ७७ || भरत चक्रवर्तीने छह भागोंसे विभक्त भरत क्षेत्रकी समस्त भूमिपर अपना निष्कण्टक राज्य किया || ७८|| उनके राज्य में भरत क्षेत्रके समस्त गाँव विशाधरोंके नगरोंके समान सर्व सुखोंसे सम्पन्न थे, समस्त नगर देवलोकके समान उत्कृष्ट सम्पदाओंसे युक्त थे ||७९ || और उनमें रहनेवाले मनुष्य, उस कृत युगमें देवोंके समान सदा सुशोभित होते थे । उस समयके मनुष्योंको मनमें इच्छा होते ही तरह-तरहके वस्त्राभूषण प्राप्त होते रहते थे ||८०|| वहाँ के देश भोगभूमियोंके समान थे, राजा लोकपालोंके थे और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान कामकी निवासभूमि थीं ॥ ८१ ॥ इस तरह जिस प्रकार १. मार्गे म. । २. भरताधिपः म. । तुल्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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