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________________ चतुर्थ पर्व केचित् सम्यग्मतिं भेजुर्गृहिधर्ममथापरे । अनगारव्रतं केचित् स्वशक्तेरनुगामिनः ॥५३॥ ततः समुद्यता गन्तुं जिनं नत्वा सुरासुराः । स्तुत्वा च निजधामानि गता धर्मविभूषिताः ॥५४॥ यं यं देशं स सर्वज्ञः प्रयाति गतियोगतः । योजनानां शतं तत्र जायते स्वर्गविभ्रमम् ॥५५॥ स भ्रमन् बहुदेशेषु मव्यराशीनुपागतान् । रत्नत्रितयदानेन संसारा'दुदतीरत् ॥५६॥ तस्यासीद गणपालानामशीतिश्चतुरुत्तरा । सहस्त्राणि च तावन्ति साधूनां सुतपोभृताम् ॥५७।। अत्यन्तशुद्धचिन्तास्ते रविचन्द्रसमप्रमाः । एभिः परिवृतः सवा जिनो विहरते महीम् ॥५८॥ चक्रवर्तिश्रियं तावत्प्राप्तो मरतभूपतिः ! यस्य क्षेत्रमिदं नाम्ना जगत्प्रकटतां गतम् ॥५९॥ ऋषमस्य शतं पुत्रास्तेजस्कान्तिसमन्विताः । श्रमणव्रतमास्थाय संप्राप्ताः परमं पदम् ॥६॥ तन्मध्ये भरतश्चक्री बभूव प्रथमो भुवि । विनीतानगरे रम्ये साधुलोकनिषेविते ॥६१॥ अक्षया निधयस्तस्य नवरत्नादिसंभृताः । आकराणां सहस्राणि नवतिर्नवसंयुताः ॥६२॥ त्रयं सुरमिकोटीनां हलकोटिस्तथोदिताः । चतुर्मिरधिकाशीतिर्लक्षाणां नरदन्तिनाम् ।।६३।। कोठ्यश्चाष्टौ दशोदिष्टा वाजिनां वातरंहसाम् । द्वात्रिंशच्च सहस्राणि पार्थिवानां महौजसाम् ॥६॥ तावन्त्येव सहस्राणि देशानां पुरसंपदाम् । चतुर्दश च रत्नानि रक्षितानि सदा सुरैः ॥६५॥ पुरन्ध्रीणां सहस्राणि नवतिः षभिरन्विताः । ऐश्वयं तस्य निःशेषं गदितं नैव शक्यते ॥६६॥ पोदनाख्ये पुरे तस्य स्थितो बाहुबली नृपः । प्रतिकूलो महासत्त्वस्तुल्योत्पादकमानतः ॥६७॥ तस्य युद्धाय संप्राप्तो भरतश्चक्रगर्वितः । सैन्येन चतुरङ्गेण छादयन् धरणीतलम् ॥६॥ कितने ही लोगोंने सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानको धारण किया। कितने ही लोगोंने गृहस्थ धर्म अंगीकार किया और अपनी शक्तिका अनुसरण करनेवाले कितने ही लोगोंने मनिव्रत स्वीकार किया ॥५३।। तदनन्तर जानेके लिए उद्यत हुए सुर और असुरोंने जिनेन्द्र देवको नमस्कार किया, उनकी स्तुति की और फिर धर्मसे विभूषित होकर सब लोग अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥५४॥ भगवान्का गमन इच्छावश नहीं होता था फिर भी वे जिस-जिस देशमें पहुंचते थे वहां सौ योजन तकका क्षेत्र स्वर्गके समान हो जाता था ।।५५।। इस प्रकार अनेक देशोंमें भ्रमण करते हुए जिनेन्द्र भगवान्ने शरणागत भव्य जीवोंको रत्नत्रयका दान देकर संसार-सागरसे पार किया था ॥५६।। भगवान्के चौरासी गणधर थे और चौरासी हजार उत्तम तपस्वी साधु थे ॥५७।। वे सब साधु अत्यन्त निर्मल हृदयके धारक थे तथा सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रभासे संयुक्त थे। इन सबसे परिवृत्त होकर भगवान्ने समस्त पृथिवीपर विहार किया था ॥५८।। भगवान् ऋषभदेवका पुत्र राजा भरत चक्रवर्तीकी लक्ष्मीको प्राप्त हुआ था और उसीके नामसे यह क्षेत्र संसारमें भरत क्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ था ॥५९|| भगवान् ऋषभदेवके सौ पुत्र थे जो एकसे एक बढ़कर तेज और कान्तिसे सहित थे तथा जो अन्तमें श्रमणपद-मुनिपद धारण कर परमपद--निर्वाणधामको प्राप्त हुए थे ॥६०॥ उन सौ पुत्रोंके बीच भरत चक्रवर्ती प्रथम पुत्र था जो कि सज्जनोंके समूहसे सेवित अयोध्या नामकी सुन्दर नगरीमें रहता था ॥६१।। उसके पास नव रत्नोंसे भरी हुई अक्षय नौ निधियाँ थीं, निन्यानबे हजार खानें थीं, तीन करोड़ गायें थीं, एक करोड़ हल थे, चौरासी लाख उत्तम हाथी थे, वायुके समान वेगवाले अठारह करोड़ घोड़े थे, बत्तीस हजार महाप्रतापी राजा थे, नगरोंसे सुशोभित बत्तीस हजार ही देश थे, देव लोग सदा जिनकी रक्षा किया करते थे ऐसे चौदह रत्न थे, और छियानबे हजार स्त्रियाँ थीं। इस प्रकार उसके समस्त ऐश्वयंका वर्णन करना अशक्य है-कठिन कार्य है ।।६२-६६।। पोदनपुर नगरमें भरतका सौतेला भाई राजा बाहुबली रहता था। वह अत्यन्त शक्तिशाली था तथा 'मैं और भरत एक ही पिताके दो पुत्र हैं' इस अहंकारसे सदा भरतके विरुद्ध रहता था ॥६७।। चक्ररत्नके १. -दुदतीतरन् म.। २. च तपोभृताम् म. । ३. पोतनाख्ये म. । ४. मानसः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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