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________________ चतुर्व प्रकीर्णा सुमनोवृष्ठिरमोदाकृष्टषट्पदा । नमः स्थैरमरैर्नानारूपसं भवगामिनी ॥ २५॥ महादुन्दुभयो नेदुः क्षुब्धसागरनिस्वनाः । अदृष्टविग्रहैर्देवैराहताः करपल्लवैः ॥२६॥ यक्ष पद्मपलाशाक्षौ सर्वालङ्कारभूषितौ । चालयाञ्चक्रतुः स्वैरं चामरे चन्द्रहासिनी ॥ २७ ॥ मेरुमस्तकसंकाशं मुकुटं भूमियोषितः । सिंहासनं समुत्पन्नं कराहतदिवाकरंम् ॥ २८॥ त्रिलोकविभुताचिह्नं मुक्ताजालकभूषितम् । छत्रत्रयं समुद्भूतं तस्येव विमलं यशः ||२९|| सिंहासन स्थितस्यास्य सरणं समवान्वितम् । प्राप्तस्य गदितुं शोभां केवली केवलं प्रभुः ॥ ३० ॥ ततस्तमवधिज्ञानादवगम्य सुराधिपाः । वन्दितुं सपदि प्राप्ताः परिवारसमन्विताः ॥ ३१ ॥ ख्यातो वृषमसेनोऽस्य संजातो गणभृततः । अन्ये च श्रमणा जाता महांबैराग्ययोगिनः ||३२|| यथास्थानं ततस्तेषु सरणे समवान्विते । यत्यादिषु निविष्टेषु गणेशेन प्रचोदितः ||३३|| छादयन्तीं स्वनादेन देवदुन्दुभि निःस्वनम् । जगाद भगवान् वाचं तत्त्वार्थपरिशंसिनीम् ॥३४॥ अस्मिंस्त्रिभुवने कृत्स्ने जीवानां हितमिच्छताम् । शरणं परमो धर्मस्तस्माच्च परमं सुखम् ॥३५॥ सुखार्थं चेष्टितं सर्वं तच्च धर्मनिमित्तकम् । एवं ज्ञात्वा जना यत्नात् कुरुध्वं धर्मसंग्रहम् ॥ ३६ ॥ वृष्टिर्विना कुतो मेवैः क्व सस्यं बीजवर्जितम् । जीवानां च विना धर्मात् सुखमुत्पद्यते कुतः ॥ ३७॥ गन्तुकामो यथा पङ्गुर्भूको वक्तुं समुद्यतः । अन्धो दर्शनकामश्च तथा धर्मादृते सुखम् ||३८|| बहुत हो अधिक सुशोभित हो रहे थे ||२४|| आकाशमें स्थित देवोंने सुगन्धिसे भ्रमरों को आकर्षित करनेवाली एवं नाना आकारमें पड़नेवाली फूलों की वर्षा की ||२५|| जिनके शब्द, क्षोभको प्राप्त हुए समुद्र शब्द समान भारी थे ऐसे बड़े-बड़े दुन्दुभि बाजे, अदृश्य शरीरके धारक देवोंके द्वारा करपल्लवोंसे ताडित होकर विशाल शब्द करने लगे ||२६|| जिनके नेत्र कमलकी कलिकाओंके समान थे तथा जो सर्व प्रकार के आभूषणोंसे सुशोभित थे ऐसे दोनों ओर खड़े हुए दो यक्ष, चन्द्रमाकी हँसी उड़ानेवाले - सफेद चमर इच्छानुसार चलाने लगे ||२७|| जो मेरुके शिखर के समान ऊँचा था, पृथिवीरूपी स्त्रीका मानो मुकुट ही था, और अपनी किरणोंसे सूर्यको तिरस्कृत कर रहा था ऐसा सिंहासन उत्पन्न हुआ ॥ २८ ॥ जो तीन लोककी प्रभुताका चिह्नस्वरूप था, मोतियोंकी लड़ियों से विभूषित था और भगवान् के निर्मल यशके समान जान पड़ता था ऐसा छत्रत्रय उत्पन्न हुआ ||२९|| आचार्य रविषेण कहते हैं कि समवसरणके बीच सिंहासनपर विराजमान हुए भगवान की शोभाका वर्णन करनेके लिए मात्र केवलज्ञानी ही समर्थ हैं, हमारे जैसे तुच्छ पुरुष उस शोभाका वर्णन कैसे कर सकते हैं ||३०|| * तदनन्तर अवधिज्ञानके द्वारा, भगवान्‌को केवलज्ञान उत्पन्न होनेका समाचार जानकर सब इन्द्र अपने-अपने परिवारोंके साथ वन्दना करनेके लिए शीघ्र ही वहाँ आये ||३१|| सर्व प्रथम वृषभसेन नामक मुनिराज इनके प्रसिद्ध गणधर हुए थे। उनके बाद महावेराग्यको धारण करनेवाले अन्य अन्य मुनिराज भी गणधर होते रहे थे ||३२|| उस समवसरणमें जब मुनि, श्रावक तथा देव आदि सब लोग यथास्थान अपने-अपने कोठोंमें बैठ गये तब गणधरने भगवान् से उपदेश देनेकी प्रेरणा की ||३३|| भगवान् अपने शब्दसे देव-दुन्दुभियों के शब्दको तिरोहित करते एवं तत्त्वार्थको सूचित करनेवाली निम्नांकित वाणी कहने लगे ||३४|| उन्होंने कहा कि इस त्रिलोकात्मक समस्त संसार में हित चाहनेवाले लोगोंको एक धर्मं ही परम शरण हैं, उसीसे उत्कृष्ट सुख प्राप्त होता है। ||३५|| प्राणियोंकी समस्त चेष्टाएँ सुखके लिए हैं और सुख धर्मके निमित्तसे होता है, ऐसा जानकर हे भव्य जन ! तुम सब धर्मंका संग्रह करो || ३६ || बिना मेघों के वृष्टि कैसे हो सकती है और बिना बीज अनाज कैसे उत्पन्न हो सकता है। इसी तरह बिना धर्मंके. जीवोंको सुख कैसे उत्पन्न हो सकता है ? ||३७|| जिस प्रकार पंगु मनुष्य चलनेको इच्छा करे, गूँगा मनुष्य बोलनेकी इच्छा करे, १. निस्वनाम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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