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________________ तृतीयं पर्व १५ धान्यानां पर्वताकाराः पल्यौघाः क्षयवर्जिताः । वाप्युद्यानपरिक्षिप्ताः प्रासादाश्च महाप्रभाः ॥३२॥ रेणुकण्टकनिर्मुक्ता रथ्यामार्गाः सुखावहाः । महातरुकृतच्छायाः प्रपाः सर्वरसान्विताः ॥३२५॥ मासांश्च चतुरस्तत्र श्रोत्रानन्दकरध्वनिः । देशे काले च पर्जन्यः कुरुतेऽमृतवर्षणम् ॥३२६॥ हिमानिलविनिर्मुक्तो हेमन्तः सुखमागिनाम् । यथेप्सितपरिप्राप्तवाससा साधु वर्तते ॥३२७॥ मृदुतापो निदाघेऽपि शङ्कावानिव भास्करः । नानारत्नप्रभाक्रान्तो बोधकः पद्मसंपदाम् ॥३२८॥ ऋतवोऽन्येऽपि चेतःस्थवस्तुसंप्रापणोचिताः। नीहारादिविनिमुक्ताः शोमन्ते निर्मला दिशः ॥३२९॥ न कश्चिदेकदेशोऽपि तस्मिन्नस्ति सुखो न यः । रमन्ते सततं सर्वा भोगभूमिष्विव प्रजाः ॥३३०॥ योषितः सुकुमाराङ्गाः सर्वाभरणभूषिताः । इङ्गितज्ञानकुशलाः कीर्तिश्रीहीधतिप्रमाः ॥३३१॥ काचित्कमलगर्भाभा काचिदिन्दीवरप्रभा। काचिच्छिरीषसंकाशा काचिद्विद्यत्समद्यतिः ॥३३२॥ नन्दनस्येव वातेन निर्मितास्ताः सुगन्धतः । वसन्तादिव संभूताश्चारुपुष्पविभूषणात् ॥३३३॥ चन्द्रकान्त विनिर्माणशरीरा इव चापराः । कुर्वन्ति सततं रामा निजज्योत्स्नासरस्तराम् ॥३३४॥ त्रिवर्णनेत्रशोभिन्यो गत्या हंसवधूसमाः । पीनस्तन्यः कृशोदर्यः सुरस्त्रीसमविभ्रमाः ॥३३५॥ लाल कान्तिको धारण करनेवाली भैंसोंकी पंक्तियां अपने बछड़ोंके साथ सदा विचरती रहती हैं ।।३२३॥ वहाँ पर्वतोंके समान अनाजकी राशियाँ हैं, वहाँको खत्तियों ( अनाज रखनेकी खोड़ियों) का कभी क्षय नहीं होता, वापिकाओं और बगीचोंसे घिरे हुए वहाँके महल बहुत भारी कान्तिको धारण करनेवाले हैं ।।३२४॥ वहाँके मार्ग धूलि और कण्टकसे रहित, सुख उपजानेवाले हैं। जिनपर बड़े-बड़े वृक्षोंकी छाया हो रही है तथा जो सर्वप्रकारके रसोंसे सहित हैं ऐसी वहाँको प्याऊँ हैं ॥३२५।। जिनकी मधुर आवाज कानोंको आनन्दित करती है ऐसे मेघ वहाँ चार मास तक योग्य देश तथा योग्य कालमें अमृतके समान मधुर जलकी वर्षा करते हैं ॥३२६।। वहाँको हेमन्त ऋतु हिममिश्रित शीतल वायुसे रहित होती है तथा इच्छानुसार वस्त्र प्राप्त करनेवाले सुखके उपभोगी मनुष्योंके लिए आनन्ददायी होती है ॥३२७॥ वहाँ ग्रीष्म ऋतु में भी सूर्य मानो शंकित होकर ही मन्द तेजका धारक रहता है और नाना रत्नोंकी प्रभासे युक्त होकर कमलोंको विकसित करता है ॥३२८|| वहाँकी अन्य ऋतुएँ भी मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त करानेवाली हैं तथा वहाँकी निर्मल दिशाएँ नीहार ( कूहरा ) आदिसे रहित होकर अत्यन्त सुशोभित रहती हैं ॥३२९॥ वहाँ ऐसा एक भी स्थान नहीं है जो कि सुखसे युक्त न हो । वहाँकी प्रजा सदा भोगभूमिके समान क्रीड़ा करती रहती है ।।३३०|| वहाँकी स्त्रियाँ अत्यन्त कोमल शरीरको धारण करनेवाली हैं, सब प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित हैं, अभिप्रायके जाननेमें कुशल हैं, कीर्ति, लक्ष्मी, लज्जा, धैर्य और प्रभाको धारण करनेवाली हैं ॥३३१॥ कोई स्त्री कमलके भीतरी भागके समान कान्तिवाली है, कोई नील कमलके समान श्यामल प्रभाकी धारक है, कोई शिरीषके फूलके समान कोमल तथा हरित वर्णकी है और कोई बिजलीके समान पीली कान्तिसे सुशोभित है ।।३३२॥ वे स्त्रियाँ सुगन्धिसे तो ऐसी जान पड़ती हैं मानो नन्दन वनकी वायुसे ही रची गई हों और मनोहर फूलोंके आभरण धारण करनेके कारण ऐसी प्रतिभासित होती हैं मानो वसन्त ऋतुसे ही उत्पन्न हुई हों ।।३३३।। जिनके शरीर चन्द्रमाकी कान्तिसे बने हुए के समान जान पड़ते थे ऐसी कितनी ही स्त्रियाँ अपनी प्रभारूपी चाँदनीसे निरन्तर सरोवर भरती रहती थीं ॥३३४॥ वे स्त्रियाँ लाल, काले और सफ़ेद इस तरह तीन रंगोंको धारण करनेवाले नेत्रोंसे सुशोभित रहती हैं, उनकी चाल हंसियोंके समान है, उनके स्तन अत्यन्त स्थूल हैं, उदर कृश हैं, और उनके हाव-भाव-विलास देवांगनाओंके समान हैं ।।३३५।। वहाँके मनुष्य भी १. सुखयतीत सुखः । तस्मिन्नस्यसुखालयः म.। २. सरस्तरम् म., क. । www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only Jain Education International
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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